दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक अरविंद केजरीवाल एक अदभूत राजनैतिक चरित्र हैं। वह हरियाणा में पैदा हुए और इंजीनियर बनते-2 सिविल सर्वेन्ट बनते-2 समाज कार्यकर्ता बनते-2 राजनेता और दिल्ली प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गए….? भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति करते-2 आज उनके एक साथी ने उनके ऊपर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाये हैं। यह उनका भाग्य है कि योग्यता या कि उनकी होशियारी……?

‘आरटीआई’, ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’, ‘लोकपाल’ आदि के मंचों पर से गुजरते हुए अन्ना, यादव, भूषण जैसे बहुत से अपने क्षेत्र के स्थापित और विश्वसनीय लोगों को सीढ़ी के रूप में प्रयोग करते हुए अद्वितीय ढंग से चुनाव जीत कर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए….? ‘भ्रष्टाचार मुक्त शासन प्रशासन’ का वादा और ‘लोकपाल’ नाम के एटम बम के नाम पर दिल्ली में आकर रह रहे देशभर के लोगों को झांसा देकर जोरदार तरीके से दिल्ली ही नहीं देश की राजनीति में प्रवेश किया। और लाख दुखों की एक दवा ‘लोकपाल’ बता कर दिल्ली के पढ़े-लिखों की आँखों में मिट्टी झौंक, कहानियों की तरह रातों रात दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गए।

‘नयी राजनीति’ देने का आश्वासन दिया। गाड़ी नहीं, बंगला नहीं, राजनीति नहीं, लेकिन सब लिया। यहां तक कि चुनाव के दौरान केजरीवाल ने अपने ‘बनिया’ समुदाय से होने को भी भुनाया। मुख्यमंत्री बने और बजाय मुख्यमंत्री के कार्यों को करने के सड़कों पर धरनों पर अधिक दिखे। फिर त्यागपत्र, दिल्ली के नए चुनाव, लोकसभा के चुनाव सब में हिस्सा लिया…..।

दूसरी बार फिर दिल्ली के चुनाव जीते, मुख्यमंत्री बने तब धरनों को भी भूल गए। अब दौड़ शुरू हुई पूरे देश में फैलने की और शुरुआत ज़ोर शोर से पंजाब से की गई। यहां उन्हें काफी गुंजाइश लगती थी, क्योंकि अकाली और भाजपा की सरकार 10 सालों से सत्ता में थी, पंजाब में नशे की समस्या बहुत विकराल हो चुकी थी, ‘आप’ के आकलन अनुसार कांग्रेस कमजोर थी। लेकिन पंजाब में फेल हो गए। दिल्ली में कमेटी चुनावों में मुंह की खाई। अब आंतरिक कलह से घिरे हुए… ?

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केजरीवाल साहब और उनके मंडली के लोग देश को ‘नई राजनीति’ देने के चक्कर में इस देश की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक सच्चाईयों को नज़र अंदाज़ कर गए। वे शायद भूल गए कि इस देश में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं बहुत गहरे और दूर तक फैली हुई हैं। वे लोग यह भी नहीं समझ सके कि संविधान में सामाजिक न्याय के जो प्रावधान किए गए हैं, उनके भी कोई मायने हैं और उनकी दूर तक आवश्यकता भी है।

यह समस्याएं कंधे उचका कर ‘टेक इट इजि’ कह देने के मामले नहीं हैं। उन मामलों ने समाज के एक बड़े वर्ग को सदियों से जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए बाध्य किया और निकृष्ठतम कार्यों को करने के लिए मजबूर किया ऊपर से उन पर कई तरह के अत्याचार किए जाते रहे। यहां तक कि इस देश की न्याय व्यवस्था भी जातीय आधार पर बंटी हुई थी, जितनी ऊंची जाति उतना उसके प्रति कानून नर्म, जितनी निम्न जाति उतने कठोर विधान।

आर्थिकी की दृष्टि से देखें तो पता चलता है कि इस देश की संपति और संसाधनों पर भी जातीय आधार पर अधिकार दिया गया था। जितनी ऊंची जाति उतनी उसके पास अधिक भू-संपति होती थी भले ही हल पर हाथ लगाना उसके लिए निषिद्ध था। जितनी छोटी जाति अव्वल तो उसके पास संपति के नाम पर कुछ नहीं होता था, यदि होता भी था तो ऐसा जिसका कोई लाभ नहीं था।

शास्त्रों में साफ लिखे गये थे वर्णों के धर्म। शूद्र का धर्म था ऊपर की तीन द्विज जातियों की सेवा तन मन और धन से करना। यह तो चार वर्णों में विभाजन था, पांचवां वर्ग था अछूतों का जिसके बारे में कहीं कोई उल्लेख तक नहीं है। उनका तो हाल ही बयान करना कठिन है। हमारे ‘नई राजनीति’ देने वाले लोग इस प्रकार की सच्चाइयों से मुंह मोड रहे थे और लग रहा था कि नई राजनीति के शोर में सब बह जाएगा, हुआ भी परन्तु थोड़े समय के लिए।

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इस नई राजनीति में संविधान में दिये गए सामाजिक न्याय के अधिकारों के विरुद्ध युवाओं को भटकाया गया। उनसे वादा किया गया कि नई राजनीति में सामाजिक न्याय के सवाल को पीछे डाल दिया जाएगा और सबको असमान सुविधाओं पर एक ही डंडे से हांका जायेगा।

 

एल.सी.ढिस्सा