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आर्थिक प्रश्न भी उठाये जाने चाहिए भावी शासकों के सामने

हिमाचल प्रदेश जैसे विशेष आर्थिक प्रस्थिति वाले राज्य, जिसकी आर्थिकी केंद्र सरकार के ग्रांट एवं अन्य ऋणों पर चलती हो, उसका बजट अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। बजट ही बताता है कि उस राज्य की आय कितनी व उसके स्रोत्र क्या-2 हैं? साथ में यह भी कि उसके व्यय की मदें कौन-2 सी हैं तथा उन पर कितना-2 व्यय किया जाता है? गैर योजना एवं योजना व्यय का बंटवारा कैसा है? प्रदेश का 2017-18 का बजट बताता है कि बजट में प्रस्तावित आय का 52% ही राज्य की अर्जित आय है और शेष 48% केंद्र की मदद तथा ऋण है। इसी प्रकार प्रस्तावित बजट व्यय का 60.45% गैर योजना व मात्र 39.55% योजना व्यय है।

इस लिए विकास के शोर शराबे व नये नोटों की कडक के बीच में, चुनाव से पहले राजनीतिक के साथ-2 आर्थिक प्रश्न भी किये जाने चाहिए। चुनाव में हिस्सा लेने वालों से पूछना चाहिए कि इस तरह की आर्थिक स्थिति के अंदर लोगों की आकांक्षाओं और आशाओं को कैसे पूरा किया जाएगा? भावी शासकों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रदेश के संसाधनो का सही और उचित प्रयोग कैसे होगा? यह भी एक आवश्यक प्रश्न है कि क्या भावी शासन ‘आउट ले’ के बजाय ‘आउट कम’ की बात करेगा? साथ में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न है भ्रष्टाचार का, पूछिये इस पर क्या कहेंगे भावी शासक?

इसके अतिरिक्त भी बहुत से प्रश्न हो सकते हैं, मदद के लिए 2017-18 का बजट और उस पर टिप्पणी:
कुल बजट                                                                              35783                100
आय
मद                                                                           राशि(करोड़ रुपये)    %
टेक्स                                                                                  10259                 28.67
गैर-टेक्स आय                                                                      2068                    5.78
केन्द्रीय हिस्सा                                                                      6223                    17.39
केन्द्रीय ग्रांट+ऋण                                                                17233                  48.16
  व्यय

सरकारी कर्मचारियों के वेतन व पेंशन+
अतिरिक्त मंहगाई भत्ते                                                                    14578                  40.74
विकास पर                                                                                     14152                   39.55                                                                         ऋण वापसी                                                                                    3553                      9.93
ब्याज                                                                                              3500                      9.78

उपरोक्त आंकड़ों से कुछ मोटे-2 निष्कर्ष निकाले जा सकते है:

(1) सरकार अपने स्तर पर सिर्फ 18550 करोड़ यानि कुल बजट का मात्र 52% आय पैदा कर सकती है शेष 17233 करोड़ यानि 48% के लिए केन्द्र और ऋण पर निर्भर….।
(2) लेकिन व्यय के मामले में सिर्फ कर्मचारियों और पेंशनर के वेतन, भत्ते, पेंशन पर 14578 करोड़ यानि कुल बजट का 40.74%।
(3) योजना या राज्य के 70 लाख लोगों के विकास के लिए सिर्फ 14152 करोड़ यानि 39.55%। जिसके अंदर अन्य खर्चों के अतिरिक्त चोरियों व भ्रष्टाचार का हिस्सा भी शामिल होता है।
(4) सबसे महत्वपूर्ण है इस बजट में कर्मचारी व गैर-कर्मचारियों का प्रति व्यक्ति/प्रति वर्ष का औसत हिस्सा। 70 लाख हिमाचलियों का हिस्सा 20217 रुपये प्रति व्यक्ति/प्रति वर्ष (माना गया है कि सरकार 100% ईमानदार है)। जबकि 3,50,000 कर्मचारियों व पेंशनधारियों को 4,16,514 रुपये प्रति व्यक्ति/प्रति वर्ष मिलेगा (समय-असमय बढ्ने वाले भत्ते या अन्य रेबड़ियां शामिल नहीं हैं)।

 हाल में विधान सभा अधिवेशन के दौरान कुछ नए तथ्य सामने आए हैं जिसके अनुसार:

(1) इस 70 लाख की आबादी वाले प्रदेश पर 40,000 करोड़ रुपयों का ऋण है, जो 57143 रुपये प्रति व्यक्ति बनता है।
(2) जब कि राज्य को सिर्फ 1200-1404 करोड़ ऋण उठाने की अनुमति है। लेकिन राज्य हर वर्ष 3500-4200 करोड़ का ऋण उठाता है। जिसके लिए वित्तमंत्रालय एवं नीति आयोग से कई चेतावनी के पत्र भी आ रखे हैं।
(3) इस साल के बजट में 3500 करोड़ ब्याज और 3553 करोड़ ऋण की अदायगी के लिए प्रावधान किए गये हैं।
(4) इतना सब कुछ होने पर भी राज्य में 2 लाख कर्मचारी, 1.5 लाख पेंशनर ऊपर से सोने पर सुहागा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो के 45-50 अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जिनको अच्छी ख़ासी सुविधाएं दी जाती हैं।

इस सबके अतिरिक्त भी हिमाचल प्रदेश की सरकार ने हाल में अपने कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देने के लिए 700 करोड़ का ऋण लिया है। प्रदेश का 2017-18 का कुल बजट 35,783 करोड़ का है। जिसमें में 41% तो सिर्फ कर्मचारियों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन में जाता है। राज्य की अपनी आय बजट का 52% है। शेष ऋण एवं केंद्रीय अनुदान पर निर्भर है।    2 लाख कर्मचारी, 1.5 लाख पेंशनर हों तो ऐसी स्थिति तो पैदा होनी ही थी और हर साल ऐसा होता है। उनके वेतन, भत्ते, पेंशन का भुगतान करने के लिए ऋण तो लेना ही पड़ेगा। बजट के 60.45% वेतन, भत्ते, पेंशन और ब्याज देकर हिमाचल प्रदेश इस मामले में देश में पहले स्थान पर है। अब 700 करोड़ का ऋण लिया जा रहा है इसके साथ कुल ऋण बढ़ कर 50,000 करोड़ से अधिक हो जाएगा। यानि वर्ष 2017-18 के बजट से लगभग 14,000 करोड़ अधिक। कुल रोजगार का 28% सार्वजनिक क्षेत्र में होने के कारण इस मामले में भी वह देश में प्रथम स्थान पर है। जबकि उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में यह 10% तथा तमिलनाडु में 11% है।

70 लाख की जनसंख्या के लिए 2 लाख कर्मचारी हैं यानि 35 व्यक्तियों पर एक कर्मचारी? यहां पर भी वह प्रथम स्थान पर है…….?

अब यदि देश के अन्य राज्यों की तरह यहां भी किसान ऋण माफी की मांग करें तो क्या होगा….?

लाल चन्द ढिस्सा
(सामाजिक कार्यकर्ता)

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