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राष्ट्रपति अंगरक्षक नियुक्ति पर फूटा लोगों का गुस्सा; दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक नहीं हो सकते भर्ती

सोशल मीडिया पर इन दिनों राष्ट्रपति अंगरक्षक की नियुक्ति का मामला काफी जोर पकड़ रहा है। जिसमें ये बताया जा रहा है कि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक इसमें भर्ती नहीं हो सकते अमर उजाला की खबर के बाहर आने के बाद लोगों का इस अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही प्रथा का भरपूर विरोध हो रहा है।

बहुजन हितों के लिए काम करने वाले पत्रकार व समाजसेवी दिलीप मंडल इस पर रोष जताते हुए इस तरह की जातिवादी परंपरा को समाप्त करने की अपील करते अपने फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, “यह भी कोई देश है महाराज? राष्ट्रपति भवन में इस समय अनुसूचित जाति का एक नागरिक बैठा है। लेकिन अनुसूचित जाति का कोई शख़्स उनकी सुरक्षा करने वाली अंगरक्षक टुकडी में तैनात नहीं हो सकता। आदिवासी भी नहीं। पटेल, अहीर, मौर्य, कुम्हार, तेली कोई नहीं। मुसलमान, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी भी नहीं। ”

एक अन्य यूज़र भारत अमन संविधान का हवाला देते हुए लिखते हैं कि किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति पर सभी नागरिकों का अधिकार है।

“राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी 16(2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उदभव, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर ना तो कोई नागरिक अपात्र होगा और ना उससे विभेद किया जायेगा।”

इसके अपवाद स्वरूप राज्य को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के लिये विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति हैं।

भारत में जातिगत भेदभाव किस कदर और कहां-कहां भरा हुआ है इसकी पूरी जानकारी लोगों को आजादी के 70 साल होने तक भी पता नहीं चल पाई है। एससी, एसटी और माइनॉरिटी का पीएमओ में उच्च पदों पर भी प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है। हालांकि सरकारें इसे जातिवाद नहीं मानतीं। अभी हाल ही में भारत को दूसरी बार दलित राष्ट्रपति मिले हैं। लेकिन उनके अंगरक्षक आदिवासी, अल्पसंख्यक नहीं हो सकते।

इसमें साफ दिखाई देता है कि अनुसूचित जाति का कोई शख़्स राष्ट्रपति की सुरक्षा करने वाली अंगरक्षक टुकडी में तैनात नहीं हो सकता। आदिवासी भी नहीं। पटेल, अहीर, मौर्य, कुम्हार, तेली कोई नहीं। मुसलमान, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी भी नहीं। यह भारत सरकार का नियम है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।

आपको बताते चलें कि हरियाणा के रेवाड़ी के एक यादव युवक ने सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि हम इस फ़ौज में क्यों नहीं जा सकते। इसपर सेना ने 2013 में हलफ़नामा दाख़िल किया कि यह सही है कि तीन जातियों के लोगों को ही राष्ट्रपति का बॉडीगार्ड बनाया जाता है। “लेकिन यह जातिवाद नहीं है।”

 

राष्ट्रपति अंगरक्षक नियुक्ति पर फूटा लोगों का गुस्सा; दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक नहीं हो सकते भर्ती

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