उत्तर प्रदेश में गत रविवार को राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में नयी सरकार के शपथ ग्रहण का जश्न था तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ का और उसे होना भी इन्हीं दोनों का चाहिए था, लेकिन हुआ कुछ ऐसा कि भाजपाई ‘देश में मोदी, प्रदेश में योगी’ के गगनभेदी नारों में ही खोये रह गये और महफिल का सारा मजा प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के संस्थापक व संरक्षक मुलायम सिंह यादव लूट ले गये, अपने बेटे अखिलेश यादव के साथ! सो भी, जब उन्हें और उनके बेटे अखिलेश को छोड़कर किसी विपक्षी पार्टी का कोई बड़ा नेता समारोह में मौजूद ही नहीं था.

यों हुआ कुल मिलाकर इतना ही कि शपथग्रहण खत्म होने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ पकड़ा और उन्हें वहां मौजूद मुलायम और अखिलेश यादव के पास ले गये. इसके बाद मोदी ने न सिर्फ मुलायम व अखिलेश से हाथ मिलाया और मुलायम से गले मिले, बल्कि अखिलेश की पीठ भी थपथपाई. इसी दौरान मुलायम ने अखिलेश की ओर इशारा करते हुए प्रधानमंत्री के कान में कोई ऐसी बात कही कि वे जोर से हंस पड़े. फिर तो माहोल ऐसा खुशगवार हुआ कि अमित शाह मुलायम का हाथ पकड़कर योगी के पास ले गये, जहां उन्होंने और अखिलेश ने योगी से हाथ मिलाकर उनको बेहद गर्मजोशी से बधाई दी.

पुराने दिन होते तो इसे चुनाव नतीजों द्वारा बदल डाली गयी परिस्थितियों में दोनों पक्षों के सामने उपस्थित लोकतांत्रिक शिष्टाचार के प्रदर्शन की जरूरत से जोड़कर देखा जाता और सवाल उठते कि उन्होंने यह जरूरत मजबूरी में पूरी की या सदाशयतापूर्वक? लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान न सिर्फ सपा व भाजपा बल्कि मुलायम व अखिलेश तक के रिश्तों में नजर आयी भीषण कटुता की रौशनी में कोई भी इस शिष्टाचार को सामान्य ढंग से नहीं ले सका. इस कारण और भी कि मुलायम परिवार के झगड़ों के लम्बे अरसे बाद लोगों के लिए मुलायम व अखिलेश को एक साथ मुसकुराते हुए देखना, सो भी भाजपा के मंच पर, किसी अजूबे से कम नहीं था. दोनों जिस तरह हाथ हिला-हिलाकर जनता का अभिनंदन कर रहे थे, वह और भी अजूबा था. अखिलेश यादव योगी के शपथ लेने से पहले मंच पर पहुंचे, तो उन्होंने सभी विधायकों से मुलाकात भी की.

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उस वक्त यह सब देखने वालों को अपनी आंखों पर विश्वास करना कठिन हो रहा था. वे समझ नहीं पा रहे थे कि यही परिणति होनी थी तो अभी थोड़े ही दिनों पहले तक ये सपा व भाजपा नेता एक-दूसरे के खिलाफ आग क्यों उगल रहे थे? जो भी हो, समारोह खत्म हुआ, तो सबसे ज्यादा चर्चा इसी की थी कि मुलायम अखिलेश की ओर इशारा करके मोदी के कान में क्या फुसफुसाये और अखिलेश का हाथ पकड़कर उनके पास क्यों ले गये? ये पंक्तियां लिखने तक अधिकृत तौर पर तो दोनों पक्षों में से किसी की ओर से भी इस बाबत कुछ नहीं बताया गया है लेकिन नेताओं व कार्यकर्ताओं की अनौपचारिक वार्ताओं में और सोशल मीडिया पर इस बाबत कई मजाक चल निकले हैं. चुटकियां लेने वालों ने इस पर तंज भी खूब किये हैं. इनमें से एक मजाक यह है कि मुलायम ने कहा, ‘अच्छा किया कि आपने चुनाव मैदान में रगड़कर इसकी भूसी छुड़ा दी। बड़ा उद्दंड हो गया था आजकल. मेरे कहे-सुने में भी नहीं रह गया था. लेकिन अब अक्ल आ गयी है इसे. इसलिए कहा-सुना माफ कर दीजिए इसका.’ तो एक चुटकी यह कि मूर्ख जनता इन्हीं नेताओं के लिए आपस में लड़ती-झगड़ती रहती है? वे तो जब चाहते हैं, एक दूजे के गले का नाप लेते-लेते गले मिल लेते हैं.

लेकिन एक भाजपा कार्यकर्ता ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा, ‘मोदी ने पिता और पुत्र दोनों के साथ वैसा ही सलूक किया जैसा किसी विजयी सम्राट को पराजित राजाओं के साथ करना चाहिए.’ जबकि एक सपाई की प्रतिक्रिया थी कि ‘हमारे सिंह उनके सिंहासन पर भी अपनी छाप छोड़ आये.’

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यों, कई और मजाक भी हवा में थे. मसलन, मुलायम ने पीएम से पूछा कि अब जब इसके यानी अखिलेश के कस-बल निकल गये हैं, इसे भाजपा में ले सकते हैं आप? ले लेते तो मेरी सपा मुझे वापस मिल जाती.’ एक और मजाक के अनुसार उन्होंने निवेदन किया कि अब तो हम आपके शरणागत हैं. मैंने बिहार में आपकी बात मान ली थी और अब यूपी में आप मेरी बात मान लीजिए. दिलोदिमाग में कोई कटुता मत रखियेगा और मुझे या इस अखिलेश को सीबीआई आदि के झमेले में मत फंसाइयेगा.’

ये हंसी मजाक अपनी जगह रहें, लेकिन लोगों को आश्चर्य है कि प्रधानमंत्री द्वारा कट्टरहिन्दुत्व के योगी जैसे पैरोकार को प्रदेश की कमान सौंपे जाने के बावजूद मुलायम और अखिलेश की ओर से अभी तक भाजपा या प्रधानमंत्री के प्रति कोई कटु या तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी है. मुलायम ने सिर्फ इतना भर कहा है कि देखेंगे, भाजपा अपने वायदे कैसे पूरे करती है और अखिलेश ने इतना भर कि जनता बुलेट ट्रेन के बहकावे में आ गयी. बड़बोले आजम खां ने भी यह कहकर आग बरसाने से परहेज कर रखा है कि जिस पार्टी को जनादेश मिला है, उसका अधिकार है कि वह जिसे चाहे नेता चुने और मुख्यमंत्री बनाये.

इससे लोग प्रदेश की राजनीति में जल्दी ही कुछ अप्रत्याशित घटने का अंदाजा लगा रहे हैं लेकिन वह क्या होगा, इसकी फिलहाल किसी को भी भनक नहीं है. प्रसंगवश, जानना चाहिए कि मुलायम और भाजपा के सम्बन्ध जैसे भी हों, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनके प्रेम और घृणा के मिले-जुले सम्बन्ध हैं. सपा के पारिवारिक झगड़ों में उलझाव के दौर में गत 28 दिसंबर को उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था, ‘मोदी बहुत कष्ट झेलकर यहां तक आए हैं ओर साधारण परिवार से हैं. यह और बात है कि भाजपा ने अपने वादे पूरे नहीं किये हैं.’ लेकिन उससे पहले 23 नवंबर को उन्होंने एक रैली में कहा था, ‘मोदी घमंड में चूर हो गए हैं. मैं उनसे कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री जी, घमंड में ना चूर हों और अपनी नीतियों में संशोधन करें. लोकतंत्र में मनमानी नहीं चलती. हिन्दुस्तान की जनता अनपढ़ व गरीब जरूर है लेकिन दुनिया की सबसे समझदार जनता है.’ उससे भी पहले मुलायम और लालू के परिवारों में वैवाहिक सम्बन्ध जुड़ा तो प्रधानमंत्री मुलायम के न्यौते पर उनके घर गये थे. तब अखिलेश की बेटियों को लाड़ करती उनकी तस्वीर बहुत चर्चित रही थी. लेकिन अब जिस तरह वे और योगी सपा के अन्य पिछड़ी जातियों के आधार का खात्मा कर रहे हैं, उसके मद्देनजर दोनों के नये रिश्ते आगे क्या मोड़ लेंगे, भविष्यवाणी मुश्किल है.

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-कृष्ण प्रताप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)