धीरे-2 देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि बहुत से छोटों के अस्तित्व को खत्म करके कुछ बड़ों को पैदा किया जाये। जिस देश में पहले ही शिखर के एक प्रतिशत (1%) लोगों के कब्जे में देश की 60% सम्पति हो उसमें आगे भी तो ऐसे ही होगा। कहने को तो सरकार ‘इंक्लूसिव बैंकिंग’ और आर्थिकी की बात करती है, लेकिन नीतियां ठीक उसके उलट बनती हैं। उस देश में इस प्रकार के महाबैंक की क्या आवश्यकता है जिस देश के निम्न स्तर के 60% लोगों के पास देश की सम्पति का मात्र 2% हिस्सा है? जाहिर है, यह कार्य शिखर के लोगों को ही लाभ पहुंचाएंगी एवं सुविधाएं प्रदान करेगी।
बैंकिंग सिर्फ एक आर्थिक प्रक्रिया नहीं है और उसे सिर्फ इसी रूप से देखना भी नहीं चाहिए। बल्कि यह एक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है। इस से समाज के बैंक के साथ ही नहीं बैंक ग्राहकों के आपस में भी न सिर्फ आर्थिक अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते बनते और सुदृढ़ होते हैं। बैंक, बैंक कर्मचारियों और ग्राहकों के बीच में सिर्फ व्यवसायिक और ग्राहक के रिश्ते नहीं होने चाहिए बल्कि उससे भी आगे उनके एक-दूसरे को समझने एक-दूसरे के सहयोग और सहायता करने के सामाजिक ही नहीं भावात्मक रिश्ते भी बनने चाहिए।
बैंक के ग्राहक का बैंक से लगाव पैदा हो, यह महत्वपूर्ण बात है। उसे उस बैंक के अतिरिक्त कहीं और जाने का दिल न करे और ऐसा होता है। इस प्रकार के व्यक्तिगत संपर्कों के अन्य कई लाभ हैं। इस देश में जहां करोड़ों लोगों को अभी तक बैंक का मालूम ही नहीं, जिन्हें मालूम है, वे भी बैंक जाने से हिचहिचाते हैं। उनको किस प्रकार बैंकिंग के दायरे में लाया जा सकता है। उसके लिए यह आवश्यक है कि उन लोगों की हिचक खत्म की जाये। वह तभी संभव है, जब देश में छोटे बैंकों का अस्तित्व रहेगा।
हां! महाबैंक का एक बड़ा लाभ यह होगा कि लोगों द्वारा अपना पेट काट कर की गई छोटी-2 बचतों को इकट्ठा करके बड़े धन कुबेरों के हवाले करने में आसानी हो जाएगी और आगे फिर एनपीए, राइट ऑफ, ऋण माफ, इन्सेटिव या सुविधाओं के नाम खुली लूट कि छूट, वह सरकार के लिए आसान अवश्य हो जायेगा। यहां आज मैं अलग-2 बैंकों के कई ग्राहकों से मिला तो पता चला कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में छोटे से कार्य के लिए घण्टों लाईन में खड़े होना पड़ता है। यहां तक कि एक बचत खाता खोलने के लिए आधा दिन लग जाता है। जबकि छोटे बैंकों में यह कार्य मिनटों में से जाते हैं। वहां इज्ज़त के साथ कई बार तो चाय भी पिला दी जाती है।
नया खाता खोलना हो तो छोटे बैंकों के कर्मचारी ही सब काम करके ग्राहक को आधे घण्टे में फारिग कर देते हैं। इधर जब छोटे बैंकों का विलय बड़े बैंक में होता है तो विलय की शर्तों पर भी बड़े की पूरी धौंस चलती है। इस खेल का बड़ा खिलाड़ी अपनी शर्तें थोंपता है, जो छोटों को स्वीकार करनी पड़ती हैं। इनमें बैंकों के फंडस आदि की बात तो होती है। उस छोटे खिलाड़ी एकक के कर्मचारियों के भविष्य के बारे में तय किया जाता है, जो फिर बड़े खिलाड़ी की इच्छानुसार होता है, जाहिर है यह छोटे खिलाड़ी के कर्मचारियों के हित में अधिक नहीं ही होता है।
इस मामले में मैंने इससे पहले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय हुए सहयोगी बैंक के कर्मचारियों से बातचीत की, जो कि वर्तमान में एसबीआई में हैं। उनके अनुसार उनको विलय के बाद वित्तीय तौर पर कम्पन्सेटरी भत्ते में स्केल 2 के अफसरों को 3000/- रुपये के लगभग मासिक नुकसान हुआ था जबकि पेंशन में उन्हें 100% लाभ मिला था। लेकिन सेवा वरिष्ठता के मामले में स्केल-1 से स्केल-3 तक एक साल, स्केल-4 से स्केल-6 (उप महाप्रबंधक) तक दो साल तथा उससे ऊपर के पदों तीन वर्ष की वरिष्ठता खोनी पड़ी थी।
यह याद रखना होगा हद से ज्यादा बड़ी हर चीज कुरूप, निर्दयी और हानिकारक होती है। इसका प्रमाण जल्दी ही मिल गया। देश के तीन बड़े प्राइवेट बैंकों ने महीने में चार लेन देनों के बाद हर लेन देन पर 150 रुपये बसूले जाने का निर्णय लिया है। कुछ ऐसा ही निर्णय भविष्य के महाबैंक ने भी लिया है। लेकिन इतनी कृपा अवश्य की है, उसकी बसूली दर 50 रुपये प्रति लेन देन होगी। यह भी कि यह निर्णय सरकार के ‘डिजिटलाइजेशन’ को बढ़ावा देने के नाम पर लिया गया है। इस प्रकार ये बैंक अपने ग्राहकों को बैंकों के मनमाने निर्णयों को मानने को मजबूर कर रहे हैं।
आज से करीब दस साल पहले भी बैंकों द्वारा एटीएम निकासी पर एक सीमा के बाद तथा अन्य बैंकों के एटीएम के प्रयोग पर भी मनमानी बसूली शुरू की थी। लेकिन देश के केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के पश्चात उसे बंद करवाया गया था। इस बार भी आरबीआई से यही अपेक्षा की जानी चाहिये। एसबीआई ‘महाबैंक’ बनने जा रहा है लिखने पर मेरे कुछ एफबी मित्रों ने मेरी बातों को काटने का प्रयास किया था।
आज मैं उनको बताना चाहता हूं कि किसी संस्थान या व्यक्ति को एक सीमा से अधिक शक्तिशाली बनाने का अर्थ होता है, तानाशाही को न्यौता देना। जिसका उदाहरण है उपरोक्त देश के तीन निजी बैंकों तथा एसबीआई द्वारा लिया गया मनमाना निर्णय। इधर कुछ महीने पहले मेरे घर के पास ही स्टेट बैंक ऑफ पटियाला की एक शाखा खुली थी। प्रबन्धक भी मेरे गांव का एक युवक बना था। बेचारे ने बहुत मेहनत की और शाखा चल निकली। काफी दिनो के वाद कल जब बैंक गया तो पाया कि वहां सब कुछ बदल चुका था। साईन बोर्ड बदल कर भारतीय स्टेट बैंक का लगा दिया गया था। अंदर गया तो पता चला कि ‘महाबैंक’ ने अपने जलबे दिखाने शुरू कर दिये हैं। पहला झटका है बचत खाते में न्यूनतम बकाया यानि मिनिमम बेलेन्स जो पहले 500 रुपये होता था, अब बढ़ा कर 1000 रुपये कर दिया है।
लाल चंद ढिस्सा