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आपसी सहमति से निकालें राम मंदिर का हल: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली. राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद एक ऐसा विवाद है, जिसकी आंच में भारतीय राजनीति आजादी के बाद से ही झुलसती रही है. दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी, जिसका मुकदमा आज भी कोर्ट में लंबित है. राम मंदिर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर दोनों पक्षों से कोर्ट के बाहर ही मामला सुलझाने को कहा है.

वहीं मुख्य न्यायधीश जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि, ‘दोनों पक्षों को मिल-बैठकर इस मुद्दे को कोर्ट के बाहर हल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि जरुरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट के जज मामले में दखल देने को तैयार हैं.

गौरतलब है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि पिछले छह साल से लंबित राम मंदिर मुद्दे पर सुनवाई हो और जल्द फैसला सुनाया जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि, ‘यह मामला धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है. लिहाजा दोनों पक्ष आपस में बैठकर कोर्ट के बाहर ही मामले को सुलझा लें.’ जस्टिस खेहर ने कहा कि अगर बाहर मसला नही सुलझ पाता है तो सुप्रीम कोर्ट के जज मध्यस्थता करने के लिए बैठे हैं. इस मुद्दे पर अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी.

दूसरी ओर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कोर्ट में उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि, ‘राम जहां पैदा हुए मंदिर वहीं बन सकता है, बल्कि मस्जिद कभी नहीं बन सकता है. नमाज सड़क पर भी पढ़ा जाता है. हमें उम्मीद है कि मुस्लिम समुदाय इस साकारात्मक प्रस्ताव पर विचार करेगा.’

मंदिर-मस्जिद को लेकर कब, क्या हुआ?

1528 में अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुगल सम्राट बाबर ने ये मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसका नाम बाबरी मस्जिद पड़ा.

1853 में हिंदुओं ने आरोप लगाया की भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ. इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई. 1859 में ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी.

1885 में मामला पहली बार अदालत में पहुंचा. महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की. 23 दिसंबर 1949 को करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी. इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे. मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया.

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी. उन्होंने वहां से मूर्ति हटाने पर न्यायिक रोक की भी मांग की. 5 दिसंबर 1950 को महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया. 17 दिसंबर 1959 को निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया.

18 दिसंबर, 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया. 1984 को विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया. एक समिति का गठन किया गया.

1 फरवरी, 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए. नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया. जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया. 1 जुलाई, 1989 को भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया. 9 नवंबर 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी.

25 सितंबर, 1990 को बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए. 1990 में आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया. बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. सिंह ने वाम दलों और बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई थी. बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

अक्टूबर 1991 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया. 6 दिसंबर 1992 को हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दी, जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया.

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