यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
अपने सीने के पवित्र
लहू से ही लिखता हूं।
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
धरती के कठोर
सीने पर ही लिखता हूं।
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
कल्पना को नहीं
कटु सत्य ही लिखता हूं।
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
परी कथाएं नहीं
शोषण-दमन का इतिहास लिखता हूं।
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
वादियों और महलों की नहीं
मरू औ’ झौंपड़ियों की व्यथा लिखता हूं।
यूं तो मैं लिखता ही नहीं
यदि कभी कुछ लिखूँ तो
उत्सव, मस्ती की बात नहीं
दर्द, आंसू, विध्वंस कथा लिखता हूं। (शमशी, 24.4.1992)