इसे सांस्कृतिक ‘पुनर्जागरण’ कहें या कि ‘समर्पण’, लाहौल के तांदी में चन्द्रा और भागा नदियों के संगम स्थल पर पिछले दो सालों से मनाया जाने वाला संगम पर्व 29.06.2018 को सम्पन्न हो गया। बताया गया है कि इस बार समारोह कुछ फीका सा रहा। दर्शकों और बाहर के विशेष मेहमानों की उपस्थिति भी कम रही। विशेषकर बाहर के कथित गणमान्यों की कमी रही। इसके अतिरिक्त भी पिछले दो सालों के बराबर प्रचार-प्रसार भी नहीं हुआ। केंद्रीय और प्रदेश के मंत्रियों यहां तक कि भाजपा नेताओं में भी कोई नहीं गया, शासन-प्रशासन का भी सहयोग नहीं दिखा। पिछले वर्षों की तरह 108 संगीतकारों के शामिल होने की हवा भी निकल गई। शुभ संकेत।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम यह जो सांस्कृतिक अस्तित्व के समर्पण का कार्य हो रहा था, उसे लाहौल के लोगों ने नकार दिया, बधाई। यहां एक बात ध्यान में लाना आवश्यक है कि अस्तित्व, न सिर्फ भौतिक अपितु सांस्कृतिक भी आवश्यक है। लाहौल एक विचित्र क्षेत्र रहा है जिसने मोरावियन मिशनरियों के आधी शताब्दी से अधिक के प्रयास को नकार दिया था। पूरे लाहौल में सिर्फ एक परिवार ईसाई बन सका था, शेष लाहौल अपने में संतुष्ट रहा।

एक और बात है यह जो मुख्यधारा में शामिल करने/होने के नाम का खेल खेला जाता है, वह अनैतिक भी है और अनुचित भी। एक तरफ मुख्यधारा के नाम पर बड़ा समूह छोटों को हजम करता है, वहीं छोटे समूह के चंद लोग अपने व्यक्तिगत, जिसमें आज तो राजनैतिक फायदे भी शामिल हैं के लिए पूरे समुदाय के न सिर्फ हितों बल्कि अस्तित्व को समर्पित करने का प्रयास करते हैं। इसी बात के चलते समाज में लोगों का व्यवहार भी अंतर्विरोधी हो जाता है। जिसका एक उदाहरण है लाहौल के कुछ लोगों द्वारा ‘ट्राइबल कस्टम’ की दुहाई देकर समाज के आधे हिस्से यानि महिलाओं को पैतृक सम्पति में हिस्सा दिये जाने का विरोध करना, दूसरी ओर वही लोग ‘ट्राइबल कल्चर’ का बिना शर्त मुख्यधारा में विलय के लिए सक्रियता से प्रयत्नशील रहते हैं। इसके अतिरिक्त भी सांस्कृतिक पुनर्जागरण, जिसके साथ कुछ हित जुड़े हुए होते हैं, जो अल्पसंख्यक (सिर्फ धार्मिक नहीं) समुदायों के लिए सदा ही अहितकारी होता है। क्योंकि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम पर संस्कृति के उन्हीं पहलूओं को उबारा और उकेरा जाता है जो बहुसंख्यकों के हित और अल्पसंख्यकों के हितों के विपरीत होते हैं।

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‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ एक सच्चाई है और समस्त प्रकृति में यह व्याप्त है। संघर्ष तो संघर्ष होता है, सदा रूप बदलता रहता है। आज दुनिया के हर कोने में अस्तित्व का संघर्ष चल रहा है। संघर्ष तो निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, पहले भी थी, आगे भी रहेगी। लेकिन आज इसकी दिशा, दशा और गति में अंतर आया है। इसका बड़ा कारण है सभ्यता के इस मोड़ पर संचार क्रांति का उदय। जिसने दुनिया को बहुत छोटा बना दिया है। आज इस तरह की संभावनाएं जताई जा रही हैं कि एक बटन के दबाते ही दुनिया बदल सकती है…? यह हो भी रहा है, सोशल मीडिया और साइबर क्राइम इसके उदाहरण हैं।

वैसे भी अस्तित्व तो अस्तित्व होता है, यह सिर्फ एहसास नहीं है, बल्कि आवश्यकता भी है। केंद्रीय भारत के आदिवासी क्षेत्रों में चल रहा ‘पत्थलगढ़ी’ आंदोलन इसका जीता जागता नमूना है। यह एक ऐसा संघर्ष है जो तथाकथित अधिक सभ्य समाज को जताना चाहता है कि आदिवासी ‘मुख्यधारा’ का हिस्सा तो बनना चाहता है, लेकिन अपने अस्तित्व की कीमत पर नहीं, अपना अस्तित्व बरकरार रखते हुए। वह किसी नदी की तरह समुद्र में अपना अस्तित्व खोना नहीं चाहता। जीव, विशेषकर इंसान और निर्जीव में इतना अंतर तो रहना ही चाहिए। नहीं तो मानव, मानव न रह कर रोबोट बन जायेगा।

अपना तो उद्देश्य है ‘समानांतर सह-अस्तित्व’ पर आधारित ‘समाज विविधता’ की व्यवस्था की स्थापना।