28 अप्रेल, कुल्लू के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। मेरे लिए तो यह दिन बहुत खास है, क्योंकि इसके साथ मेरे अतीत की यादें जुड़ी हुई हैं। जब लाहौल से Kullu पहुंचने के साथ ही शुरू हो जाती थी पीपल मेले (Pipal Mela) की प्रतीक्षा। इस दिन से कुल्लू (Kullu) में दो दिन का ‘पीपल जातर’ (Peepal Mela) का मेला शुरू होता है । परन्तु इस साल यह कोरोना (Corona) की तालाबंदी के भेंट चढ़ गया। ज़िला कुल्लू के मुख्यालय में प्रसिद्ध ढालपुर मैदान में इस का आयोजन होता है। कुछ वर्षों से इसे ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ (Spring Festival) के नाम से मनाया जाने लगा था।

लेकिन मेरे लिए इस का महत्व और मूल्य इस लिए अधिक है क्योंकि यह मुझे मेरे बीते दिनो की याद दिलाता है। मेरे अस्तित्व के लिए किए गए संघर्ष का स्मरण करवाता है। यादें 55-60 साल पीछे चली जाती हैं। लाहौल (Lahaul Spiti) एक कठिन और गरीब क्षेत्र, साल में 6 माह दुनिया से कट (Snow Fall in Rohtang) जाता था, जो आज भी किसी हद तक जारी है। साल में एक फसल, उसकी सफलता भी निश्चित नहीं होती थी।

मेरे समुदाय के लोग अत्यधिक गरीबी के बीच से निकल कर अपना और बच्चों का पेट पालने के उदेश्य से सर्दियों के शुरुआत में कुल्लू चले जाते थे। सर्दियों में मेहनत मजदूरी करके किसी तरह दिन निकालते और मौसम के बदलने के साथ ही वापस लाहौल की ओर कूच कर देते थे। सर्दियों की शुरुआत में कुल्लू पहुंचने के साथ ही पीपल मेले की प्रतीक्षा शुरू हो जाती थी, क्योंकि यह दिन उस साल का कुल्लू में हमारा आखिरी दिन होता था।

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pipal mela in kullu

इस वापसी की योजना कुछ इस तरह बनाई जाती थी कि युवा, सक्षम तथा समर्थ लोग, जिनको खेतीबाड़ी के काम करने होते थे, वे तो बसंत के आगमन पर ही लाहौल के लिए प्रस्थान कर जाते थे। पीछे कुल्लू में महिलाएं, वृद्ध और बच्चे रह जाते थे। मेरे बचपन के समय में तो मेरे साथ-2 मेरे हम उम्र स्कूल में जाते थे। तब सुल्तानपुर कुल्लू (Sultanpur) के मठ में प्राइमरी स्कूल था, जहां हम लोग पढ़ा करते थे। इस बीच मार्च के महीने में परीक्षाएं होती थी और 31 मार्च के दिन परिणाम घोषित (Exam Results) किया जाता था। परिणाम आने के बाद हमें स्कूल में दाखिल नहीं किया जाता था, क्योंकि हमें अप्रेल के महीने में लाहौल के लिए निकलना होता था। इस लिए हम अपना-2 स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट ले लेते थे और प्रतीक्षा करते थे ‘पीपल जातर’ (Pipal Jatar) के दिन का। तब यह मेला दो दिन का ही मनाया जाता था, 28 और 29 अप्रेल।

तब तक यानि मेले के शुरू होने तक लाहौल गए हुए हमारे अविभावक भी जमीन की बिजाई आदि से निवृत हो कर परिवार के पीछे रह गए सदस्यों को लेने के लिए वापस कुल्लू पहुंच जाते थे। पीपल मेले (Pipal Mela) में सामर्थ्य अनुसार ख़रीदारी की जाती थी। जिस में सब के लिए नये कपड़े, नये जूते, लाहौल में रह रहे रिश्तेदारों के लिए उपहार अपनी भाषा में जिसे ‘तकसा’ कहते हैं, घर प्रयोग होने वाली अन्य छोटी-मोटी वस्तुएं। हम लोगों के लिए किताबें और कापियां आदि। यात्रा पैदल करनी होती थी, रास्ता कई दिनों का था इस लिए रास्ते के राशन भी खरीदा जाता था। लाहौल में रिश्तेदारियों में जाने के लिए मिठाइयां, जैसे इलाईची दाना, गरी के गोले, छुवारे आदि। विशेष खरीद का सामान होता था ‘रोहू’ लकड़ी के सीधे और साफ डंडे। क्योंकि लाहौल में ऐसी पक्की व साफ लकड़ी के डंडे नहीं मिलते थे, जिन का प्रयोग खेती व घरेलू प्रयोग के औजारों के दस्ते के रूप में किया जाता था। उन डंडों के महत्व का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वे डंडे महिला, पुरुष और वृद्ध सब के हाथों में होते थे।

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People with their GOds in Peepal Mela, kullu

जहां तक पीपल मेले (Peepal Mela) के तत्काल बाद कुल्लू छोड़ लाहौल की तरफ प्रस्थान के दबाव का प्रश्न है, इस विषय में बता दूं उसके पीछे एक कारण काम करता था। वह था एक मान्यता, लोगों का मानना था कि ‘पिपड़ेर जातुर’ के बाद लाहौल लोगों को ‘पित’ की बीमारी यानि पीलिया हो जाता है। इसके अतिरिक्त हम लोगों का ठंडे जलवायु का आदी होना, ‘भ्रेठा’ या भ्रेस के आटे (कठु या बॅकव्हीट का आटा) का खाने में सेवन आदि इसके कारण बताये जाते थे। इस लिए पीपल मेले (Pipal Mela) के दूसरे ही दिन कुल्लू छोड़ने की आवश्यकता मानी जाती थी। लेकिन आज तो लाहौल के लगभग हर परिवार का कुल्लू में अपना घर है और वे 24 घंटे बारह महीने यहीं रह रहे हैं। उस समय के पीलिया (jaundice) का आज कहीं कोई पता ही नहीं।