इतिहास कभी भी सुविधा और पसंद का नहीं होता वरना इस देश का दलित कभी वह पसंद न करता जो आज सच्चाई के रूप में सबके सामने है। आज वह संघर्षरत है उन ज़ख़्मों को ठीक करने के लिए जो उसे इतिहास में मिले हैं। मैं 10,000 फुट ऊंचाई का रहने वाला व्यक्ति हूं। लाहौल, कभी कुल्लू, कभी चंबा अंत में अंग्रेजों के अधीन रहा। लेकिन राजपूतों के अधीन तो कभी भी नहीं रहा और लाहौल के इतिहास में राजपूतों और ठाकुरों का अस्तित्व भी ऐतिहासिक नहीं है।

इसके अलावा भी मैं तो उस समाज का भी दलित यानि महादलित होते हुए भी‘महाराणा प्रताप’ ही नहीं उसके दादा ‘राणा सांगा’ पर हद से ज्यादा गर्व करता था। क्योंकि इतिहास की पुस्तकों में मुझे पढ़ाया गया था कि महाराणा प्रताप बहुत बहादुर और स्वाभिमानी राजपूत राणा था। उसके दादा राणा सांगा के शरीर में ‘अस्सी घाव’ थे, जो उसे विभिन्न लड़ाइयों में हिस्सा लेते हुए मिले थे। इतने वीर पुरुष, सिर अपने आप झुक जाता था, लेकिन वर्तमान की राजनैतिक शासन व्यवस्था के आने के बाद जो कुछ हो रहा है उससे उस भावना और विश्वास को आघात पहुंच रहा है।

पहले पदमावती कांड, अब इतिहास को दुबारा लिखने/लिखवाने की कवायद। इस प्रकार के कार्यों ने महाराणा प्रताप और राणा सांगा की वीरता के और स्वाभिमान के प्रति दिल में जो आदर था, वह खत्म तो नहीं बहुत कम अवश्य कर दिया। यह भी उन्हीं लोगों का कृत्य का परिणाम है, कि देश के बहुत से लोगों के दिलों में जो स्वाभाविक आदर-सम्मान और श्रद्धा ‘राम’ के नाम पर थी, वह न के बराबर रह गई। मुझे याद है, एक समय था जब मेरे क्षेत्र जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक में लोगों का संवाद राम-राम से शुरू होता था।

सुबह-2 जब उठते थे, एक-दूसरे मिलते थे, कसमें खाते थे, एक ही सम्बोधन सुना करता था राम-राम। भले ही वह बेचारे शबरी के जाति के ही क्यों न हो। इधर राम का राजनैतिकरण हुआ उधर कुछ लोगों का राम के नाम पर विश्वास उठना शुरू हुआ। यह ठीक है कि इस राजनीति ने एक पार्टी विशेष को ध्रुवीकरण में सहायता की और सत्ता दिलाई लेकिन देश ने उसके बदले में बहुत कुछ खोया भी। राम ने, राम के नाम ने, रामायण ने बहुत कुछ खोया। अब यह अपनी पसंद के इतिहास लिखने का बुखार भी राष्ट्रीय प्रतिकों, स्मारकों, व्यक्तियों जिनमें शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि बहुत से उदाहरण देने योग्य व्यक्ति हो गुजरे हैं पर आज तक बरकरार आदर, सम्मान, विश्वास को भी तोड़ देगा।

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वर्तमान शासन व्यवस्था एक नया और खतरनाक प्रयोग कर रही है। देश के महापुरुषों की तुलना और  उनको आमने-सामने खड़ा करके उनके कद की नापाई करना। जैसे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और पहले गृह मंत्री, लौह-पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को आमने-सामने खड़ा कर देना। देश पटेल को भी उतना ही याद करता है जितना नेहरू को। यहां एक बात बता देना चाहता हूं कि मुझे नाम के साथ जातिसूचक शीर्षक लिखना पसंद नहीं है फिर भी पंडित और पटेल लिख रहा हूं। कारण है इन शब्दों का जो अर्थ है, वे गुण उनमें मौजूद थे। तो फिर क्यों इस प्रकार का देश और समाज को बांटने का प्रयास राजनैतिक लाभ के लिए किया जाता है। पटेल को यदि उनके हक का आदर-सम्मान नहीं मिला है तो मिलना चाहिए। लेकिन इस प्रकार नेहरू के सामने लाकर और उनकी तुलना करके नहीं।

हां! कुछ लोगों को लगता है कि इतिहास उनकी पसंद और रुचि का हो तो हमें मोहनजोदड़ो तक जाना पड़ेगा। वहां से इतिहास को बदलना पड़ेगा, पुनर्लेखन करना पड़ेगा। क्योंकि आज तक की ऐतिहासिक खोजों के परिणामस्वरूप यह प्रमाणित किया जा चुका है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता एक अलग सभ्यता थी। अब ‘कर्णी सेना’ और उनके संचालक राजनैतिक पार्टियों और विचारधाराओं को यह लिखना पड़ेगा कि उनके वंशज ही उस सभ्यता के स्वामी थे। यहां तो इतिहासकारों, ऐतिहासिक शोधकर्ताओं ने लिख दिया है कि भारत के वर्तमान निवासी विशेषकर उत्तर भारत के, आर्य प्रजाति के हैं। उनके पूर्वज आर्य प्रजाति के लोगों ने इस देश में बाहर से आकर, इस देश के मूल लोगों यानि द्रविड़ प्रजाति के लोगों को हरा कर देश पर कब्जा किया था। उसके बाद तो इस देश पर पर्शियन, हूण, शक, कुषाण, मंगोल, पठान, मुगल, फ्रांसीसी, डच, अंग्रेज़ और 1962 में चीन के आक्रमण तक सब लड़ाइयां भी तो इन्हीं लोगों (नया इतिहास लिखवाने वालों) ने जीती हैं।

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लेकिन विदेशी और देश के इतिहासकारों ने हमारे सम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए ही षडयंत्रवश ऐसा इतिहास लिख दिया। इस लिए हमें पूरा ज़ोर लगा देना चाहिए नया इतिहास लिखने पर और इतिहास की पुरानी पुस्तकों को खोज कर नष्ट कर देना चाहिए। वैसे यह इस देश के लिए कोई नई बात नहीं होगी। क्योंकि इतिहास में इससे पहले भी एक बार ऐसा किया जा चुका है, जब बुद्ध धर्म का नामोनिशान मिटाने के लिए बुद्ध धर्म से संबन्धित स्मारकों,प्रतीकों आदि को तो मिटा ही दिया गया, उसके पूरे साहित्य को भी जला दिया गया था। वह तो शुक्र था कि उसका साहित्य इस देश के बाहर संरक्षित और सुरक्षित था। चाहे तिब्बत हो या फिर सुदूर दक्षिण के देश हों। अब वहां के ग्रन्थों का सहारा लिया जा रहा है। वह भी किया गया था शंकराचार्य मिशन के अंतर्गत।

सारी दुनियां जानती है कि इस देश का इतिहास यदि कोई लिख सकता है तो वह है दीनानाथ बत्रा। राजस्थान के तीन विद्वान मंत्रियों ने प्रस्ताव रखा है कि राजस्थान का इतिहास का पुनर्लेखन हो और उसमें राजपूतों की शान और सम्मान को प्राथमिकता दी जाए शेष ऐतिहासिक प्रमाण, तथ्य, पुरातात्विक साक्ष्य सब भाड़ में जायें। उस नए इतिहास में क्या लिखा जाये उसका कुछ खुलासा भी उन्होंने किया है। नए इतिहास में दर्ज किया जाये कि 1576 की हल्दीघाटी युद्ध जो कि महाराणा प्रताप और अकबर के बीच लड़ा गया था, को महाराणा प्रताप ने जीता था।

जहां तक विद्वानों या आम आदमी का मानना है कि इतिहास सुविधा और पसंद का नहीं होता, वह सच्ची घटनाओं,तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित होता है और नहीं तो दुनियां के बहुसंख्यक इतिहासकारों की सहमति पर लिखा और माना जाता है।

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इधर ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टाड से लेकर आज तक के समस्त इतिहासकारों ने माना है कि महाराणा प्रताप एक पराक्रमी शासक था लेकिन तथ्य यह भी है कि 1576 का हल्दीघाटी का युद्ध प्रताप ने नहीं अकबर ने जीता था। अब यदि उन मंत्रियों के आदेशानुसार इतिहास लिखा जाएगा तो लिखना पड़ेगा भारत कभी भी शर्मनाक उपनिवेश नहीं बना, पानीपत, प्लासी की लड़ाइयां भी भारतीयों ने जीती, हमने इतना कुछ किया कि देश से गरीबी खत्म हो चुकी है और हमारा देश दुनियां का सबसे अमीर देश है। अंत में यह भी कि आज तक के ओलम्पिक गेमों में सब से अधिक पदक भी हमने ही जीते हैं।

इतिहास का पुनर्लेखन जैसे शगुफे भले ही कुछ राजनैतिक पार्टियों के लिए लाभप्रद प्रमाणित हों, लेकिन देश और समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरनाक खेल साबित होंगे, यह याद रखा जाना चाहिये। हां! राजनीति में कुछ चीजों का समावेश भी होता है और ध्यान भी रखा जाता है। उसमें पहली बात राजनीति सामाजिक राजनीति होनी चाहिए। दूसरी बात दूरदर्शिता, अपना निर्वाचक/निर्वाचन क्षेत्र आदि-2। लेकिन न तो ये इतिहास के हिस्से होते हैं और न बनने चाहिये।

अंत में सरकार को एक सुझाव देना चाहूंगा कि एक नया ‘इतिहास संस्थान’ खोला जाये जिसमें वे तीनों मंत्रीगण प्रोफेसर हों और श्री दीनानाथ बत्रा जी प्रिंसिपल।