हिमाचल प्रदेश के विधान सभा चुनावों के युद्ध की अनौपचारिक घोषणा काफी पहले से हो चुकी है। दिल्ली से चुनाव आयोग के जिम्मेदार अधिकारी आकर यहां हिमाचल प्रदेश के चुनाव विभाग और अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से विचार विमर्श कर उन्हें इस विषय में आवश्यक दिशा निर्देश दे चुके हैं। अब तो सिर्फ औपचारिक घोषणा व आचार संहिता के लागू होने की प्रतीक्षा मात्र रह गई है। इधर प्रदेश की कुल जमा दो राजनैतिक पार्टियों के अलग-2 गुट अपनी-2 पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं से मिल कर अपना-2 रोना र चुके हैं चुके हैं और केंद्रीय नेतृत्व के एकता बनाए रखने के आदेश भी सुन चुके हैं।
दो दिन पहले 3 अक्तूबर, 2017 को देश के प्रधानमंत्री हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऊना में आईआईआईटी तथा कंदरोडी में स्टील इकाई की आधारशिला रख गए हैं। यद्यपि भाजपा को उनसे कुछ अधिक अपेक्षाएं थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने इतना कुछ नहीं फैका जिसे लपेटना कठिन हो जाता। वैसे भी यह दौरा प्रधानमंत्री का सरकारी दौरा था। इसलिए इस दौरे में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत सरकार के अन्य मंत्रियों के साथ उन्हें मंच सांझा करना पड़ा। बताया जाता है कि सरकारी कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जी ने ‘हरी’ पट्टी की टोपी पहन रखी थी, जो बाद में बदल कर ‘लाल’ पट्टी की हो गई थी। याद रहे हिमाचल प्रदेश की राजनीति अपनी ही तरह की अलग है। जिसमें प्रतीक भी चलते हैं और ‘टोपी’ भी एक अनौपचारिक राजनैतिक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त होती। टोपी पर ‘हरे’ रंग की पट्टी को वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ तथा ‘लाल’ पट्टी को पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ जोड़ कर देखा जाता है।
जहां देश के अन्य राज्यों में राजनीति जाति, धर्म आधारित की जाती रही है। यहां की राजनीति रोजगार की राजनीति रही है। यानि कि सरकारें जो भी आई प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की ही राजनीति का आधार बनाया गया। इसीलिए कर्मचारी और प्रदेश की जनसंख्या का अनुपात अन्य राज्यों से अधिक ही है। 70 लाख की आबादी वाले राज्य में सरकारी कर्मचारियों की संख्या लगभग 2 लाख है और पेंशनरों की संख्या लगभग 1.5 लाख है। इसी लिए प्रदेश के बजट का अधिक भाग भी उन्हीं पर व्यय होता है। प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की राजनीति पर बहुत अच्छी पकड़ है। जिस भी पार्टी का साथ कर्मचारी देते हैं उसकी जीत लगभग निश्चित हो जाती है। सरकारी कर्मचारियों का चुनाव परिणामों व राज्य की राजनीति को प्रभावित करने की ताकत का अनुमान पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार को प्रदेश की राजनीति से सदा के लिए बेदखली से लगाया जा सकता है।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है, क्षेत्रवाद ऊपर तथा लोअर हिमाचल। ऊपर हिमाचल में जहां सेब पैदा करने वाला शिमला, किन्नौर, रामपुर क्षेत्र, कुल्लू, लाहौल-स्पिती तथा जनजातीय क्षेत्र भरमौर आता वहीं पर लोअर हिमाचल में कांगड़ा, मंडी, चम्बा जैसे बड़ी जनसंख्या वाले क्षेत्र तथा ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर तथा सोलन मैदानी क्षेत्र आते हैं। इस अप्पर और लोअर के राजनैतिक असंतोष को कम करने के उदेश्य से ही धर्मशाला में विधान सभा का सेशन लगाए जाने का फैसला लेना पड़ा था।
एक समय में राज्य में एक अच्छी ताकत रही भाकपा आज कहीं नहीं दिखती। जबकि भाकपा (एम) की राजनीति शिक्षा संस्थानों तक ही सीमित है, उसे आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। पिछले एक-दो चुनावों में बसपा बड़े शोरगुल के साथ सामने आई थी, लेकिन बहुत कुछ हासिल नहीं कर पाई। 1977 में कांग्रेस के विरोध में एक मोर्चे के रूप में बनी जनता पार्टी ने तब कांग्रेस को तो सत्ता से हटा दिया लेकिन आगे जनता पार्टी के घटक संभल नहीं पाये और उस सब का लाभ तब का जनसंघ और आज भाजपा ने उठाया है। उसके पश्चात एक बार फिर उसी तर्ज़ पर प्रयोग करने का प्रयास किया गया। इस बार जनता दल के घटक दल और वाम मोर्चा साथ आया और एक तीसरा मोर्चा बनाया गया। मजे की बात यह है कि जनता दल जिसके चुनाव समिति का एक सदस्य मैं भी था के हिस्से में कुल 68 विधानसभा सीटों में 51 सीटें आई और 17 सीटों पर वाम मोर्चा लड़ा और परिणाम एक स्पष्ट और बड़ी असफलता।
राज्य में अभी तक धर्म, जाति और प्रजाति पर आधारित राजनीति पांव नहीं जमा पाई है। आज राज्य में सिर्फ दो ही पार्टियों का अस्तित्व है, कांग्रेस और भाजपा। लेकिन राज्य के लोगों ने राष्ट्रीय पार्टियों के साथ होने के बावजूद अपनी ‘पहाड़ी’ संस्कृति को बरकरार रखा हुआ है। राज्य के लोगों ने भी शायद विकल्पहीनता के चलते कुछ समय से मन बना रखा है कि राज्य की सत्ता इन दो पार्टियों को बारी-2 से दी जाये। 2012 जहां कांग्रेस को सत्ता सौंपी गई थी, इस बार लगता है कि भाजपा बाजी मार ले जाएगी। यद्यपि अभी तक दोनों पार्टियों के अंदर गुटबंदियां और अन्य समस्याएं चल ही रही हैं। जहां कांग्रेस में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सुक्खु के बीच अभी सिर्फ युद्ध विराम हुआ है। वहीं पर मोदी जी ने आकर केंद्रीय मंत्री जेपी नड़ड़ा की ओर संकेत करके, राज्य भाजपा में चल रहे धूमल, नड़ड़ा गुटबंदी को हवा ज़रूर दी है।
यह तो समय ही बताएगा कि पार्टियों के आपसी गुटबंदियों का क्या होता है, टिकिटार्थियों का क्या बनता है और क्या राज्य स्तर पर किसी तीसरी ताकत का उदय होता है। जो अभी भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। यही सब है जो चुनाव में हार-जीत को भी तय करेगा और राज्य की सत्ता किस के पास जाएगी उसके बारे में भी। पता चला है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अंदर जोश भरने के लिए प्रदेश में आ रहे हैं। तब तक हम राज्य चुनावों पर कुछ और चर्चा करते रहेंगे।