अभुझमाड़ (अपरिचित पहाड़), छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के 4000 वर्ग कि.मी. का क्षेत्र। यही वह क्षेत्र है जिसे प्रचारित किया जाता है, ‘माओवादी क्षेत्र’ के नाम से। पता चला है कि इस क्षेत्र की पहली दफा ‘मैपिंग’ हो रही है।

यानि देश के आज़ाद होने के 70 वर्षों बाद पता लगाया जाएगा कि वहां कितने लोग रहते हैं, कितनी जमीन है, कितने गांव हैं? पहली बार वहां की ज़मीनों के मालिकाना हकों के बारे में रिकार्ड बनाया जाएगा। जिसे सरकार अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मान रही है। बहुतों को अजीब लग रहा होगा कि इस डिजिटल देश में आज भी ऐसे क्षेत्र और लोग हैं जिनके बारे में देश-प्रदेश के शासक कुछ नहीं जानते…?

यद्यपि इस क्षेत्र की अमूल्य जमीनों को अपने-2 चहेतों और संबंधियों में बांटने में देश-प्रदेशों की समस्त सरकारों में होड़ रही। उस क्षेत्र की ‘मेपिंग’ के कार्य को करने वाले ग्रुप के मुख्य अधिकारी नारायणपुर ज़िले के कलेक्टर महोदय वहां की कई बातों को हैरानियां (सरपराइज़) कहते हैं। जैसे कि अकवेड़ा गांव में उन्हें 32 परिवार और जमीन के 78 प्लॉट मिले। यह उनके लिए अचम्भा है। उनका मानना है कि आगे भी अन्य अचम्भे देखने को मिल सकते हैं। जब कि इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनके पास नामी-बेनामी हजारों एकड़ जमीन है।

अनुमान लगाया जा सकता है कि एक तरफ जिस क्षेत्र की और निवासियों की अनदेखी इस हद तक की गई हो और दूसरी तरफ विकास के नाम पर उस क्षेत्र के आदिवासियों को उनकी जमीनों से हटा कर अडानियो/अंबानियों के हवाले कर दिया गया हो, वह भी बिना किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति के। क्योंकि आदिवासी समाजों में भू-संपति पर स्वामित्व की अवधारणा अन्य सिविल समाजों की भांति ‘व्यक्तिगत स्वामित्व’ की नहीं अपितु ‘सामुदायिक स्वामित्व’ की है। इसलिए तथाकथिक अधिग्रहण अधिनियम के अधीन अधिकृत जमीनों का मुआवजा भी नहीं मिल पाता और कारपोरेटरों को लगभग मुफ्त में खनिजों भरी जमीने बांटी जाती हैं। वहां की जनता की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, जिसके भाग्य में सदा से लुटना-पिटना ही लिखा गया है?

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यह भी बताया गया कि इस 4000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में अनुमानत: 237 गांव और 35000 की जनसंख्या रहती है। उनके बारे में पहली बार इस तरह की आधारभूत सूचनाएं एकत्रित की जा रही हैं तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि उनके अनुसूचित जनजातीय सुरक्षाओं और सुविधाओं का क्या हुआ? विकास और प्रगति की आंधी उन तक आज तक क्यों नहीं पहुंच पायीं ? उनका हिस्सा उन तक पहुंचने से पहले किसी ने लपक लिया ?

देश में भू-सुधार के दर्जनो अधिनियम बन चुके हैं, लेकिन अफसोस उन सुधारों की एक हल्की किरण भी उन तक नहीं पहुंच पायी ऐसा क्यों हुआ ? क्या कभी वह व्यवस्था इसे संवेदना और संजीदगी से सोच पायेगी, जो उन नंगे-भूखों पर हेलीकाप्टरों से गोलियां बरसाने की निर्णय ले चुकी है ? यही सवाल मेरा अपने आप और आप से भी है ?

इन हालातों को देख, सुन और महसूस करते हुए अदम गोड्वी के गीत की ये पंक्तियां याद आती हैं : जिस शहर के मुन्तजिम अंधे हों जलवागाह के उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है। यदि इस कदम (मेपिंग) को देर आए दुरुस्त आए भी मान लिया जाये तो उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कार्य ईमानदारी से हो जिसकी संभावनाएं कम लगती हैं। भूमि का स्वामित्व वहां के लोगों को मिले न कि प्रभावशालियों, समर्थों और अन्यों के कुत्ते-बिल्लों के नाम जमीन चढ़ जाये।

 

एल.सी.ढिस्सा