हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन इतना भी कमज़ोर नहीं था जितना सत्ताधारी इस मानने की गलती कर चुके थे। दुनिया भर का इतिहास उठा कर देख लीजिये की जब युवा छात्र इकट्ठे हुए हैं बड़े बड़े सिंहासन डोल गए हैं।कन्हैया कुमार से लेकर जिग्नेश मेवानी तक और शेहला रशीद से लेकर भीम आर्मी के चंद्रेशखर तक सबने अपने अधिकारों की आवाज़ उठा कर दिल्ली की सत्ता से लेकर दुनिया भर में ये ज़ाहिर कर दिया की दुनिया के सबसे युवा देश हिंदुस्तान का युवा ही सत्ता के खिलाफ खड़ा हो जाये तो बदलाव असंभव नहीं।

हम आसानी से 1975-77 की इमरजेंसी के उस दौर को याद कर सकते हैं जब सरकार की दमनचक्र नीतियों के खिलाफ एक युवा आंदोलन खड़ा हुआ था। ये वो दौर था जब देश के युवा और छात्र सबसे पहले इस आंदोलन में कूद पड़े थे और कई दिनों तक जेलों में बंद कर दिए गए थे। आज उस दौर के कई नेता हमें सत्ता और विपक्ष में दिखाई देते हैं।

सत्ता जब-जब बेखबर हो जाती है तो जनता ही अपना नेता चुन कर आंदोलन कर देती है और उसे उखाड़ फेंकने की भरपूर कोशिश करती है। यूपीए के शासन में हम अन्ना हज़ारे और अरविन्द केजरीवाल सरीखे नेताओं को नहीं भूल सकते जिन्होंने 70 साल तक राज करने वाली सबसे पुरानी पार्टी की नींव हिला कर रख दी थी। आज कांग्रेस की राजनीतिक हालत सबको पता है।

तो चलिए बात करते हैं उन युवाओं की जिन्होंने हाल के दिनों में अपने मुद्दों व नेतृत्व से देश और दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा:-

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कन्हैया कुमार 

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार बिहार से हैं और छात्र राजनीती में काफी नाम कमा चुके हैं। जेएनयू में इन पर देशविरोधी नारे लगाने के आरोप लग चुके हैं और देशद्रोह के आरोप में जेल भी जा चुके हैं। हालाँकि दिल्ली पुलिस ने मामले में अब तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं की है। कन्हैया एक बेहतरीन वक्ता हैं, जेल से आने के बाद जेएनयू में उनके दिए भाषण को खूब सराहना मिली व सभी बड़े न्यूज़ चैनल्स ने उस भाषण का लाइव चलाया था। बहुजन और कम्युनिस्ट आंदोलन को जय भीम-लाल सलाम के नारे के साथ एक मंच पर लाने की उम्मीद को कन्हैया ने पंख दिए।

गुरमेहर कौर

दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर तब सुर्ख़ियों में आयी जब उन्होंने यूनिवर्सिटी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों की मारपीट के खिलाफ आवाज़ उठाई। इसी के साथ उनका एक पुराना वीडियो भी जारी हुआ जिसमें वो अपने पिता की मौत के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान से शान्ति की अपील करती दिखीं। इस वीडियो का अपने स्तर पर विरोध और सपोर्ट हुआ लेकिन एबीवीपी मामले पर वो देश भर के छात्रों को एकत्र करने में कामयाब रहीं। हालाँकि बाद में गुरमेहर ने खुद को इन मामलों से अलग कर लिया।

 

जिग्नेश मेवानी

गुजरात के ऊना में दलितों से साथ तथाकथित गौरक्षकों की मारपीट से क्षुब्ध होकर एक दलित महा रैली का आयोजन हुआ। जिसकी बागडोर जिग्नेश मेवानी ने संभाली। जिग्नेश एक वकील हैं इनके आंदोलन ने गुजरात की तत्कालीन सरकार की जड़ें हिला दी थी। व ये सन्देश भेजा था की दलित किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं हैं। बस एक बेहतरीन नेतृत्व और दिशा की जरुरत है।

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हार्दिक पटेल

पाटीदार आरक्षण आंदोलन के युवा नेता हार्दिक पटेल का आंदोलन, दलित आंदोलन के बाद एक बेहद मजबूत वजह थी जिसने तत्कालीन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। पटेल आरक्षण की मांग को ज़ोरदार तरीके उठाया और कन्हैया व अन्य के साथ मिल कर सत्ता बदलने की उम्मीद इच्छा जताई। बेहद ही छोटी उम्र में इतने बड़े आंदोलन की नींव रखना निश्चित तौर पर भविष्य के एक बेहतरीन नेता के लक्षण हैं।

शेहला रशीद शोरा 

श्रीनगर से आकर जवाहरलाल नेहरू जैसी केंद्रीय यूनिवर्सिटी में चुनाव जीतकर अपनी पहचान बनाना एक उपलब्धि है। शेहला जेएनयू देशद्रोह मामले में खुल कर कन्हैया कुमार , उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की गिरफ्तारी के खिलाफ खड़ी हुई थीं। शेहला ने मजबूत तरीके से अपने मुद्दे और पॉइंट्स को जनता के सामने रखा। शेहला आज भी छात्रों और महिला अधिकारों के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती हैं।

 

चंद्रशेखर आज़ाद रावण

जातीय दंगो का शिकार हुए सहारनपुर में एकाएक भीम आर्मी के नाम से नयी क्रांति का उदय हुआ। पेशे से वकील चंद्रशेखर ने दलितों की इस आर्मी का नेतृत्व किया और दिल्ली में दलितों की महारैली का आयोजन कराया। भीम आर्मी की बढ़ती लोकप्रियता दलित नेता के तौर पर स्थापित बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के लिए एक चिंता का विषय जरूर है। चंद्रशेखर को लोग मायावती के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।

ये बस चंद बड़े नाम है। इन्हीं के जैसे पुरे देश में छात्र व युवा नेता उभर कर सामने आ रहे हैं। वो दिन दूर नहीं जब ये लोग भारतीय राजनीती का नया चेहरा बनेंगे। विचार भिन्न हों, मुद्दे अलग हों लेकिन इन युवाओं में देश को एक नयी दिशा में ले जाने का माद्दा है। इसी तरह नए लोगों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए ताकि राजनीती और देश को अपनी जागीर समझ बैठे नेता समझ जाएं की ये युवा हैं। जब इकट्ठे होंगे कुर्सी समेत उखाड़ फेंकेंगे।

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हमारी सरकारों को ये समझ लेना जरूरी है कि ये युवा महज हवा के झोंके नहीं हैं। ये यहां टिकने आये हैं और मजबूती से आये हैं। इनकी भीड़ में आपको हर उम्र और धर्म के लोग दिख जायेंगे तो इन्हें जनता के नेता कहना गलत्त नहीं होगा ।

एलेग्जेंडर ढिस्सा