अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिसने ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या ‘जलवायु परिवर्तन’ को ‘चीनी अफवाह’ करार दिया था, ने एक ट्वीट में कहा है कि वह पेरिस समझौते पर एक सप्ताह में निर्णय लेंगे।

अब वह क्या निर्णय लेते हैं या अमेरिका की जनता, कांग्रेस या न्यायपालिका क्या रुख अख़्तियार करते हैं वह एक सप्ताह तक पता चल ही जाएगा। यदि अमेरिका पेरिस समझौते से बाहर आने का फैसला करता है तो उसके परिणाम क्या होंगे उस पर भी पर्यावरणविद्ध तथा वैज्ञानिकों का मत अलग-2 है।

कुछ का मानना है कि अमेरिका के इस समझौते से पीछे हट जाने या न मानने से सालाना 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड की अतिरिक्त मात्रा वातावरण मेँ आएगी। जिससे पृथ्वी के तापमान मेँ वृद्धि होगी, परिणाम स्वरूप ग्लेशियर अधिक पिघलेंगे, जिससे समुंद्रों का जलस्तर बढ़ेगा जो मौसम के चरम (एक्सट्रीम) को अधिक बढ़ायेगा। कुछ वैज्ञानिकों तथा पर्यावरणविद्धों का कहना है कि कुछ साल पहले यदि अमेरिका इसे छोड़ देता तो दुनिया को अवश्य झटका लगता। लेकिन आज छोड़ देता है तो दुनिया एक स्वच्छ एवं सुरक्षित भविष्य के लिए काम करेगी।

यानि कि अमेरिकी मदद (हस्तक्षेप) के बिना अपने से जीना सीख लेगी। आज दुनिया में अधिकतर लोग ऐसे हैं जिन्हें लगता है कि अमेरिका के बिना जीना संभव नहीं है। अमेरिकी समाज व्यवस्था, जीवनपदव्ति और मूल्य उनका आदर्श बन गये थे। अमेरिकी जीवन शैली ही उनका लक्ष्य बन गया है। दूसरी तरफ अमेरिका भी यह मानने लगा था कि वह दुनिया के लिए अपरिहार्य है।

दुनिया उसके बिना चल नहीं सकती, इस लिए दुनिया के हर मामले में उसका हस्तक्षेप अनिवार्य है। इस मिथक को खत्म करने के लिए यह आवश्यक है कि जितनी जल्दी हो सके दुनिया अमेरिकी ‘वशीकरण’ से बाहर आये। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से लोग ट्रम्प साहब को इस समझौते के साथ रहने के लिए मनाने का प्रयास कर रहे हैं जिनमें पॉप फ्रांसिस तक भी शामिल हैं।

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