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हिमाचल प्रदेश में तीसरी शक्ति की आवश्यकता भी और सम्भावना भी है

हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव जो कि 9 नवंबर को हुए थे, लोगों ने कितने उत्साह के साथ मतदान किया था इस बात का अनुमान उनके द्वारा मतदान में हिस्सेदारी से लगाया जा सकता है, रिकार्ड 75% मतदान हुआ था। लेकिन 9 नवंबर से 18 दिसंबर तक उनका मत पेटियों में बंद रखा गया, पता नहीं उनका अपराध क्या था। अब तक तो उनमें बहुत से लोग तो लगभग भूल भी चुके थे कि उन्होंने मतदान भी किया था जिसका परिणाम आना बाकी है। खैर! 18 दिसंबर को उनके मतों की गिनती और शाम तक परिणाम भी घोषित कर दिये गए। इस बार के चुनाव कई अर्थों में अपनी ही तरह के रहे। सबसे पहले तो चुनाव आयोग का भेदभाव पूर्ण व्यवहार। इन चुनावों ने यह तो साफ कर ही दिया कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त अभी तक किसी नई शक्ति का उदय नहीं हो पाया है। साथ-2 प्रदेश के मतदाताओं ने दो पार्टियों को बदल-2 कर सत्ता सौंपने का क्रम भी जारी रखा।

इस बार के चुनाव में गुजरात की भांति नोटबंदी, जीएसटी जैसे निर्णय हिमाचल प्रदेश में चुनावी मुद्दे नहीं बन सके। स्वभाव अनुसार ‘मंदिर-मस्जिद, जनेऊधारी हिन्दू और अन्य भावनात्मक तथा भड़काऊ वक्तव्य भी चुनावी मुद्दे नहीं बने। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान शान्त वातावरण बना रहा और स्थानीय व विकास के मुद्दों पर बातें होती रहीं। यहां पर कांग्रेस की इस तरह की हार और भाजपा की जीत के कारण गुजरात से नितांत अलग थे। गुजरात में जहां दोनों पार्टियों का बहुत कुछ दाव पर था, यहां दोनों पर इतना दबाव नहीं था। न कोई मोदी लहर थी और न ही राहुल के युवा नेतृत्व की आशाओं का उत्साह था। यहां तो लोगों ने वही किया जो उनके मन में बैठा हुआ था, हर पांच साल बाद परिवर्तन और दूसरी पार्टी को मौका। कांग्रेस के इस हद तक हारने के कुछ अतिरिक्त कारण अवश्य थे। जिनमें मुख्य थे आपसी फूट, जिसमें वीरभद्र सिंह सदा की भांति भारी पड़ते रहे। वीरभद्र सिंह ने कभी भी सामूहिक नेतृत्व में विश्वास नहीं किया। वह तो राजवाड़ाशाही पर विश्वास करते थे और अपने प्रतिद्वंदियों को उगने ही नहीं देते थे। जिसका ताजातरीन उदाहरण है उनके द्वारा अपने पुत्र की राजनैतिक स्थापना। वीरभद्र सिंह ने 2012 में सत्ता सम्भालते ही सबसे पहला जो काम किया वह था अपने पसंद के रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाना। 2012 से 2017 के बीच राजा साहब का चहेता कोई भी ब्यूरोक्रेट सरकार से बाहर नहीं गया, उन्हें सेवा विस्तार या पुनर्नियुक्ति दी गयी। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुखबिंदर सुक्खू ने हाल में चुनाव जीतने बाद दिये एक इंटरव्यू में यह बात कही है।

इस बार जैसे विदित ही था, मतदाताओं ने कांग्रेस को सत्ता से हटा कर भाजपा को दो तिहाई बहुमत से जीताकर सत्ता पर बिठा दिया। लेकिन जहां प्रदेश में भाजपा का कमल खिल गया वहीं पर उसके मुख्यमंत्री घोषित प्रत्याशी और पूर्व में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके प्रेम कुमार धूमल साहब मुर्झा गए। यानि कि वह हार गए। अब इसे धूमल साहब का भाग्य कहें या फिर कोई और तिकड़म यह जान पाना कठिन होगा। यह हार बहुत ही अप्रत्याशित एवं अचंभित कर देने वाली है। यह हार तब हुई जबकि लोगों को ज्ञात था कि इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार बननी है और धूमल उस पार्टी के मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार हैं और भी चुनाव के दौरान ही उनको मुख्यमंत्री घोषित करवाने के लिए भी बहुत बड़ा ज़ोर डाला गया तब कहीं चुनाव प्रचार के मध्य में धूमल साहब के नाम की घोषणा की गई। इतना सब होने के बाद इस तरह की हार से क्या यह समझा जाये कि हिमाचल भी गुजरात की राजनीति को सीख चुका है।

इस चुनाव के परिणामों का कांग्रेस को भले ही नुकसान हुआ हो, उसे सत्ता से हटा दिया गया हो, लेकिन उसके नेता और मुख्यमंत्री वीरभद्र को तो लाभ ही लाभ हुए हैं। उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। अपने लिए एक अन्य सुरक्षित सीट का प्रबंध किया है, जहां से वह स्वयं जीत गए हैं। अपने बेटे को हिमाचल कांग्रेस के युवराज के तौर पर अच्छे से स्थापित कर दिया है और जिसकी शुरुआत उसकी पहली जीत से कारवाई है। वैसे तो कांग्रेस के लिए परिवारवाद कोई मुद्रा ही नहीं है। इस विषय में वीरभद्र सिंह स्वयं भी कह चुके हैं कि यह सब योग्यता पर निर्भर करता है और यदि उत्तराधिकारी के अंदर योग्यता हो तो उसे बढ़ाना चाहिए। फिर उसके लिए चाहे जो कुछ भी करना पड़े, अनुचित नहीं है। इसे संयोग भी कहा जा सकता है या नियोजित कार्य कि राज्य कांग्रेस के अंदर वीरभद्र सिंह के जितने भी विरोधी थे, एक आध अपवाद छोड़ सब हार गए या सीन से बाहर हो (कर दिये) गये। उनमें कौल सिंह, जीएस बाली, एक समय के कट्टर विरोधी मेजर मनकोटिया आदि हार गए और विद्या स्टोक्स को रिटायर होने पर मजबूर कर दिया गया और उनके चुनाव क्षेत्र ठियोग से माकपा प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित की गई ताकि भविष्य में भी वहां से कोई क़दावर कांग्रेसी नेता पैदा न हो सके। जो वीरभद्र की योजना अनुसार ही हो सकता है। हां! इस विषय में एक अपवाद कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुखविंदर सुक्खू रहे जो चुनाव जीते हैं। सब मिलाकर वे सब योद्धा धराशाही हो गए, जिनसे वीरभद्र या उनके युवराज को राजनैतिक खतरा हो सकता था। कांग्रेस सरकार के केबीनेट मंत्रियों में पांच मंत्री कौल सिंह, जीएस बाली, प्रकाश चौधरी, सुधीर शर्मा तथा ठाकुर सिंह भरमौरी चुनाव हार गए। वीरभद्र सिंह के सबसे चहेते चुनाव क्षेत्र किन्नौर से विधान सभा उपाध्यक्ष सबसे कम अन्तर (120 मतों) से जीत पाये। उसी किन्नौर से जहां के ब्यूरोक्रेट और अफसरों से हिमाचल सरकार चलाया करते थे, राजा साहब।

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में रजवाड़ा शाही भी महत्वपूर्ण रही है। जिसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों शामिल हैं। जहां कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह रजवाड़ा शाही के अगुवा रहे हैं। वीरभद्र को राज्य के सभी लोग मुख्यमंत्री के बजाय राजा साहब कहते थे और वे स्वयं भी राजा साहब सुनना पसंद करते थे। रजवाड़ा शाही के मामले में कुल्लू ज़िला भी महत्वपूर्ण रहा है। यहां से भाजपा में महेश्वर सिंह तथा कांग्रेस के स्वर्गीय कर्ण सिंह रजवाड़े का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। इस बार के चुनावों ने कुल्लू से भी रजवाड़ा शाही समाप्त कर दी। कुल्लू चुनाव क्षेत्र जहां से महेश्वर सिंह भाजपा प्रत्याशी थे, को कांग्रेस के सुंदर सिंह तथा बंजार से जहां स्व. कर्ण सिंह के बेटे आदित्य विक्रम कांग्रेस प्रत्याशी को भाजपा के सुरेन्द्र शौरी ने हराया। इस प्रकार कुल्लू ज़िले से रजवाड़ा शाही की समाप्ती हुई है। बंजार विधान सभा क्षेत्र बनने के बाद पहली बार वहां (बंजार) से धरतीपुत्र प्रत्याशी बनाए गए थे सुरेन्द्र शौरी जिसका लाभ उन्हें मिला।

इन चुनावों ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि प्रदेश की राजनीति में मतदाताओं की हैसियत से भले ही महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक हो, लेकिन प्रत्याशी/प्रतिनिधि के रूप में बहुत कम रही है। इस बार दोनों राजनैतिक पार्टियों ने भी महिलाओं को टिकटों में नाममात्र प्रतिनिधित्व दिया था। 2017 के चुनावों में कुल उन्नीस महिलाओं ने अपना भाग्य आजमाया था, जिनमें सिर्फ चार महिलाएं जीतकर आ पाई और जो विधान सभा में हिमाचल की आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करेंगी।

चुनाव परिणामों के अनुसार विधानसभा की कुल विधायक संख्या 68 में भाजपा 48% वोट के साथ 44, कांग्रेस 42% वोट के साथ 21, माकपा 2% वोट के साथ 1 तथा आज़ाद 7% वोट के साथ 2 विधायकों को चुनकर विधान सभा में भेजने में सफल हुए हैं। इस प्रकार सत्तासीन पार्टी सुविधाजनक बहुमत की स्थिति में है तो विपक्ष में कांग्रेस अल्पमत तथा लुंजपुंज सी स्थिति में रहेगा। हां! माकपा नेता राकेश सिंघा जो एक संघर्षशील और जुझारू वामपंथी नेता रहे हैं, अवश्य विधान सभा में रहेंगे लेकिन उनकी अपनी सीमाएं रहेगी और कितना असरदार हो पाते हैं यह देखना रुचिकर रहेगा।

चुनाव घोषणा के बाद चुनाव प्रक्रिया के प्रथम चरण यानि कि नामांकन वापस लेने के अन्तिम तक की स्थिति को देखते हुए मैंने लिखा था कि क्या ‘नोटा’ का प्रयोग अधिक होगा, क्या? हिमाचल प्रदेश में नोटा का प्रयोग यद्यपि गुजरात के मुक़ाबले में आधा ही हुआ है, लेकिन हिमाचल जैसे राजनैतिक तौर पर शांत प्रदेश में 1% नोटा का प्रयोग यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि लोग धीरे-2 चुनावों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया अच्छे से प्रकट करने लगे हैं। एक अन्य बात सामने आई है और वह है हिमाचल प्रदेश की राजनीति में आज भी सुख राम जैसे फेक्टर का प्रासंगिक होना (भले ही जिला मण्डी तक सीमित क्यों न हो)। इसका उदाहरण है सुखराम के पुत्र अनिल शर्मा जो चुनाव घोषणा के समय तक कांग्रेस सरकार में मंत्री थे, उसी बीच भाजपा में गए और मंडी (सदर) सीट से जीत भी गए। और भी यह कि भाजपा ने पहली बार ज़िला मण्डी कि दस सीटों में से नौ पर कब्जा किया है। इसके अतिरिक्त गौर करने योग्य एक अन्य बात यह भी है कि 44 सीटें जीतने के बावजूद मुख्य मन्त्री तय करने के लिए भाजपा को पूरा एक सप्ताह लग गया तब जाकर जय राम ठाकुर को मुख्य मन्त्री चुना जा सका। जो यह बताने के लिए काफी है कि राज्य में भाजपा के अंदरूनी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। यह भी कि भाजपा के लिए 2019 आसान नहीं रहने वाला है। यह स्थिति एक अन्य बात की ओर इशारा करती है कि हिमाचल में भी एक अन्य राजनैतिक शक्ति के विकसित एवं खड़ी होने की आवश्यकता व सम्भावना है, जिसका उदाहरण 2012 के चुनावों में कुल्लू में महेश्वर सिंह का हिमाचल लोकजन पार्टी से और 1998 में हिमाचल विकास कांग्रेस से सुखराम सहित पांच विधायकों का जीत कर आने को समझा जा सकता है।

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