कुछ दिन पहले अचानक टीवी चैनल पर प्रवीण तोगड़िया के साक्षात्कार का अंतिम अंश देखा। देखकर आंखों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि तोगड़िया जी रो-2 कर अपना दुखड़ा सुना रहे थे कि किस तरह उनको पता चला कि उनको पुलिस मुठभेड़ (एंकाउंटर) में मार देने का षड्यंत्र किया गया है। बाद में अखबारों से पता चला कि यद्यपि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनको मारना कौन चाहता है या उन्हें यह बताने वाला कौन था। लेकिन मुझे हैरानी यह हो रही थी कि क्या यह वही प्रवीण तोगड़िया था, जो मुसलमानों के विरुद्ध बोलते हुए बब्बर शेर बनता था। क्योंकि मैंने भी उनके कई भाषण सुने और देखे हैं।

बताया गया कि इस इंटरव्यू में तोगड़िया ने साफ कहा है कि राम मंदिर निर्माण, गौ रक्षा तथा हिंदुओं की आवाज़ दबाने के लिए उनके विरुद्ध पुराने केसों को खोला जाएगा। तोगड़िया सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री मोदी का विरोध कर चुके है, विशेषकर गौ रक्षकों को प्रधानमंत्री द्वारा असामाजिक तत्व करार देने का विरोध किया था। जब राजस्थान पुलिस ने एक कोर्ट के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए उनके घर में दबिश दी थी, तब से तोगड़िया लापता थे बाद में किसी पार्क में बेहोश पड़े मिले।

तोगड़िया ने कहा है, ‘‘मैं कानून से भाग नहीं रहा हूं। मेरे कमरे की तालाशी पर गुजरात और राजस्थान पुलिस के विरुद्ध मेरी कोई शिकायत नहीं है। क्या मैं अपराधी हूं? मैंने कोई गलत कार्य नहीं किया है। मैं अपराध शाखा से राजनैतिक दबाव में काम न करने की प्रार्थना करता हूं।’’

इस बारे में यह बताया गया है कि यह सब विश्व हिन्दू परिषद की शक्ति प्राप्त करने की आंतरिक संघर्ष का परिणाम है। जिसे 29 दिसंबर को विश्व हिन्दू परिषद के न्यासियों व कार्यकारी बोर्ड की भुवनेश्वर में हुई बैठक से जोड़ कर देखा जा सकता है। उस बैठक में अन्य विषयों के अतिरिक्त विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव भी होना था। लेकिन चुनाव नहीं हो सका और उसे टाल दिया गया।

चुनाव इसलिए नहीं हो सका था कि विश्व हिन्दू परिषद के इतिहास में पहली बार चुनाव की स्थिति बनी थी। इससे पहले एक मत से अध्यक्ष चुन लिया जाता था। इस बार अध्यक्ष पद के लिए दो प्रत्याशियों के नाम सामने लाये गए थे। पहले थे रेड्डी जो कि विश्व हिन्दू परिषद के वर्तमान अध्यक्ष हैं और अब तक दो बार अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर विराजमान रह चुके हैं। उनका नाम इस पद के लिए तीसरी बार मनोनीत किया गया था। दूसरे व्यक्ति थे कोकजे जो उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश तथा हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और वर्तमान में विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।

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विश्व हिन्दू परिषद में जहां अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव सीधे 200 न्यासियों व कार्यकारी बोर्ड द्वारा किया जाता है और अध्यक्ष आगे एक कार्यकारी अध्यक्ष को मनोनीत करता है। सही अर्थों में विश्व हिन्दू परिषद में सबसे ताकतवर व्यक्ति यही कार्यकारी अध्यक्ष होता है और परिषद के समस्त कार्यों को निदेशित करता है। प्रवीण तोगड़िया तब से परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष हैं, जब से रेड्डी परिषद के अध्यक्ष हैं। तोगड़िया जी की स्थिति परिषद में लगभग चुनौती रहित रही है। अब इस शक्ति समीकरण के गड़बड़ा जाने से तोगड़िया की स्थिति को चुनौती मिलना तय था। क्योंकि परिषद के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी कोकजे कह चुके हैं कि परिषद के  किसी भी पद पर एक ही व्यक्ति को बहुत लम्बे समय तक नहीं बिठाना चाहिये। इसी कारण तोगड़िया जो कि हिंदुओं (शायद जनेऊधारी) के समर्थन और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के विरुद्ध आग उगला करते थे, आज रो-2 कर अपनी व्यथा सुना रहे हैं। यह भी समझना ज़रूरी है कि तोगड़िया राजनीति के या हिन्दू विरोधाभास के शिकार हुए हैं? एक समय था जब तोगड़िया की स्थिति विश्व हिन्दू परिषद में सबसे मजबूत हुआ करती थी। जोकि नीचे दिये गये टेक्स्ट से साफ हो जायेगा।

यहां पर सद्प्रयास मासिक के अक्तूबर 2003 में छपे संपादकीय ‘त्रिशूल के नाम पर बौद्धिक व्यभिचार’ के कुछ अंश दिये जा रहे हैं, क्योंकि यह यहां प्रासंगिक है, यह वह समय था जब तोगड़िया ने देश में ‘त्रिशूल’ बांटने का ‘सामाजिक कार्य’ शुरू किया था। ‘‘…इस वर्ष गर्मियों के शुरू होते ही कई क्षेत्रों में पानी एक अप्राप्य वस्तु हो गई, लेकिन इस बार इस पानी का तोड़ है ‘त्रिशूल’ और इस समस्या का हल ढूंढने वाले हैं श्री प्रवीण भाई तोगड़िया। लोग यहां पानी-पानी चिल्ला रहे थे और हमारे तोगड़िया जी छह इंच के त्रिशूल बांट रहे हैं। वैसे तोगड़िया कोई नया काम नहीं कर रहे थे, इससे पहले भी कई तरह की वस्तुएं बांटने और बांटकर नाम कमाने, परलोक सुधारने के कार्य हुए हैं। फर्क इतना है कि कुछ लोग प्यार बांटते हैं तो कुछ लोग नफरत।’’

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अपने देश के द्वारा प्रजातांत्रिक व्यवस्था अपनाने के साथ ही अधिक नफरत बंटनी शुरू हुई है। लोग अपनी व्यक्तिगत सेना गठित कर रहे हैं, लाठी, तलवार व त्रिशूल बांट रहे हैं। अफसोसजनक बात तो यह है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों का पूर्ण सहयोग इस प्रकार के लोगों को मिलता है। जो इस प्रकार के गैर कानूनी कार्यों को औचित्य प्रदान करने के लिए तरह-2 के तर्क देते फिरते हैं। ‘‘…..हाल में एक समाचार-पत्र में भानु प्रताप शुक्ल का एक लेख छपा था ‘केवल त्रिशूल पर निशाना’। लेखक ने लिखा है- प्रवीण भाई तोगड़िया की गिरफ्तारी- और जमानत पर रिहाई के संदर्भ में देशवासी यह जानना चाहेंगे कि छह इंच के बेधार त्रिशूल को घातक हथियार घोषित करने वाली कांग्रेस सरकारें क्या कल सिरोपा के साथ तलवार भेंट किए जाने की परंपरा पर भी रोक लगाएंगी? क्या कांग्रेस सिखों से कृपाण छीनेंगी?’’

‘‘……शुक्ल साहब ने सिखों के सिरोपा और कृपाण पर सवाल उठाया है। क्या शुक्ल जी ने इन दोनों ‘त्रिशूल बांटने’ और ‘सिरोपा’ के संदर्भों का अध्ययन किया है? इसके अतिरिक्त भी यह समझ में नहीं आता कि इस प्रकार लेखक क्यों इन कार्यों को औचित्य देना चाहता है। कत्ल के जुर्म को यह कह कर कि दूसरे ने कत्ल किया है, औचित्य प्रदान नहीं किया जा सकता। अगर लेखक के तर्क को मान भी लिया जाए तो कल को एके-56 बांटने को भी उचित और वैध ठहराना होगा और अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा तब किस प्रकार की अराजकता फैलेगी…?’’

‘‘…….इसके अतिरिक्त लेखक ने एक महत्वपूर्ण बात लिखी है- ‘जन जागरण के कई माध्यम हैं: संभाषण, भजन-कीर्तन, प्रदर्शन, शस्त्र, शिक्षा-दीक्षा आदि। जनजागरण का उपयोग सामाजिक निर्भीकता तथा राष्ट्रीय दायित्वबोध निर्माण करने में होता है।’ यहां पर मैं श्री शुक्ल जी से निवेदन के साथ कहना चाहूंगा कि दायित्वबोध या समाज, देश के प्रति प्रतिबद्धता, घृणा फैलाने से नहीं बल्कि प्यार बांटने से होता है। त्रिशूल बांटने से नहीं, एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटने से होता है। दादागिरी से नहीं बराबरी से होता है। इसी लेख में लेखक लिखता है- ‘प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल किसी सत्ता या सरकार के भरोसे छोड़ा जा सकता है। जब तक आम जनता अपने दुश्मनों को नहीं पहचान लेती, उनसे लड़ने के लिए कमर नहीं कस लेती क्या तब तक देश की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी हो सकती है?’ उनके इस कथन को सही मान लें तो स्थिति अराजकता से अधिक कुछ नहीं हो सकती। सरकार, सत्ता, संहिता, संविधान, विधान का कोई अर्थ नहीं है, कोई औचित्य नहीं। हर आदमी अपनी मनमानी करे क्या यह उचित होगा?’’

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‘‘……..श्री तोगड़िया ने राजस्थान के कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए दिल्ली में न केवल त्रिशूल बांटे अपितु जहर उगलता हुआ भाषण भी दे डाला। क्या इस प्रकार के लोगों के विरुद्ध अदालत की अवमानना का मामला नहीं बनता? क्या इस तरह के लोगों के विरुद्ध देशद्रोह का मामला नहीं बनता? क्या इस प्रकार के कार्य ‘पोटा’ को आकर्षित नहीं करते? तोगड़िया जैसे लोगों का अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान सब सिर्फ एक रह गया है मुस्लिम विरोध और सिर्फ मुस्लिम विरोध।’’

चलते-चलते: समाचारों से पता चला है कि राजस्थान सरकार ने तोगड़िया के विरुद्ध केस तीन साल बाद कोर्ट में प्रस्तुत किया। यह सेक्शन 144 का केस जून, 2015 में वापस लिया गया था। लेकिन शासन-प्रशासन के कार्यकुशलता के चलते, तोगड़िया के विरुद्ध फिर से गैर-ज़मानती वारंट जारी किए गये….तोगड़िया जी लापता हो गये…..फिर प्रकट भी हुए….टीवी के सामने रोये गिड़गिड़ाए……सरकारें पिघल गईं और……? यहां जो हो जाए कम समझें।