यह एक पत्र का हिस्सा है जो मैंने अपने एक मित्र को लिखा था ‘छरमा’ जैसे 1000 करोड़ ‘आऊटले’ वाले बड़े प्रोजेक्ट के लिए समशीतोष्ण जलवायु वाली जगह पर सेमीनार के बारे में बताने के लिए धन्यवाद। धन्यवाद इस लिए भी कि आज भी लाहौल में आप जैसे कुछ लोग मौजूद हैं जो मुझे लाहौल का समझते हैं। अन्यथा तो मेरी भूमिका आंगन की लक्षमण रेखा तक ही सीमित रही है। यह तो इतने बड़े आयोजन बात है, जो नीतियों एवं योजनाओं को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखता है। अभी  वहां तक पहुंचने के लिए संघर्षरत हूं। मेरे जैसे का तो अस्तित्व ही क्षेत्र की जनसंख्या बढ़ाने मात्र के लिए होता है। चुनाव होता है तो ‘वोट’ के रूप में होती , मेरी पहचान और गिनती, हर टिकटार्थी दावा ठोंकता है दलित वोट मेरे पास हैं। इसमें मेरे अफ्नो की भागीदारी भी कम नहीं होती, वह भी छोटे से लालच के कारण। कुछ दिनो पहले मैंने अपने एफबी पर एक पोस्ट दी थी जिसमें मैंने साफ किया था कि जहालमा जैसे लाहौल के प्रसिद्ध और बड़े गांव की मुख्य कृषि भूमि क्षेत्र में मेरे नाम एक वर्ग इंच जमीन भी नहीं आ पाई? ऐसा क्यों हुआ इसका उत्तर दूर-2 तक नहीं मिलता। लाहौल-स्पिती की बात की जाये तो यहां की तो तयशुदा परिपाटी यह है कि लाहौल के भीतर भी घाटियों, जातियों, प्रजातियों के आधार पर विभेदपूर्ण व्यवहार होता रहा है (स्पिती से तो अलग ही दुनियां की तरह व्यवहार होता है) । प्रतिनिधित्व के नाम कभी किसी ‘नग’ को रख लिया तो ठीक अन्यथा तो चलता है के ढर्रे पर चलता है मेरा सामाजिक-राजनैतिक जीवन।

आपने महत्वपूर्ण बातें उठाई हैं, लेकिन मैं पूरे विश्वास से यह मानता हूं कि ‘सामाजिक, आर्थिक, एवं राजनैतिक परिवर्तन की लड़ाइयां कभी भी वर्तमान में विद्यमान विधानों की सहायता से नहीं लड़ी जा सकतीं, वे तो सिर्फ वर्तमान व्यवस्था को खड़ा रखने में मदद करते हैं। बल्कि उन क़ानूनों को तोड़ना पड़ता है और नये इबारतें लिखनी होती हैं। अनुसूचित जनजाति के होने चलते पीईएसए या पंचायत उपबन्ध (अधिसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन जन (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनयम- 2006, जिसे संक्षेप में एफआरए या वनाधिकार अधिनियम तथा अ.जा. एवं अ.ज.जा. अत्याचार (निवारण) अधिनियम-1989 जिनके दम पर इस लड़ाई को लड़ने की बात की जाती है वे अधिनियम ही अपने आप में लम्बी लड़ाईयों के आधे अधूरे परिणाम हैं, वैसे भी मुझे नहीं लगता इन लड़ाईयों में हम लोगों का कोई योगदान रहा है।

वैसे भी लाहौल जैसे क्षेत्र के लिए यह कोई नई बात नहीं है। क्योंकि लाहौल-स्पिती की राजनीति तो आज भी कुल्लू-मनाली से चलाये जाने की परिपाटी है। मेरे जैसे कुछ सिरफिरों के समस्त प्रयासों के बाबजूद आज तक उस को तक ठीक नहीं किया जा सका है। यद्यपि हमारे नेताओं ने इस बात की पूरी कोशिश की कि एक साथ मतदान पर कोर्ट के आदेश लेकर श्रेय लिया जाये लेकिन स्थिति आज भी जस की तस है। सामाजिक आन्दोलनों से अभी हमारा परिचय ही नहीं हो पाया है। हम न तो जनशक्ति के बारे में कुछ जानते हैं और न ही उसके प्रभाव और आवश्यकता के बारे में। समस्याओं के समाधान के लिए आज तक हम या तो सत्ता की दया पर निर्भर रहे या फिर न्यायपालिका की तरफ देखते रहे हैं। जनांदोलनों से कभी वास्ता ही नहीं रहा और न ही उनकी शक्ति एवं प्रभाविता पर विश्वास।

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यहां यह बताना संदर्भहीन नहीं होगा कि उपरोक्त दो विधान (पीईएसए तथा एफआरए) देश के संविधान के सिर्फ 5वीं अनुसूची के संदर्भ में लागू हैं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि संविधान, कायदे-कानून सब गरीब, असमर्थ, कमजोर पर लागू होते हैं, समर्थ और शक्तिशाली जब चाहे उनकी धज्जियां उड़ाते रहते हैं। आज तो वे लोग भी इसके प्रभावहीन होने को लेकर आंदोलनरत हैं, यह जिनके संघर्ष का फल है और चाहते हैं कि उनको संविधान अनुच्छेद 244 (1) के बजाय अनुच्छेद 371 (371 क,ख,ग) के अधीन शासित किया जाये। यानि कि उत्तर-पूर्व के राज्यों की तर्ज़ पर। यहां हम उन अल्प प्रभावी विधानों को सहारा बना रहे होंगे। अब तो इन विधानों या अधिनियमो की प्रभाविता, उपयोगिता एवं सार्वभौमिकता पर ही सवाल उठाए जा चुके हैं। क्योंकि इन विधानों को जिस पृष्ठभूमि को आधार बना कर बनाया गया है, वही आधे-अधूरे ज्ञान पर आधारित है। इन विधानों को आदिवासियों (ट्राइब) के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनैतिक स्थितियों को ध्यान में रख कर बनाया गया है। जो किसी भी तरह इस देश के बहुत से सबसे अधिक सीमांत वर्ग के अनुकूल नहीं बैठता। इन विधानों या अधिनियमो के प्रभाविता, उपयोगिता एवं सार्वभौमिकता यदि सुनिश्चित करवानी हो तो आदिवासी (ट्राइब) और अनुसूचित जनजाति (शिडयूल्ड ट्राइब) के बीच के अंतर को समझना पड़ेगा।

यहां एक अन्य महत्वपूर्ण बात की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं और वह यह कि अपने यानि कि अनुसूचित जनजातीय दलितों के हितों के प्रतिकूल होने कारण हम उपरोक्त तीनों विधानों का विरोध करते हैं। जिसके लिए हम यानि जनजातीय दलित संघ का एक प्रतिनिधि मण्डल हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल से राज भवन शिमला में 08 जुलाई, 2016 के दिन मिले थे। उनके साथ हमने उपरोक्त विधानों की जनजातीय दलित के हितों पर प्रतिकूल प्रभावों की चर्चा की थी। उसके साथ ही अनुसूचित जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपति पर अधिकार दिये जाने की बात की थी, जो अन्यथा नहीं है। आज से पहले इन समस्याओं पर चर्चा करने की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी या हतोत्साहित किया जाता था। इस विषय में दिये प्रतिवेदन से कुछ पंक्तियां यहां दी जा रही हैं- “वर्तमान में देश में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के हित रक्षा के लिए तीन मुख्य विधान विद्यमान हैं। जिनमें पहला है अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम- 1989, दूसरा है पंचायत- उपबंध (अधिसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम- 1996 तथा तीसरा है वनाधिकार अधिनियम-2006। इनमें पहला अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों में लागू ही नहीं होता। दूसरा अधिनियम अनुसूचित जनजातीय दलितों के हितों को प्रतिकूल प्रभावित करता है। तीसरे अधिनियम में न तो वनाधिकार कमेटियों में अनुसूचित जनजातीय दलितों के लिए स्थानों का प्रावधान है और न ही भूमि पर दावों में किसी प्रकार की छूट के प्रावधान हैं।“

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इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूं कि मुझे महाराष्ट्र के दाभोल मेँ एनरान, टिहरी बांध और केरल के अनियंत्रित पर्यटन के विरुद्ध तथा सरदार सरोवर, आज़ादी बचाओ, भारत बचाओ आदि आंदोलनो का हिस्सा बनने का सुअवसर प्राप्त हुआ और पता चला कि अधिकार क्या होते हैं उनको पाने का संघर्ष क्या होता है, संघर्ष का महत्व और मोल भी जाना। यह भी जाना कि आज जिस स्थिति मेँ हूं वह किसी न किसी के संघर्षों का परिणाम है। मैंने उपरोक्त आंदोलनों में भाग लिया परंतु अपने घर यानि हिमाचल प्रदेश में इस प्रकार के संघर्ष का हिस्सा नहीं बना। इसका एक कारण है, जो मैने इन संघर्षों के दौरान अनुभव किया और वह है हम दिन भर एक साथ ‘क्रांति’ करते थे और शाम को खाने के लिए अलग-2 बैठते थे। दिन के समय हम एक हैं का नारा बुलंद करते थे और शाम को जातियों, सवर्ण और अवर्ण बंट जाते थे।

आज का विकास तो अध्यक्ष-सह-प्रबन्ध निदेशक (सीएमडी) मॉडल का है, ‘हायर एण्ड फायर’ की नीति पर आधारित। जहां मानव की नहीं कागज़ के कड़कते नोटों की कीमत है। आज के विकास के सामने किसी भी वस्तु का कोई मोल नहीं है। भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि ही विकास का पैमाना है, उनको पाने के लिए चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े। व्यक्ति की औकात जानने के लिए यह देखा जाता है कि उसने कितनी संपति अर्जित कि है। आज विकास के सामने नैतिक मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों के लिए कोई स्थान नहीं है। 2000 के नये नोट भी शायद इसीलिए चलाये गये हैं ताकि गिनती कम करनी पड़े। और भी विकास तो बड़े लोगों का होता है, छोटों के तो मुंह के लिए भी यह शब्द बहुत भारी लगता है। इस देश में तो एक और मान्यता भी रही है कि संपति संचय सिर्फ सवर्ण या द्विज ही कर सकते हैं, शूद्र नहीं। क्योंकि उनका धर्म तो उच्च वर्णीय जातियों की सेवा तन और मन से करनी होती है, धन के बारे में तो उनको सोचना ही नहीं चाहिए। शास्त्रों में यह भी कह दिया गया है कि वर्ण धर्म का पालन न करने पर वे पाप के भागीदार होंगे। क्योंकि आज का विकास का मॉडल ‘नीचे टपकने’ (ट्रिक्क्ल डाऊन) सिद्धान्त पर आधारित है। इस लिए ‘हाशिये’ के लोग तो सिर्फ जूठन की प्रतीक्षा करने को बेबस हैं। आज इस देश के शिखर के 1% धनिकों ने देश की 60% संपति पर कब्जा कर रखा है, जब कि नीचे के 50-60% निर्धनों के हिस्से सिर्फ 2% संपति आ सकी है। इस प्रकार जिसके पास भूमि नहीं है, संसाधनो तक पहुंच नहीं वह क्या विकसित होगा तो क्या विकास भोगेगा? उसके लिए तो वह कहावत लागू होती है कि नंगा क्या धोयेगा और क्या निचोड़ेगा?

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एक बात आप के माध्यम से याद करा दूं कि 2005-06 के बजट को प्रस्तुत करते हुए भारत के तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने पहली बार कहा था- ‘अब देश के लोग ‘आऊटले’ नहीं ‘आऊट कम’ चाहते हैं।’ लेकिन यहां एक पार्टी दावा करेगी कि हम ने इतना भारी ‘आऊटले’ लाया है तो दूसरा एहसान जताएगा हमने इतना भारी ‘आऊटले’ दिया है। आज के विकास के इस अंधे युग में महत्व इस बात है कि किसी परियोजना या कार्यक्रम के लिए कितना धन आबंटित किया जाता है। इस बात को कोई नहीं पूछता कि उस धन का परिणाम क्या निकला? जिस काम के लिए फंड दिया गया था क्या वह कार्य पूरा कर लिया गया है या कि वह पैसा भ्रष्टाचार के हवाले हो गया? आज की व्यवस्था उन व्यक्तियों व इकाइयों को अक्षम करार देती है जो ‘आउटले’ या आबंटित धन राशि को व्यय नहीं करता। जबकि वे लोग ओर संस्थाएं कार्यकुशल घोषित की जाती हैं जो पूरी राशि को खर्च कर देती हैं, चाहे वे उसे गढ़ा खोद कर दबा ही क्यों न दें।

इधर 1000 करोड़ की परियोजना का पदार्पण होगा उधर क्षेत्र के कुछ अतिसंवेदनशील लोग सक्रिय हो जाएंगे। कुछ नई सोसाइटियों का गठन किया जाएगा, कुछ पुरानी कमेटियों को पुनर्जीवित किया जायेगा, कुछ समूहों का जन्म होगा। कुछ ‘रिटायर्ड अफसर’ उसे फील्ड में चलवाएंगे और कुछ ‘सेवारत अफसर’ आदेश करेंगे? मैं तो समाज कार्य को समझने के लिए चौथी बार महात्मा गांधी की ‘आत्मकथा’ को पढ़ गया, लेकिन आज की तरह की समाज सेवा या समाज कार्य को नहीं पा सका? संभव है गांधी आज के भारत के लिए अप्रासंगिक हो गया हो?

अन्त में यह बता दूं कि आदिवासी अधिकारों को पाने के लिए यहां विरसा मुंडा बनना होता है, राम दयाल मुंडा, दशरथ मांझी, शिबू सोरेन, सोनी सोरी बनकर जीना पड़ता है। तब कहीं जाकर कुछ प्राप्त हो पाता है। आदिवासियों ने अंग्रेजी को मध्य भारत में तीर और पत्थरों की मदद से लड़ते हुए क्षेत्र से बाहर खदेड़ दिया था और नागपुर टेनेनसी एक्ट जैसे कानून बनाने को विवश किया था। इस तरह के संघर्षों व आंदोलनों में समाज को कई सामाजिक व व्यक्तिगत बलिदान देने पड़ते हैं। हमें यह भी याद है पिछले वर्ष पुलिस ने लाहौल के अनुसूचित जनजातीय लोगों के घरों से चार मासूम झारखंडी बाल मजदूर पकड़े थे। क्या कहते हैं यह तथ्य? यही तो करते हैं हममें से अधिकतर, सामाजिक न्याय के नाम पर कमजोरों का हिस्सा छीनते हैं। बीजता है कोई ‘वेमुला, कन्हैया’ और काटने हम पहुंच जाते हैं। कुछ ऐतिहासिक लडाइयां लड़ी हैं और जीती भी हैं।