नई दिल्ली. राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के सीनियर नेता महेंद्र सिंह माहरा ने आरोप लगाया कि राज्य निर्माण के दौरान तत्कालीन सरकार ने बंटवारे में भेदभाव किया. उन्होने कहा उत्तराखण्ड की जनता को आज भी यह नहीं समझ सकी है कि राज्य में बहने वाली नदियां, 31 सिंचाई नहरों जिनका प्रारम्भ व अन्त राज्य में है, कई जल विद्युत परियोजनाओं, बांधों, तालाबों, राज्य में बने 14000 हजार कार्यालय व आवासीय भवन राज्य में होते हुए भी राज्य का उनपर कोई अधिकार नहीं है.

उन्होने आगे कहा, ‘तत्कालीन केन्द्र वर्तमान सरकार ने उत्तराखण्ड की 13026 हैक्टेअर सिंचित भूमि राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दी जबकि संविधान की धारा 3 में स्पष्ट लिखा है कि बॅटवारे के समय जो सम्पत्ति जिस राज्य में होगी उसपर उसका अधिकार होगा. उत्तराखण्ड की सम्पत्तियों व संसाधनों पर दूसरे राज्य के अधिकार की समय सीमा निर्धारित न करना भी जानबूझकर की गई साजिश है.’

सदन में शून्यकाल के दौरान के सदन को संबोधित करते हुए उन्होने कहा, ‘राज्य हमारा और सम्पत्ति और संसाधन पर अधिकार तुम्हारा यह परिपाटी ठीक नहीं है। पानी हमारा परन्तु उसपर बनने वाले बाॅध से होने वाली कमाई पर भी राज्य का हिस्सा नहीं है. उदाहरण के लिए टिहरी बांध से पैदा होने वाली बिजली की कमाई का 25 प्रतिशत हिस्सा भी उत्तर प्रदेश को दिया जा रहा है. राज्य सृजन के समय में गठित कमेटी पूर्वाग्रहों से ग्रसित थी अन्यथा जो परिसम्पत्तियां उत्तराखण्ड में हैं उनपर अधिकार भी उत्तराखण्ड का ही होना चाहिये था परन्तु ऐसा नहीं है.

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उन्होने कहा, ‘उत्तराखण्ड के साथ राज्य की परिसम्पत्तियों के बॅटवारे के समय सौतेला व्यवहार हुआ है. राज्य के संसाधनों पर मिलने वाली रायल्टी व अन्य लाभ उत्तराखण्ड को मिलने चाहिये जो नहीं मिल रहे हैं. माननीय उच्च एंव उच्चतम न्यायालय ने भी उत्तराखण्ड राज्य के पक्ष में निर्णय दिया है परन्तु विधायिका माननीय न्यायालयों के निर्णय की अवमानना कर रही है.’

सदन के माध्यम से उन्होने सरकार से आग्रह किया कि राज्य के अन्तर्गत जो भी सम्पत्ति व संसाधन उपलब्ध हैं उनपर उत्तराखण्ड को पूर्ण अधिकार दिया जाय अन्यथा राज्य की जनता अपने को ठगा महसूस करेगी. केन्द्र सरकार उत्तराखण्ड की परिसम्पत्तियों व संसाधनों को राज्य को सौंपे.