क्या जातीय गोलबन्दियों की सपा व बसपा की राजनीति अब उन पर ही भारी पड़ने लगी है? मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में तो कुछ ऐसा ही लगता है, जहां सपा में यादवों व बसपा में चमारों के वर्चस्व से आजिज गैरयादव पिछड़े व गैरचमार दलित भाजपा के पाले में जाते दिखायी दे रहे हैं. पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले इस जिले में इससे स्वाभाविक ही भाजपा की बांछें खिल गयी हैं.

आंकड़ों के अनुसार जिले की दस विधानसभा सीटों में कुल मिलाकर 32 लाख वोटर हैं, जिनमें बाईस प्रतिशत के आसपास यादव, इतनी ही दलित जातियां, 24 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियां, लगभग 18 प्रतिशत मुस्लिम और आठ प्रतिशत सवर्ण बताये जाते हैं. इनमें यादव अभी भी आम तौर पर सपा के साथ ही नत्थी हैं और उन्हें चुनाव प्रचार में मुलायम की गैरहाजिरी या उनकी पार्टी पर अखिलेश के कब्जे से कोई फर्क नहीं पड़ा है. उनके लिए पिछले दिनों सपा में हुए तख्तापलट का घर के दो सदस्यों में ‘टुन्न फुन्न’ से ज्यादा महत्व नहीं है. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अलग अलग विधानसभा क्षेत्रों की अलग अलग स्थितियों के अनुसार सपा व बसपा में विभाजित हो रहे हैं, जबकि सपा में यादवों और बसपा में चमारों के प्रभुत्व से असहज गैरयादव पिछड़ी और गैरचमार दलित जातियांे का मुंह भाजपा की ओर हो गया है.

इन जातियों के रुख में भाजपा के पक्ष में जो बदलाव गत लोकसभा चुनाव के वक्त चोरी-छुपे आना शुरू हुआ था, वह अब इतना प्रत्यक्ष है कि पिछले चुनावों में सवर्ण आधार के भरोसे हाशिये पर सिमटी रहने वाली भाजपा इस बार चमत्कार का दावा करने लगी है. उसके नेताओं की मानें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस सिलिंडर देने वाली ‘उज्ज्वला’ योजना ने उनको इन जातियों के बीच पैठ बनाने का मजबूत आधार प्रदान किया है, जिसका लाभ उठाकर वे न सिर्फ सपा बसपा में आहत हुए उनके स्वाभिमान को सहला रहे बल्कि भाजपा में समरस बरताव का विश्वास भी दिला रहे हंै.

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उनका दावा है जिले में हालत लगभग वैसी ही हो गयी है, जिससे चिढ़कर सपा के बड़बोले नेता आजम खां ने गत दिनों फैजाबाद में अल्पसंख्यक मतदाताओं से कह दिया था कि वे बसपा को वोट देकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मार रहे हैं? बेहतर हो कि सीधे भाजपा को वोट दें, जहां उन्हें बदले में ‘कुछ ज्यादा इज्जत’ मिल जायेगी.

भाजपा के सूत्रों की मानें तो उसका और गैरयादव पिछड़ों व गैरचमार दलितों का रिश्ता मुसलमानों से उसके रिश्ते जितना एकतरफा भी नहीं है. मुसलमानों के शून्य के विपरीत उसने इन जातियों को ‘पर्याप्त टिकट’ भी दिये हैं.

जमीनी हकीकत पर जायें तो आजमगढ़ में ये जातियां भाजपा की ओर इसलिए भी आकर्षित हैं कि अखिलेश के राज में गैरयादव पिछड़ों व दलितों के उत्पीड़न में प्रभुत्वशाली यादव सवर्णों से कहीं आगे निकल गये हैं. इसी तरह गैरचमार दलितों को शिकायत है कि बसपा में अल्पसंख्यकों की ही तरह उनकी वफादारी को संदेह की निगाह से देखा जाता है और मायावती की चमार बिरादरी को जरूरत से ज्यादा तरजीह दी जाती है. फिर भाजपा में उनकी सवर्णों जैसे हिन्दू होने की चाह को भी भरपूर सहारा मिल जाता है.

आगे चुनाव का नतीजा जो भी हो, बसपा व सपा को हर हाल में मजा चखाने के इन जातियों के ‘संकल्प’ से जिले में चुनावी मुकाबले बहुत कड़े हो गये हैं. सपा के लिए 2012 के विधानसभा चुनाव से आगे निकलने की चुनौती से पार पाना कठिन हो रहा है, जब उसने जिले की दस में से नौ सीटें जीत ली थीं. कई अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में डालने का अखिलेश सरकार का फैसला तो, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है, उसके गले की फांस बना ही हुआ है, पार्टी को कांग्रेस से गठबंधन का भी कोई लाभ मिलता नहीं दिखता. क्योंकि कांगे्रस के वोट उसे ट्रांसफर नहीं हो रहे. इसे भांपकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंगलवार को जिले में ताबड़तोड़ सात सभाओं को सम्बोधित किया और अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की.

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दूसरी ओर भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव से आगे निकलने के लिए एड़ी-चोटी एक किये हुए है, जब नरेन्द्र मोदी की लहर के बीच उसने मुलायम सिंह यादव के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर उनके यादव वोटबैंक को करारी क्षति पहुचायी थी. अलबत्ता, इस सिलसिले में बसपा को भी छुपे रुस्तम से कम आंकना ठीक नहीं है क्योंकि 2012 में मायावती सरकार के प्रति ऐंटीइन्कम्बैंसी के कारण जमीन खो बैठने के पहले आजमगढ़ उसका भी गढ़ हुआ करता था. सोमवार को उसकी सुप्रीमो मायावती आजमगढ़ पहुंच कर दोहरा गयी हैं कि उन्हें सपा व भाजपा दोनों से 2012 व 2014 का बदला लेना है.

दूसरे पहलू पर जायें तो आजमगढ़ के अनेक शहरियों को गिला है कि भाजपा आजमगढ़ को बेवजह ‘आतंक के गढ़’ के रूप में प्रचारित करती रही है. सो भी जब वह अपनी पहचान से मुलायम सिंह यादव या मायावती को जोड़ता ही नहीं है. वे कहते हैं कि तमसा नदी के तट पर स्थित यह ऐतिहासिक शहर साहित्य और कला के साथ गंगा-जमुनी संस्कृति का अपनी तरह का अनूठा केन्द्र रहा है, जो जितना राहुल सांकृत्यायन का है, उतना ही कैफी आजमी का भी. उसकी पहचान ऋषि दुर्वासा से जुड़ी है तो दत्तात्रेय से भी. वह अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के नाम पर गर्व करता है तो शिबली नोमानी के नाम पर भी.’ वे पूछते हैं कि भाजपा आजमगढ़ को बदनाम करके आजमगढ़ से जीतने की सोच भी कैसे कर सकती है? इसका जवाब फिलहाल भाजपा ही दे सकती है.

-कृष्ण प्रताप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

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