कूड़े के ढेरों को
बीनते हैं, गलियों में
समाजवादी सड़कों पर
भीख मांगते हैं
मेरे देश के बच्चे हैं
ये हंसते नहीं।
श्रम कानूनों के साये में
कारखानों में
पूंजीपति भट्ठियों में
बूंद-2 पिघलते हैं
मेरे देश के बच्चे हैं
ये हंसते नहीं।
होटलों, ढाबों
हवेलियों में
कण-2 पिसते हैं
मेरे देश के बच्चे हैं
ये हंसते नहीं।
मैंने सुना था
कि बच्चे हंसते हैं
खिलखिलाते हैं;
लेकिन चालीस साल से
कभी-2 देखा, इन्हें
सिर्फ फीकी मुस्कान
होठों पर लाते हुये
मेरे देश के बच्चे हैं
ये हंसते नहीं।
—ल.च.ढिस्सा
18.2.1992