दुनिया के इतिहास में पहली बार पिछले पांच दिनों के अन्दर तीन नदियों को किसी जीवित व्यक्ति की तरह ही मानवाधिकार दिया गया है. नदियों के लगातार बढ़ते प्रदूषण का शिकार होते जाने के कारण यह निर्णय न्यूजीलैंड की संसद और उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने किया है. न्यूजीलैंड में वांगनुई नदी को भारत में गंगा व यमुना नदियों को जीवित व्यक्ति की तरह मानवाधिकार दिया गया है.

पहले गत 16 मार्च को न्यूजीलैंड की संसद ने स्थानीय माओरी जनजातीय समुदाय की लगभग 150 वर्ष पुरानी मॉग को मानते हुए न्यूजीलैंड की वांगनुई (टे अवा टुपुआ ) नदी को कानूनी मानवाधिकार दिया. जिसके लिए संसद में “टे अवा टुपुआ ” विधेयक लाया गया. जिसके संसद में पारित हो जाने के बाद न्यूजीलैंड की वांगनई नदी को किसी जीवित मनुष्य की तरह ही वैध पहचान और कानूनी अधिकार मिल गए हैं. अब जो भी वांगनई नदी को किसी भी तरह से हानि पहुँचाअगा, उसके खिलाफ उन्हीं कानूनी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाएगा, जिनके तहत माओरी समुदाय के लोगों को हानि पहुँचाने सम्बंधी मामलों में की जाती है. अब कानून की नजर में माओरी जनजाति समुदाय व वांगनुई नदी के बीच कोई अन्तर नहीं है. नदी का प्रतिनिधित्व दो लोग संयुक्त रुप से करेंगे. जिसमें एक व्यक्ति माओरी समुदाय द्वारा और एक व्यक्ति सरकार द्वारा नियुक्त होगा.

न्यूजीलैंड में जहां संसद ने एक समुदाय की भावनाओं को समझा, वहीं हमारे देश में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने गत 20 मार्च 2017 को अपने ऐतिहासिक फैसले में गंगा व यमुना नदियों को वैधानिक व्यक्ति मानते हुए कहा कि इन दोनों नदियों को किसी भी तरह से हानि पहुँचाना एक जीवित व्यक्ति को हानि पहुँचाना माना जाएगा. इन्हें हानि पहुँचाने पर सम्बंधित व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तरह मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाएगी. अपने पूर्व के आदेश के बाद भी गंगा मैनेजमेंट बोर्ड का गठन न किए जाने से नाराज न्यायालय ने यह आदेश दिया.

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न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश आलोक सिंह की खण्डपीठ ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड की परिसम्पत्तियों के बँटवारे से सम्बंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया. जनहित याचिका देहरादून के मोहम्मद सलीम ने दायर की थी. उच्च न्यायालय ने पैरेंट पैट्रिआई न्यायाधिकार का प्रयोग करते हुए गंगा, यमुना और इनकी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति का अधिकार व दर्जा दिया. गंगा व यमुना को दिए गए अधिकार का प्रतिनिधित्व तीन सदस्यीय समिति करेगी. जिसमें उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव , उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता व नमामी गंगे प्राधिकरण के निदेशक होंगे. न्यायालय ने इस तीन सदस्यीय समिति को इन नदियों का अभिभावक (लोको पैरेंटिस) घोषित किया.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एमसी पंत कहते हैं कि न्यायालय को किसी को भी वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने का अधिकार है. जिसके तहत ही उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने यह निर्णय दिया. पंत ने न्यायालय में बहस के दौरान गंगा व यमुना की खराब दशा पर चिंता व्यक्त करते हुए न्यूजीलैंड की संसद द्वारा पिछले दिनों बनाए गए कानून का हवाला दिया था.

उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने मोेहम्मद सलीम की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गत 5 दिसम्बर 2016 में केन्द्र सरकार को तीन महीने के भीतर गंगा मैनेजमैंट बोेर्ड गठित करने और उसे प्रभावी करने का आदेश दिया था. न्यायालय ने उस समय गंगा के उच्चतर क्षेत्रों में खनन पर भी पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया था. गत 20 मार्च को याचिका पर सुनवाई के दौरान केन्द्रीय जल संशाधन मन्त्रालय के वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त वीरेन्द्र शर्मा ने न्यायालय को बताया कि गंगा मैनेजमैंट बोर्ड गठित करने में उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई सहयोग नहीं किया. इस पर न्यायालय की खण्डपीठ ने गहरी नाराजगी दिखाते हुए टिप्पणी की कि यह नॉन गवर्नैंस के संकेत हैं. न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य सरकारों को यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि वैधानिक रुप से वे केन्द्र सरकार के आदेशों को मानने को बाध्य हैं. आदेश न मानने पर राज्य सरकारों के खिलाफ संविधान की धारा – 356 प्रभावी हो सकता है. उल्लेखनीय है कि इस धारा के अन्तर्गत केन्द्र सरकार को राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार प्राप्त है.

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न्यायालय ने कहा कि गंगा व यमुना नदियों से देश के करोड़ों लोगों का जीवन जुड़ा हुआ है. यह हमारे देश की आस्था से भी जुड़ी हुई हैं. ऐसे में इनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो रहा है तोे न्यायालय चुपचाप नहीं बैठ सकता है. इनको बचाने के लिए अब असाधारण कदम उठाने ही होंगे. न्यायालय ने हाल ही में न्यूजीलैंड की संसद द्वारा वांगनुई नदी को मानवाधिकार देने के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि गंगा, यमुना व इनकी सहायक नदियों और सम्बंधित जल स्रोतों को जीवित मानते हुए उन्हें पूर्ण मानवाधिकार दिया जा रहा है . न्यायालय ने शक्ति नहर ढकरानी (यमुना नदी ) में किए गए अतिक्रमण को भी तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश देहरादून के जिलाधिकारी को जारी किए. साथ में यह भी कहा कि यदि जिला प्रशासन 7 दिन के अन्दर अतिक्रमण नहीं हटाता है तो देहरादून के जिलाधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलम्बित माना जाय.

देहरादून के विकासनगर में रहने वाले याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीम कहते हैं,” गंगा भले ही सनातन धर्म के अनुयाइयों के लिए आस्था का केन्द्र हो, लेकिन गंगा, यमुना का महत्व इस्लाम को मानने वालों के लिए भी कम नहीं है. नदियॉ धर्म के आधार पर मनुष्य में भेद भाव नहीं करती हैं. यमुना तो एक तरह से मेरी बचपन की साथी रही है. मैं उसकी गोद में खेलकर बड़ा हुआ हूँ. चार साल पहले एक प्रॉपर्टा डीलर ने यमुना नदी के मैदान पर कब्जा कर लिया. इसके खिलाफ मैंने हर जगह शिकायत की. मंत्री व अधिकारियों के चक्कर लगाए, पर कहीं से कोई कार्यवाही नहीं हुई. हर जगह से निराश के बाद मैंने जनहित याचिका दायर कर उच्च न्यायालय का रुख किया. मैंने केवल गंगा व यमुना के किनारे से अतिक्रमण हटावाने के लिए ही याचिका दायर की थी. मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी याचिका पर न्यायालय इतना बड़ा निर्णय दे सकती है. ” सलीम की एक मुहिम ने देश के न्यायिक इतिहास में एक नया इतिहास लिख दिया.

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रिपोर्ट-जगमोहन रौतेला (वरिष्ठ पत्रकार)