चार दिन लगातार रोने के
बाद,
आज सुबह अचानक चुप हो गया था
उसका लाड़ला;
और वह भी सो गई थी
गहरी नींद,
सोचा बच्चे को
आराम आ गया।

बच्चा, उसका बीमार हो गया था
वह रोज उसे निकट
सरकारी दवाखाने ले जाती,
और डॉक्टर साहब बिना देखे ही
दे देते,
लाल पानी, दवा के नाम पर;
बिना बिसरे
पिलाने पर भी, बच्चा
रोता ही रहा था।

क्योंकि उसके पास
‘बाज़ार’ से ‘महंगी’ दवाई खरीदने को
पैसे नहीं थे,
वह रोज डॉक्टर से
फरियाद करने की सोचती
लेकिन साहब सदा ही
झिड़क देते थे;
आज तक अथाह विश्वास –
कभी अपने भगवान पर तो
कभी बाबू बने डॉक्टर पर
कर, वह सारी-2 रातें
जागती रही थी।

आज अचानक चुप हो जाने पर
वह गहरी नींद सो गई थी,
जब जागी तो
पाया पड़ोसनें आ कर उसे
जगा रही थीं और
कोस भी रही थी;
देखो! कलमुहीं अभी भी
सो रही है, बच्चा,
गोद में मर चुका है,
अरी, यह माँ नहीं
डायन है, काल है
इतना भी याद नहीं रहा
कि बच्चा बीमार है;
उसे तो रोना भी नहीं,
आ पाया था……..?

ल.च. ढिस्सा
पतलीकुहल- 6.8.1991

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