स्वतंत्र भारत के संविधान में देश के एक चौथाई निषेधाधिकारी, शोषित, दलित और हाशिये पर रखे गए लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा हेतु कुछ विशेष प्रावधान किए गए, जिससे कि वे लोग राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ सकें। उसके साथ-2 आगे बढ़ सकें और देश को एक राष्ट्र बना सकें। सही में कहें तो राष्ट्र कभी भी एक भौगोलिक पहचान का मोहताज नहीं रहा। राष्ट्र की भौगोलिक पहचान की कल्पना और उस की स्थापना तो व्यक्ति की भूख के कारण हुई है, सत्ता और शक्ति की भूख जो आगे चलकर हवस की हद तक बढ़ गई। फिर तो कुछ राजे, महाराजे, सम्राट, विराट, सुल्तान, बादशाह और न जाने क्या-2? उनकी उपाधियों की सूची को बढ़ाने की व्यवस्था भी हो गई, एक नया चाटुकार वर्ग। सिलसिला चलता रहा और एक समय ऐसा आया कि देश एक के चौथाई से अधिक लोगों का जीवन ही बेकार हो गया, उनसे पशुओं से भी बदतर व्यवहार किया जाने लगा। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि उन्हें चलते समय अपने पीठ पर झाड़ बांध कर चलने के लिए विवश कर दिया गया ताकि जमीन पर उनके पांव के निशान शेष न रह सकें, जहां से उच्च जाति के लोग गुजरते थे।
हर तरह से निषेधाधिकारों से लादा हुआ एक पंगू समाज बना दिया गया जिससे हर तरह के निकृष्ट काम लिये जाते थे। जहां एक तरफ विशेषाधिकारों की भरमार थी वहीं दूसरे तरफ निषेधाधिकारों की मार। जिसके उदाहरण हैं, संविधान के लागू होने के 70 साल बाद आज भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं जाने दिया जाता। वह वर्ग जो आज तक तमाम सुविधाओं का ही भोग कर रहा था, उसे अन्यों से नहीं बांटना चाहता था। चाहता भी कैसे और क्यों, क्योंकि उसे तो एक पूरा समाज बिना किसी ज़िम्मेदारी के गुलाम के रूप में मिला हुआ था। जो उसका हर काम करता था और भूखा प्यासा मरता था। उस वर्ग को न तो सम्पति पर अधिकार था, न जमीन और न शिक्षा का हक था। उसका काम तो निष्काम भाव से द्विजों की सेवा करनी थी, जिसके बदले किसी तरह के प्रतिफल की इच्छा नहीं करनी थी। सेवा को उसका वर्ण धर्म के रूप में प्रस्थापित कर दिया और उसके दिमाग में बिठा दिया गया कि मालिक की सेवा से अधिक सोचेगा तो अगला जन्म उसे बहुत बुरा मिलेगा। इसलिए अगले जन्म को सुधारने के चक्कर में दलित समाज बेचारा बन कर हजारों साल तक हर तरह का शोषण और प्रताड़ण सहन करता रहा।
यह एक एतिहासिक तथ्य है कि अन्य सभी संस्थानो की तरह भारतीय विश्वविद्यालय भी केवल विशेषाधिकारी जाति के अभिजात वर्ग के लिए सुरक्षित रहे हैं। शिक्षा का क्षेत्र तो ब्राह्मणों के लिए ही सुरक्षित था, पठन-पाठन का कार्य सिर्फ वही कर सकते थे। शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल द्विजों को मिला हुआ था। शेष बहुजन समाज को इससे बहुत दूर रखा गया था। शिक्षा के क्षेत्र में एकाधिकार का वर्णन करते हुए ‘बुद्ध धर्म और शिक्षा- भारत के संदर्भ में’ लेखक ने लिखा है- “…..शिक्षा पर एक छोटे से वर्ग का विशेषाधिकार था। “……फिर सामाजिक और वैधानिक मान्यता दिलाने के उदेश्य से इसे श्रम विभाजन के सिद्धान्त रूप में प्रस्तुत किया गया और समाज के कार्य को सुचारु रूप से चलाने के नाम पर इसे वर्ण व्यवस्था के नाम से महिमामंडित किया किया गया। इस श्रम विभाजन पर आधारित वर्ण व्यवस्था या जाति प्रथा के अनुसार तय कर दिया गया कि पठन और पाठन का कार्य सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण ही करेगा। इस तरह शिक्षा के चारों तरफ एक अभेध किले का निर्माण कर दिया गया और उस पर ब्राह्मण का एकाधिकार स्थापित कर दिया गया।“
उन लोगों को सामाजिक व आर्थिक बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए संविधान में सामाजिक न्याय के रूप में एक हथियार दिया गया था, आरक्षण जिससे कि वे राज्य के अंतर्गत आने वाली सेवाओं में आ सकें। यद्यपि यह सब उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया गया। वह यह मानकर किया गया कि वे लोग उस स्थिति में नहीं थे कि खुली प्रतियोगिता में चयनित हो सकें। हैरानी की बात यह कि जब से इस प्रकार के संवैधानिक प्रावधान लागू किए गए तभी से उनका विरोध होना भी शुरू हो गया था।
आरक्षित सीटों को भरे जाने से रोकने के लिए पहले भी कई हथकंडे अपनाए जाते थे, जैसे भर्ती नियमों का इस तरह से बनाया जाना कि अनिवार्य योग्यताएं ही ऐसी राखी जायें जिन्हें आरक्षित वर्ग के प्रत्याशी पूरा न कर पायें। संघ लोक सेवा आयोग तथा कुछ राज्यों के लोक सेवा आयोगों के द्वारा की जाने वाली सीधी भर्तियों के अतिरिक्त समस्त रिक्तियों को एक साथ भरने के बजाय उन्हें कई किस्तों में भरा जाता था। साक्षात्कार के दौरान की हेरा फेरी। इस बात का मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि आरक्षित वर्गों की भर्ती का निर्णय साक्षात्कार से पहले ही कर लिया जाता था। साक्षात्कार तो एक औपचारिकता मात्र होती थी। साक्षात्कार हो जाता था और बोर्ड की सिफ़ारिश में लिखा होता था उपयुक्त प्रत्याशी के नहीं मिलने के कारण किसी को भी नियुक्ति के योग्य नहीं पाया गया। इस तरह के मामलों से दो चार तब हुआ जब मैं अपनी सर्विस के दौरान साक्षात्कार बोर्ड का मेम्बर बना, चाहे वह बोर्ड का सचिव हो या सदस्य या फिर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सम्पर्क सदस्य के रूप में साक्षात्कार बोर्ड में रहा।
अघोषित तरीकों से आरक्षण को समाप्त करने के समस्त प्रयास पर्दे के पीछे किये जाते रहे हैं परन्तु अब तो आरक्षण को कानूनन खत्म किया जा रहा है। जिसका एक जीता जागता उदाहरण है, 5 मार्च, 2018 को उच्च शिक्षा नियामक ने अधिसूचना जारी करके घोषणा की है कि रिक्तियों की भर्ती में सीटों की संख्या की गणना विभागीय स्तर पर की जाये न कि विश्वविद्यालय में विद्यमान कुल रिक्त पदों के आधार पर। यह अधिसूचना इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक मामले में दिये गये निर्णय पर आधारित है। जिसके अनुसार इससे पहले जिस तरह सम्पूर्ण विश्वविद्यालय या संस्थान को एक एकक (यूनिट) माना जाता था और उसमें पैदा होने वाली रिक्तियों को एक यूनिट की रिक्तियां माना जाता था और उसी के अनुसार भर्ती होती थी और आरक्षण का निधारण भी। लेकिन इन नये नियमों और फार्मूले के लागू होने के बाद हर विभाग को एक यूनिट माना जाएगा और उसमें भर्ती भी उसी आधार पर होगी और आरक्षण का निर्धारण भी।
इस विषय में देश के बड़े विश्वविध्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की 2017 की प्रस्थापना के अनुसार बताया गया है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नये मानकों और नियमों के लागू किए जाने से आरक्षण से लाभान्वित वर्गों अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की संख्या में, विशेषकर अकादमिक स्टाफ में भारी कमी आ जायेगी। इस प्रस्थापना के अनुसार विश्वविध्यालय के आज के कुल 1930 पदों में अनुसूचित जाति 289, अनुसूचित जनजाति 143 तथा अन्य पिछड़ा वर्ग की 310 की संख्या में नए फार्मूले को लागू करने के बाद क्रमश: 119, 29 तथा 220 रह जाएगी। जिसका अर्थ यह है कि अनुसूचित जाति को, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को अपने-2 हिस्से में क्रमश: 50%, 80% तथा 30% का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार भी इन्दिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय (इन्दिरा गांधी ट्राइबल यूनिवर्सिटी) मध्य प्रदेश में 52 रिक्तियों में नए फार्मूलों के हिसाब से आरक्षित वर्गों को सिर्फ 1 पद मिलेगा, जबकि पुराने नियमों के आधार पर उन्हें 20 पद मिलते थे (15+7.5%)।
विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थानों में 6 रिक्तियों तक में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में किसी को भी हिस्सा नहीं मिल पायेगा और 15 रिक्तियों तक अनुसूचित जनजातियों को प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि नये रोस्टर के अनुसार अनुसूचित जाति के लिए 7वें और अनुसूचित जनजाति के लिए 14वें प्वाइंट पर आरक्षण होगा। सच पूछा जाये तो आरक्षण का मामला आज का नहीं बल्कि यह तो आज़ादी से पहले से चला आ रहा, जब भारतीयों के लिए सरकारी सेवाओं में छूट और आरक्षण की बात मांग की गई थी।
भारत जैसे बड़े और विविधता भरे देश के लिए यह अति आवश्यक है कि यहां इसके हर वर्ग को उसका हिस्सा बराबर मिलना चाहिये और जिसे एक ‘सकारात्मक कार्य’ के रूप में देखा जाना चाहिए। केंद्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को निर्देश दे कि इस आदेश को वापस ले, कम से कम तब तक, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय का उस पर निर्णय नहीं आ जाता।
आरक्षण को कमजोर करने को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग अपने संवैधानिक अधिकारों को चुनौती समझेगा और उसके विरोध में खड़ा उठेगा। जैसा कि हाल में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध, विशेषकर दलित खड़ा हुआ था।