अगर आपका इस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास है और आप भारत के संविधान को किसी भी जाति, धर्म, पंथ और पार्टी से ऊपर मानते हैं तो ये मौका है आपके पास इन राष्ट्रपति चुनावों का बहिष्कार करके अपनी आवाज़ को बुलंद करने का।

आज पुरे भारत में चैंपियंस ट्रॉफी में भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मुकाबले के बाद जिस चीज की चर्चा हो रही है वो है देश में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों की। इस बीच सरकार और विपक्ष ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं और एक कड़े मुक़ाबले की उम्मीद हो रही है। जहां रामनाथ कोविंद भाजपा समर्थित हैं और बिहार के राज्यपाल रह चुके हैं तो वहीं मीरा कुमार लोक सभा की पहली महिला अध्यक्ष रह चुकी हैं। इन दोनों में इनकी एकेडेमिक योग्यता के अलावा दो चीजें कॉमन हैं एक तो है इनका बिहार से नाता और दूसरा है दलित होना।

इन चुनावों में क्षेत्रीय वाद इतना एहमियत नहीं रखता सिवाए जेडीयू और आरजेडी की आपसी खींचतान को छोड़कर। बाकि जो बड़ी राजनीती परदे के पीछे हो रही है वो है दलित राजनीती। जिसकी आड़ में दोनों धड़े ये मान चुके हैं कि कोई भी इसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा। लेकिन एहम सवाल ये है कि ये देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े प्रतिनिधि को चुनने का चुनाव है ये किसी पंचायत के प्रधान का।

इस तरह से अचानक राजनितिक पार्टियों का दलित प्रेम जागना कोई साधारण बात नहीं है। बल्कि एक ज़िद्द है राजनीती में एक दूसरे को पछाड़ फेंकने की जिसका सबको विरोध करना चाहिए। एनडीए ने अपने समीकरण से दलित उमीदवार को सीट दी जिसका की कुछ ढर्रे की विपक्ष की पार्टियां क्षेत्रीय और जातीय समीकरण की वजह से विरोध नहीं कर पायी। उसके बाद कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के भी दलित प्रत्याशी को चुनना इनकी मंशा पर सवाल खड़े करता है। ऐसा तो कही से भी नहीं था की इन चुनावो में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण दिया गया हो जैसा आम चुनावो में होता है। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी या फिर राजनितिक महत्वकांशा थी।

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दलित जाति से होने भर का मतलब ये कभी नहीं हो जाता कि आप दलित हितेषी हो। कोविंद ने कितने दलित मोमेंट को लीड किया है या आजकल हुए दलित नरसंहार के खिलाफ बोला है। मीरा कुमार ने कब-कब दलित महिलाओं के लिए अपनी आवाज़ उठाई है या फिर एक महिला वर्ग के लिए भी कुछ आगे आकर किया हो।

समझने की ये भी जरुरत है की ऐसा अचानक देश में दलित जागरण और दलित संवेदनशीलता कहां से आ गयी। क्या ये कोई आंदोलन है की दलित अपने शोषण के खिलाफ आज देश की सबसे बड़ी कुर्सी हथिया रहे हैं। ऐसा कही से भी नहीं लगता ऐसा होता तो वो भीम आर्मी बनाने वाले युवाओं को तरह-तरह से परेशान नहीं जाता।

जब केंद्र सरकार ने एक दलित प्रत्याशी को इन चुनावों उतारा था तो विपक्ष को ऐसा प्रत्याशी उतारना चाहिए था जो इस जातिगत समीकरण से ऊपर होता। हाल के वर्षों में हम इस तरह के नाम के तौर पर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को याद कर सकते हैं। क्या 125 करोड़ के देश में एक भी योग्य इंसान नहीं था। सवाल दोनों उम्मीदवारों की काबिलियत का नहीं है। ये अपनी अपनी जगह योग्य हो सकते हैं लेकिन जिस जातीय समीकरण के चलते इनको ज़बरदस्ती काबिल बनाया जा रहा है उस पर सवाल हैं। इन चुनावों में या तो भाजपा जीतेगी (नंबर फिलहाल उसी के पास है) या कांग्रेस, हारेगा तो दलित। पिछड़े और अल्पसंख्यक को अब ये समझना होगा कि भागीदारी की राजनीती भी उनके लिए स्वर्ग के रास्ते नहीं खोलेगी। ऐसा होता तो हर दलित मायावती या रामविलास पासवान होता और हर अल्पसंख्यक ओवैसी या मुख्तार नक़वी होता।

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खैर, ये मामला सिर्फ दलितों के बीच से एक नेता उठा कर रख देने से दलितों को खुश कर देने भर का नहीं है। ये समस्त राष्ट्र का मामला है। एक राष्ट्रपति तीनों सेनाओं का चीफ होता है देश से जुड़े गंभीर मुद्दों पर उसे निर्णय लेने होते हैं। इस पद की गरिमा बचाये रखने के लिए इस पद को गैर राजनितिक बनाये रखा जाना चाहिए था। ये पद संविधान की गहरी समझ रखने वाले किसी विशेष बुद्धिमता वाले इंसान को दिया जाना चाहिए था ना कि राजनितिक पार्टियों से अच्छे सम्बन्ध रखने वाले उन्हीं के सिपाहियों को।

वर्ना क्या बात होगी कि जनता 15 अगस्त से पहले राष्ट्रपति का देश के नाम सम्बोधन सुनेगी या राष्ट्रपति का संसद में अभिभाषण को गंभीरता से लेगी। जबकि वो जान चुकी होगी कि राष्ट्रपति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं, ज़िम्मेवारी के बोझ तले दबे हुए हैं।

जो दो नाम इस अतिगरिमापूर्ण पद के लिए सामने आये हैं वो भी किसी तरह से विवादों से अलग नहीं हैं। चाहे आप मीरा कुमार के अपने पिता डिप्टी पीएम (1977–79) जगजीवन राम के नाम पर दिल्ली में बंगले का मामला या लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए तेलंगाना को राज्य की स्वीकृति देने के वक़्त लोकसभा टीवी को ब्लैक आउट करने का मामला देख लीजिये या रामनाथ कोविंद के मुस्लिम और ईसाई कम्युनिटी पर गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी या तब के भाजपा अध्यक्ष (2000-2001) बंगारू लक्ष्मण के तहलका स्टिंग में फसने पर उन्हें बचने का मामला देख लीजिये। ऐसे में इस पद पर ये नाम निश्चित तौर पर एक गंभीर सवाल हैं।

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सरकार और विपक्ष कहीं न कहीं लोगो की भावनाओं से खेलने का काम कर रहे हैं। हम सब देख चुके हैं की जब देश से जुड़े गंभीर मुद्दे संसद में होते हैं तो इनका पक्ष अलग-अलग होता है। किन्तु राजनीती को अपराधियों से दूर करने का मामला हो या नेताओं की सैलरी बढ़ाने का मामला सबके सुर एक से होते हैं। क्यों सरकार और विपक्ष एक टेबल पर बैठ कर किसी योग्य व्यक्ति को राष्ट्रपति के लिए खड़ा करने पर एक राय नहीं बना सकी, शायद इन्हें राजनीती चमकाने का मौका नहीं मिलता।

इस तरह की राजनीति से क्या देश का भला हो पायेगा। जिस राजनीती को पहले की सरकारों ने कीचड़ बना दिया था, अब उसी कीचड़ में आज की सरकारें मलबा डालने का काम कर रही हैं।

एलेग्जेंडर ढिस्सा
सह संपादक