केन्द्रीय सूचना आयोग ने केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह इस बात पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे कि क्या ताजमहल शाहजहां द्वारा निर्मित मकबरा है या एक राजपूत राजा द्वारा मुगल शासक को उपहार में दिया गया एक शिव मंदिर है। हाल के एक आदेश में सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलू ने कहा कि मंत्रालय को इस पर विवाद को शांत करना चाहिए तथा सफेद मार्बल से बने इस मकबरे पर शंकाओं को स्पष्ट करना चाहिए जो विश्व के अजूबों में एक माना जाता है।
आचार्यालु ने आदेश में कहा- ”संस्कृति मंत्रालय ताजमहल के इतिहास के बारे में चले आ रहे विवादों पर लगाम लगाए। साफ करे कि क्या दुनिया के सात अजूबों में शामिल संगमरमर से बनी ये इमारत शाहजहां का बनवाया मकबरा है, या एक राजपूत राजा के द्वारा मुगल शासक को तोहफे में दिया शिवालय।”
आचार्यालु ने कहा है कि मंत्रालय को इस मुद्दे पर अपनी राय देनी चाहिए। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) भी इस मामले में एक पार्टी है। उसे भी जवाब फाइल करना होगा। साथ ही एएसआई को 30 अगस्त से पहले दस्तावेजों की एक कॉपी एप्लीकेंट के साथ शेयर करनी होगी।
इतिहासकार के नाते ओक 17 साल पहले इसे शिव मंदिर घोषित करने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। तब कोर्ट ने कहा था कि इस मामले पर फैसला आपको ही करना होगा।
इसके बाद फरवरी, 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक पिटीशन फाइल हुई। इसमें ताज को मुगलकालीन बताने वाले ASI के नोटिस को रद्द करने की मांग की गई। तब हाईकोर्ट की बेंच ने इसे तथ्यों के विवाद का मुद्दा बताकर खारिज कर दिया था।
ये सवाल एक आर टी आई के माध्यम से आयोग के समक्ष पहुंचा है। एक इतिहासविद ने कुछ दावों के साथ ताजमहल के इतिहास सहित विवरण आयोग को भेजा है। ये मामला विभिन्न अदालतों में भी है और अब संस्कृति मंत्रालय के समक्ष भेजा गया है।