नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर उन राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की याचिका का विरोध किया है, जिन्हें आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया गया हो। सरकार ने तर्क दिया कि अयोग्यता की अवधि तय करना पूरी तरह से विधायी नीति का विषय है और इसे संसद के अधिकार क्षेत्र में ही रखा जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

यह हलफनामा 2016 में वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसमें उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दोषी नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए।

धारा 8 और 9 क्या कहती हैं?

  • धारा 8 के तहत, यदि कोई व्यक्ति निर्दिष्ट अपराधों में दोषी पाया जाता है, तो उसे सजा पूरी करने के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाता है।
  • धारा 9 के तहत, जो सार्वजनिक सेवक भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति निष्ठाहीनता के कारण बर्खास्त किए गए हैं, वे पांच साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होंगे।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यह अयोग्यता आजीवन होनी चाहिए।

सरकार ने याचिका का क्यों किया विरोध?

सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि “आजन्म प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं, यह पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है।”

केंद्र का कहना है कि संसद ने “अनुपातिकता और तार्किकता” के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए अयोग्यता की अवधि तय की है। “दंड की अवधि को एक उचित समय तक सीमित करके निवारण (डिटरेंस) सुनिश्चित किया जाता है और अत्यधिक कठोरता से बचा जाता है।”

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क्या यह संविधान के खिलाफ है?

सरकार ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 और 9 पूरी तरह संवैधानिक रूप से वैध हैं। ये न तो “अत्यधिक अधिकार-हस्तांतरण” से ग्रसित हैं और न ही संसद के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

सरकार ने आगे कहा, “याचिकाकर्ता की मांग का अर्थ है कि वह छह साल की अयोग्यता को आजीवन में बदलना चाहता है, जो कि न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है और किसी भी संवैधानिक सिद्धांत से मेल नहीं खाता।”

क्या कोर्ट संसद को कानून बनाने का आदेश दे सकता है?

केंद्र ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की मांग “संविधान के सिद्धांतों के विरुद्ध है,” क्योंकि अदालतें संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। केवल यह तर्क कि याचिकाकर्ता को वर्तमान प्रावधान अपर्याप्त लगते हैं, उन्हें असंवैधानिक नहीं बना देता।

सरकार ने यह भी कहा कि विभिन्न दंड कानूनों में भी अयोग्यता की अवधि सीमित होती है और इसमें कोई असंवैधानिकता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

लगभग दो हफ्ते पहले, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि “राजनीति का अपराधीकरण एक गंभीर मुद्दा है।” पीठ ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की कि “राजनीतिज्ञ खुद ही कानून बना रहे हैं, जिससे इसमें हितों का टकराव हो सकता है।”

अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या फैसला सुनाती है।