आजकल देश के वित्तमंत्री विदेश यात्रा पर हैं और कई दिनो से अमेरिका में हैं। वह तो शायद प्रधान मंत्री की अमेरिका यात्राओं को रिफ्रेश करना भी हो सकता है। लेकिन हाल में राहुल गांधी द्वारा अमेरिका जाकर राजनीति करने के कारण भाजपा सरकार की नीतियों को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास भी हो सकता है, ताकि देश की छबि बने। लेकिन देश के अन्दर मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जाविद रसूल भट्ट, अबु हनीफ़ा, रियाज़ुद्दीन अली, जाफ़र हुसैन, अयूब पंडित, जुनैद खान और भी कई लोगों को खुले आम पीट-2 कर मार दिया जाना, इस या उस बहाने, कभी गौ रक्षा के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर। कोई भी दस-बारह लोगों का गिरोह बना लेता है और मुसलमानों को डराने के लिए उन पर मनमाने अत्याचार करता है। सबसे अधिक खतरनाक बात तो यह है कि सरकारें चुपचाप देखती रहती है यानि कि उनकी मौन स्वीकृत दी जाती हुई प्रतीत होती है। इस देश के अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा है ताकि वह अपने अस्तित्व तक को भूल जायेँ। पूरे देश को एक रंग में रंगने का अभ्यास किया जा रहा है। देश में कोई भी इस प्रकार के कार्यों पर प्रतिक्रिया करता है या विरोध की हल्की सी आवाज़ भी उठाता है तो उसे देशद्रोही करार दिया जाता है और पाकिस्तान भेज दिये जाने का फरमान सुनाये जाते हैं।
इस प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध आखिर प्रधानमंत्री को भी बोलना पड़ा। यह ठीक है कि उनकी पार्टी या उनकी संस्था को अल्पसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए। यह भी ठीक है कि उनकी पार्टी और उस संस्था जिसकी ताकत पर उनकी पार्टी जिंदा है, को अपने अतिरिक्त तमाम समाज, समूह, समुदाय और लोग नापसंद हैं। किसी के धर्म से नफरत, किसी की जात से, किसी की भाषा और किसी की शक्ल और रंग पसंद नहीं है। यह उनकी समस्या हो सकती है, देश की नहीं। इस देश में जिसने जन्म लिया है, वह बराबर इस देश का नागरिक भी है और निवासी भी है। इसलिए कम से कम नागरिक अधिकार जो संविधान उसे देता है से महरूम तो नहीं कर सकते। भले ही उनके पास सरकार में बहुमत प्राप्त हो। राज्य सत्ता की परिभाषा भी यही है कि उसके सामने सब नागरिक समान हैं। यह पसंद और नापसंद का मामला नहीं है।
अपनी सरकार हर चीज के प्रति अति संवेदनशील लगती है। हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखती है। इसका एक उदाहरण है हाल में देश के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा एक मंत्री के प्रस्ताव पर शाकाहारी केप्सूल बनाने की प्रक्रिया आरंभ करने की। क्योंकि वर्तमान में प्रचलित केप्सूलों के खोल जीव अव्यवों से बनाए जाते हैं जो शाकाहारियों के लिए वर्जित हैं, इसलिए अब केप्सूल के खोल वनस्पति अव्यवों से बनाए जायेँगे। एक तरफ सरकार नागरिकों का इस प्रकार ध्यान रखती हो दूसरी तरफ बहाने बना कर एक समुदाय के लोगों को सरेआम कत्ल किया जाये और हैरानी की बात तो तब कि वारदातों के गवाह तक न मिले, यहां तक कि रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थानों पर भी। यह सिर्फ हैरान करने वाली ही नहीं बल्कि परेशान करने वाली बात भी है। प्रधानमंत्री आज तक कितनी ही बार ‘मन की बात’ कर चुके हैं और उन मन की बातों में हर तरह की समस्या और उसका समाधान देते हैं, सिर्फ मानव (अल्पसंख्यक) हत्याओं का विरोध या रोक का नहीं। उसका कारण मात्र सत्ता पाना और उस पर बने रहना है या उससे भी आगे है, कुछ और? प्रधानमन्त्री को यह समझना पड़ेगा कि अलग-2 परिधानों में अलग-2 देशों की बारम्बार यात्रा से देश की छबि नहीं सुधरेगी, देश की छबि तो देश अन्दर के हालातों से सुधरेगी।
इस तरह जुनेदों की खुलेआम गुंडों द्वारा हत्या, उसके धर्म, पोशाक और खानपान पर अपमानजनक टिप्पणियां कब तक चलेगा यह सब और कब तक छूट होगी सरकार की तरफ से इस प्रकार के अमानवीय व अपमानजनक घटनाओं पर? अब तो खंडावली, ज़िला बल्लभगढ़, हरियाणा जैसे गांव के मुसलमानों के दिलो दिमाग में इतना डर बैठ गया है कि उन्हों ने अपने बच्चों के गांव से बाहर जाकर पढ़ने व काम के लिए जाने पर रोक लगा दी है। माताएं अपने बच्चों को समझा रही हैं कि उनके धर्म, पोशाक व खानपान को लेकर जो कुछ उनको कहा जाता है, उस पर वे कुछ न बोलें, चुपचाप सुन लें। क्या देश में गुंडाई राज कायम हो चुका है? क्या उनकी मन माफिक कार्य हो रहा है? क्या वह अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं, देश को, देशवासियों, नेताओं, राजनैतिक पार्टियों और तमाम संगठन संस्थाओं को सोचना होगा।
समस्त संस्थाओं, राजनेताओं, राजनैतिक पार्टियों, नागरिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, बुद्धिजीवियों को सोचना पड़ेगा इस बारे में देश के एक बड़े भाग के दिमाग में डर बैठ जाये अपने ही घर में अपनी ही दीवारों, खिड़की-दरवाजों से डर लगने लगे। लोकतन्त्र में इससे बड़ी बदकिस्मती की बात क्या हो सकती है, वह भी एक बहुरंगी देश के लिए? हां! यह ठीक है कि प्रधानमंत्री साहब यह सब यदि ट्रम्प साहब को खुश करने के लिए कर रहे हैं, तो कम से कम मैं तो कहता हूं वह गलत कर रहे हैं और इस संदेश को हम लोगों को देश के शीर्ष तक पहुंचाना चाहिए। यह भी ठीक है कि वर्तमान सत्तासीन पार्टी हर टेस्ट (चुनाव) में पास होती जा रही है। लेकिन यह भी उतना ही भ्रमित करने वाला सच है। देश की जनता के पास आज विकल्प नहीं है। ऐसा कोई सत्ता आधार नहीं है जिस पर वह टिक सके। सबके सब बिना पेंदे के, बिना आधार और अपने-2 हितों को लेकर चलने वाले दल और नेता हैं। जिसका उदाहरण आज देश के सर्वोच्च सत्ता पद (राष्ट्रपति) के चुनाव का है।
तथाकथित विपक्षी पार्टियां कई दिनों तक चर्चा करती रहीं, बड़ी-2 बैठकें हुई, लेकिन एक प्रत्याशी पर राजी नहीं हो सकीं। लेकिन जैसे ही भाजपा या अमित-मोदी जोड़ी ने उन्हें 440 वॉल्ट का झटका दिया तो 24 घंटे में ही प्रत्याशी तय हो गया। इसके लिए मेरी भाषा में एक सटीक कहावत है, ‘रहङ दचे थल तप्पि संज़ि’ अर्थात घोड़े के गिरने के बाद सीढी ठीक करना। यह है आज हमारे राजनैतिक पार्टियों का हाल। विशेष कर उन पार्टियों का जिसकी स्थापना ही संघर्ष का इतिहास है। जिंनका भविष्य ही संघर्ष है, वे भी चमक-दमक पर जा कर बिखर गए या कहें बिछ गये। देश की जनपक्षीय पार्टियों का हाल भी आज यह हो गया कि वे भी अपने अस्तित्व के लिए किसी व्यक्ति के सहारे के मोहताज हो गई हैं। देश में ऐसा कोई नहीं दिखता जो इस समय दनदनाते इन ताकतों का मुक़ाबला कर सके। किसी को अपने पुराने कर्मों के कारण पैदा सीबीआई का डर, किसी को आईटी का तो किसी को सीबीसी का डर तो कहीं अपनी कुर्सी की चिंता तो कौन सोचेगा देश और देश का तार-2 होते विश्वास और रिश्ते के बारे में। आज आवश्यकता है सब को अपने-2 खोलों से बाहर आकर प्रतिकार करने की, विरोध करने की।
चिंता की खास वजह यह भी है कि गुजरात के गोधरा कांड से शुरू हुए नरसंहार में दलितों और आदिवासियों का मुसलमानों के विरुद्ध सफल प्रयोग करने वाले षड़यंत्र जैसी घटनाओं की। जो आज भी लगातार कामयाब हो रही है, जिसका ताजा उदाहरण अभी-2 उत्तर प्रदेश की घटना है, जहां पर भारत और पाकिस्तान क्रिकेट मेच में पाकिस्तान की जीत और उसकी खुशी का मनाया जाना और कुछ मुसलमानों पर देशद्रोह का मामला लगाना और उन पर कानूनी कार्यवाही। यद्यपि यहां पर पूरी कामयाबी नहीं मिली सकी। इसी तरह पीछे दिल्ली में भी बाल्मिकी समुदाय और मुसलमानों में दंगा करवा दिया गया था। यह एक बड़ी चिंता का विषय है, एक धार्मिक अल्पसंख्यक के विरुद्ध एक सामाजिक (जातीय एवं प्रजातीय) अल्पसंख्यक को सफलता पूर्वक खड़ा कर देना।
यहां याद रखना पड़ेगा कि आदिवासियों, अन्य अल्पसंख्यकों और विशेषकर दलितों की कीमत, आज के सत्तासीनों की नज़र में मुसलमानों से बदतर नहीं तो बेहतर भी नहीं रही है। दलितों के मामले में हृदय परिवर्तन 2014 के संसदीय चुनाव के कुछ समय पहले से हुआ है। उसके बाद बिहार को छोड़ हर चुनाव में उसका फायदा उनको लगातार मिल रहा है। लेकिन हमको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद की शुरुआत के यही लक्षण होते हैं। धीरे-2 तमाम अल्पसंख्यकों को एक-2 करके निगल लिया जाता है और सब देखते रह जाते हैं, भले ही इसके मायने और परिणाम देश और जनसाधारण के हित में नहीं होते। आज इन ताकतों ने साम्यवादियों को लगभग समाप्त कर ही दिया है, अब ये मुसलमानों के पीछे हाथ धो कर पड़ गए हैं, क्योंकि मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है, जब यह डर कर दब जाएगा तो शेष सब दब जायेंगे। यहां मैं एक सवाल अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से भी करना चाहता हूं यदि दलित एक राजनैतिक ताकत बन सकता है तो मुस्लिम क्यों नहीं?
एक बात और समझनी चाहिए कि हर आदमी राम नाथ कोविन्द या मुख्तार अब्बास नहीं हो सकता न तो उन जैसा खुशकिस्मत और न ही उन जैसा समझौता करने में सक्षम। ये गुण कुछ ही लोगों के अंदर होते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के लिए दिन को कोविन्द साहब नामांकन पत्र भरते हैं और शाम को यह हादसा होता है। क्या यह भी एक संयोग मात्र है या किसी तरफ संकेत हैं। यहां पास्टर नेमोलर का कहा प्रासंगिक लगता है :
पहले वे सोशलिस्टों के लिए आये और मैं चुप रहा
क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था।
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फिर वे मेरे लिए आये
और तब मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं बचा था।
ल.च.ढिस्सा (सामाजिक कार्यकर्ता)