उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा के मुख्यालय में आयोजित भव्य अभिनंदन समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आह्लादक भाषण सुनकर जो लोग सोच रहे थे कि अब वे सचमुच ‘और विनम्र’ या ‘और जिम्मेदार’ होकर सामने आयेंगे, साथ ही उन्हें मिले नये जनादेश को ‘जनता की सेवा का पवित्र आदेश’ मानेंगे, अब उन्हें अपना भ्रम दूर कर लेना चाहिए. कट्टर हिन्दुत्व और साफ कहें तो बहुसंख्यक आक्रामकता के ‘महानायक’ योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद का ताज पहनाये जाने के बाद साफ है कि वे और उनकी पार्टी दोनों इस जनादेश को अपने और अपने पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयोगों के लिए ही इस्तेमाल करने वाले हैं. ठीक वैसे ही जैसे 24 जून, 1991 को एक अन्य ‘महानायक’ कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाने के बाद किया था. याद दिलाना अनावश्यक है कि बहुभाषी-बहुधर्मी भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घोषित लक्ष्य है और इस लक्ष्य का पीछा करती कल्याण सिंह की उस सरकार की अंतिम परिणति 6दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई थी.

एक तरह से देखें तो यह बहुत अप्रत्याशित भी नहीं है. नरेन्द्र मोदी पंडित जवाहरलाल नेहरू की कुर्सी पर लगभग तीन साल गुजार चुके हैं और उन्हें मालूम है कि दो साल बाद ही फिर से जनता की अदालत में हाजिरी लगानी है. बशर्ते तब तक देश के लोकतंत्र पर उनकी कृपा बनी रहे और उनके मणिपुर व गोवा जैसे मन्सूबे और परवान न चढ़ें. ऐसे में वे कब तक अपनी विकास पुरुष की पुरानी पड़ती छवि और आभा खोते चुनावी जुमलों के सहारे नये-नये भ्रम रचते और निहुरे-निहुरे ऊंट चराते रहते? कभी न कभी तो उन्हें उनके खोल से बाहर निकलकर असली जिन्न को बोतल से बाहर करना ही था. उन्होंने ठीक ही सोचा, इसके लिए देश के सबसे बड़े प्रदेश में उनकी पार्टी के चैदह साल पुराने वनवास के खात्मे के मौके से बढ़कर सुयोग और कौन-सा हो सकता था?

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यों, खोल से बाहर आने की कवायद तो उन्होंने अपने प्रचार अभियान में ही आरंभ कर दी थी. कब्रिस्तान और श्मशान तक ऐसे ही तो नहीं जा पहुंचे थे. यह और बात है कि तब जानकारों ने उसे विकास के एजेंडे से उनके मोहभंग के तौर पर ज्यादा लिया था. बेहतर होता कि तभी यह समझ लिया जाता कि इस तरह वे योगी के अनेक अलोकतांत्रिक व अस्वीकार्य बयानों को उनकी मुख्यमंत्री पद संभालने की योग्यता से जोड़ रहे हैं. वरना जनसेवा का योगी का और कौन सा इतिहास या पात्रता है? प्रधानमंत्री के इस जोड़ने को इस तथ्य से भी जोड़ सकते हैं कि भाजपा पर अभी जीत का ऐसा नशा चढ़ा हुआ है कि जिन दयाशंकर सिंह को उसने मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी के लिए बाहर का रास्ता दिखा रखा था, उनकी पत्नी के विधायक बनते ही उन्हें घर-वापस बुला लिया है.

जाहिर है कि मोदी ने योगी को यूपी की कमान ऐसे ही नहीं सौंप दी है. इसके पीछे जैसा कि उनके समर्थक व सिपहसालार छिपा भी नहीं रहे, उनकी 2019 और साथ ही संघ के भावी शताब्दी समारोहों को यादगार की तैयारियां हैं. ऐसा नहीं होता तो वे इस चुनाव में कुछ तो लोकतंत्र बरतते ही. तब यह नहीं होता कि पहले वे और अमित शाह मिलकर योगी को दिल्ली बुलायें, वहीं उन्हें ‘चुन’ लें, फिर श्रीमती इंदिरा गांधी के दौर की कांगे्रसी संस्कृति की याद दिलाते हुए अपने सवा तीन सौ से ज्यादा विधायकों से मुहर लगवाकर उनमें औपचारिक आस्था व्यक्त करवा लें. उन्हें जनता द्वारा चुने गये अपने सवा तीन सौ विधायकों में अपने प्रयोग के माकूल एक अदद मुख्यमंत्री कौन कहे, उपमुख्यमंत्री भी नहीं मिला, तो कह सकते हैं कि भाजपा को कांगे्रस बनाकर भारत को कांगे्रसमुक्त करने के उनके खेल की यह इब्तिदा भर है और अभी आगे-आगे देखना होगा कि इसमें और क्या गुल खिलते हैं?

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अलबत्ता, जब तक वे इस खेल में एक साथ या अलग अलग साम, दाम, दंड और भेद अपनाएं, देश के सबसे बड़े प्रदेश को उसकी या उसके प्रतिरोध की कीमत चुकाने का मन बना लेना चाहिए. इस कारण और भी कि अभी लग नहीं रहा कि चुनावों में यों खारिज कर दिये जाने के बावजूद सामाजिक न्याय, समाजवाद, बहुजन और धर्मनिरपेक्षता के अलमबरदारों को कुछ होश आयेगा या नहीं. नहीं आयेगा और संवैधानिक मूल्यों की हिफाजत का दावा करतेे-करते उनकी यह दुराशा विराट ही होती चली जायेगी कि उनके दावे पर एतबार करने वाली जनता उनकी तमाम बदतमीजियां व बदगुमानियां झेलकर भी उनकी पक्षधरता पर संदेह न करे और इस डर से उन्हें सबक न सिखाये कि वरना उसे और दुर्दिन झेलने पड़ेंगे तो ‘नया इंडिया’ बनाने के सब्जबाग दिखाकर जड़ों की ओर लौटा ले जाने की चालाकी को विफल करने का उद्योग उनसे नहीं ही सधेगा. आखिरकार सच बोलने वालों को हराने के लिए झूठ बोलकर लाजवाब कर देने की कला राजनीति में इसी दिन के लिए तो सीखी और इस्तेमाल की जाती है.

प्रसंगवश, गत शुक्रवार को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बम्बई विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की जा रही कड़ी मेहनत की तारीफ करते हुए कह रहे थे कि राज करने लिए बहुमत की नहीं सर्वमत की जरूरत होती है तो उन्हें भी इल्म नहीं ही रहा होगा कि प्रधानमंत्री इतनी जल्दी इस जरूरत को नकार कर बहुसंख्यक आक्रामकता के पाले में जा बैठेंगे. अकारण नहीं कि अब तक ‘विकास-विकास’ की रट लगा रहे उनके भक्त इसे कल्याण के आपदधर्म की तर्ज पर उनका मैदानी दांव बताते हुए ‘देश में मोदी, प्रदेश में योगी’ का नारा उछालकर कहने लगे हैं कि प्रखर हिन्दुत्व भाजपा का स्थायी एजेंडा है और देश में किसी का भी विकास उसके इर्द-गिर्द ही हो सकता है. उन्हें विश्वास है कि योगी का राज अल्पसंख्यकों का भय दूर करने में सफल रहा तो इसका संदेश सारे देश में जायेगा. अभी कल तक वे दावा कर रहे थे कि तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा के स्टैंड से प्रभावित अनेक अल्पसंख्यक महिलाओं ने भी उसे वोट दिया है. लेकिन अब उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि यह उन महिलाओं को धन्यवाद कहने का कैसा अंदाज है कि जो उनके भय का कारण रहा हो, उसी को उनके भय दूर करने का जिम्मा दे दिया जाये!

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एक बात और. योगी का यह चयन लोकतांत्रिक नहीं है, जैसा कि कई लोग दावा कर रहे हैं. यह ठीक वैसा ही है जैसे पांच साल पहले लगभग इन्हीं दिनों बहुमत से जीतकर आयी समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे के सिर पर ताज देखने के लिए अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर उसे पार्टी विधायकों का नेता चुनवा दिया था. लोकतंत्र लोकलाज से चलता है, जबकि हमारे दौर के नेता उसे निर्लज्जतापूर्वक अपनी सत्ता की सुविधा के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और चाहते हैं कि इस इस्तेमाल को ही लोकतंत्र माना जाये. ऐसे में योगी को शुभकामनाएं देने का लोकतांत्रिक शिष्टाचार निभाना हो तो विश्वास करना चाहिए कि उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध ‘पंच परमेश्वर’ कहानी पढ़ी होगी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे तो हर फैसले के वक्त जुम्मन शेख व अलगू चैधरी की दोस्ती व फैसलों को याद रखेंगे. बूढ़ी खाला की इस बात को भी कि पंच के दिल में खुदा बसता है, जो उसकी जुबान से बोलता भी है. यह भी कि वे घोड़े की नहीं शेर की सवारी कर रहे हैं और जैसे आज यह सत्ता उनके पास आयी है, ठीक वैसे ही पांच साल पहले अखिलेश के पास भी गयी थी.

-कृष्ण प्रताप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)