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लाहौल स्पिती विधान सभा क्षेत्र एक नज़र में

लाहौल-स्पिती विधानसभा क्षेत्र जनसंख्या के लिहाज से हिमाचल प्रदेश का सबसे छोटा परंतु क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा विधानसभा क्षेत्र का प्रजातांत्रिक इतिहास भी इसके विशेष भौगोलिक व स्थालाकृति की अलग ही तरह का है। 1947 में देश के स्वतंत्र होने और 1950 में संविधान के लागू होने के साथ देश में संसदीय प्रजातन्त्र की स्थापना हो गई। सम्पूर्ण देश के नारिकों को वैश्विक व्यस्क मताधिकार प्राप्त हुआ।  एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य की व्यवस्था हुई। लाहौल-स्पिती जो 1840-46 के आंग्ल-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश राज्य में शामिल कर लिया गया था और तब यह ब्रिटिश या पंजाब लाहौल-स्पिती कहलाता था। वैसे तो स्पिती को भी अंग्रेजों के द्वारा एक इकाई के रूप में गठित किया गया था। जो 1950 के बाद एक  प्रशासनिक इकाई के रूप में इसे अधिक संगठित किया गया।

1950 में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थापित होने के बाद 1952 में पहले चुनाव हुए। तब लाहौल-स्पिती को अलग से पंजाब विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिला था। बल्कि इसे कुल्लू विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत  ही रखा गया। 1952 के पहले चुनाव में लाहौल-स्पिती के लिए पोलिंग बूथ क्लाथ, ज़िला कुल्लू में स्थापित किया गया था। हां! लाहौल-स्पिती को संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अनुसार शासित करने के लिए ‘पंजाब ट्राइबल एड्वाइजरी काउंसिल’ नाम की एक संस्था का गठन किया गया। जिसके सदस्यों के चुनाव हुआ करते थे राज्य (पंजाब) का मुख्यमंत्री उस काउंसिल का अध्यक्ष होता था। उस परिषद की समय-2 पर बैठक हुआ करती थी और सरकार क्षेत्र का प्रशासन उसी की सलाह से चलाती थी। यह व्यवस्था लाहौल-स्पिती के 1966 में हिमाचल प्रदेश में मिलाये जाने तक चलती रही। 1952, 1957 और 1962 तक पंजाब विधानसभा में लाहौल-स्पिती का कोई प्रतिनिधि नहीं होता था।

लाहौल-स्पिती विधानसभा क्षेत्र में आज 2017 में कुल 23000 के लगभग मतदाता हैं। जिनमें 11447 महिला और 11402 पुरुष हैं। यह विधानसभा जैसे ऊपर बताया गया है कि क्षेत्रफल के अनुसार हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा और जनसंख्या के अनुसार सबसे छोटा क्षेत्र है। इसका क्षेत्रफल 13833 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या 31564 (2011 जनगणना) है। जनसंख्या का घनत्व 2.3 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। यद्यपि पुरुषों की तुलना में महिला मतदाता अधिक हैं लेकिन लिंग अनुपात देश के अन्य भागों की तरह ही है यानि प्रति हज़ार पुरुषों पर 916 स्त्रियां हैं। इस क्षेत्र की क्षेत्र की कुछ विशेषताएं हैं। लाहौल-स्पिती में 62.01% बौद्ध 36.91% हिन्दू, 0.67% इसाई तथा 0.41% अन्य धर्मों के अनुयायी रहते हैं। पूरी स्पिती घाटी में लगभग 98% बौद्ध हैं, जबकि लाहौल में जाहलमा गांव से ऊपर का लाहौल, मयाड़ नाला, गाहर, तोद व तिनन-रंङलो में बौद्ध बहुसंख्यक हैं। हिन्दुआओं की समस्त आबादी लाहौल में ही रहती है उसमें भी गांव जाहलमा से नीचे का क्षेत्र जिसमें पुराने हिमाचल का क्षेत्र भी शामिल है में तथा जाहलमा से ऊपर तान्दी तक कुछ गांवों में छुटपुट सी है। आमतौर पर बौद्ध समुदाय हर तरह से हिन्दू समुदाय से आगे है।

जहां तक प्रजातांत्रिक प्रक्रिया की बात है पंजाब के दौरान तो विधानसभा में लाहौल-स्पिती का प्रतिनिधि नहीं जाता था। लेकिन 1.11.1966 को इसके हिमाचल प्रदेश में शामिल किए जाने के बाद 1967 के चुनावों के बाद यहां से विधायक चुनकर जाने लगे। 1967 से 2012 तक चुनावों में 1967, 77, 82 तथा 1985 में देवी सिंह ठाकुर, 1972 में स्व. लता ठाकुर, 1990 और 1993 में फुंचोग राय, 1998 और 2007 में रामलाल मार्कण्डे 2003 में रघुबीर सिंह तथा 2012 में रवि ठाकुर ने इस क्षेत्र का प्रतिनिध्त्व किया।

जहां तक संबंध है लाहौल और स्पिती क्षेत्रों का तो बता दिया जाये कि ये दोनों क्षेत्र लगभग हर क्षेत्र में काफी भिन्नता लिये हुये हैं, वह भौगोलिक, स्थालाकृतीय, सांस्कृतिक दृष्टि से पर्याप्त तौर पर भिन्न हैं। यहां तक कि दोनों क्षेत्रों की भौगोलिक दूरी भी पर्याप्त है। एक इकाई से दूसरे इकाई तक पहुंचने के लिए आमतौर पर 6 जिलों कुल्लू, मंडी, बिलासपुर, सोलन, शिमला तथा किन्नौर को पार करना पड़ता है। जहां लाहौल में जनसंख्या स्पिती की तुलना में अधिक हैं। इस लिए विधानसभा प्रतिनिधित्व भी लाहौल के पास अधिक समय रहा है। 1990 और 1993 के अलावा क्षेत्र का प्रतिनिधि लाहौल से ही रहे हैं। जबकि 1990 और 1993 में स्पिती से फुंचोग राय विधायक बने थे। इसके अतिरिक्त इस दौरान एक बार 1972 में लता ठाकुर एक महिला ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। एक अन्य बात इस का नेतृत्व एक बार देवी सिंह ठाकुर के पुत्र रघुवीर सिंह तथा एक बार लता ठाकुर के पुत्र रवि ठाकुर भी कर चुके हैं। उन दोनों के परिवारों की राजनैतिक पृष्टभूमि रही है। जबकि रवि ठाकुर 2017 में भी कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। जैसे कि बताया गया है कि क्षेत्र में 62.01% बौद्ध आबादी निवास करती है इसलिए 11 विधान सभा अवधियों में 9 बार बौद्ध समुदाय के सदस्यों ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।

इस चुनाव क्षेत्र की एक अन्य विशेषता यह भी है कि स्पिती क्षेत्र से आमतौर पर कोई प्रत्याशी दावा नहीं करता। इसका कारण क्या हो सकता है, यह समझना चाहिए। इसका कारण एक तो इस क्षेत्र में अभी राजनैतिक चेतना का अभाव है। इसलिए इस मामले में यहां के लोग अनिच्छुक रहते हैं। एक अन्य कारण यहां की मतदाता संख्या भी है, जो लाहौल के मुक़ाबले एक तिहाई से भी कम है। अब क्योंकि लाहौल एवं स्पिती अलग-अलग पड़े रहते हैं और आपस में किसी भी तरह की अंतर्क्रिया नहीं हो पाती, सांस्कृतिक भिन्नता के कारण आपसी अलगाव और फिर राजनैतिक तौर पर आगे आने की हिचकिचाहट। इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि लाहौल स्पिती के स्थाई निवासी अनुसूचित जनजातीय दलित, जिनकी जनसंख्या 7 से 10% तक की है आज तक प्रतिनिधित्वहीन ही रहे हैं, जो सहभागी गणतन्त्र में उचित नहीं कहा जा सकता।

लाल च ढिस्सा

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