कुछ ही दिन पहले देश ने बड़े धूमधाम से अपना 71वां स्वतन्त्रता दिवस समारोह मनाया। जिस में आज तक देश ने कई बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की हैं, दर्शाया गया। परमाणू बिस्फोट किये, अन्तरिक्ष में उपग्रह भेजे, कई अडानी-अंबानी बनाये, दूसरी तरफ देश में असमानता, गरीबी, बेरोजगारी और असंतोष के कारण आज भी हर साल दो लाख के करीब लोग खुदकशी करते हैं, यह कभी नहीं, कहीं नहीं बताया जाता। 15 अगस्त के दिन जब पूरा देश जश्न-ए-आज़ादी मना रहा था उसी समय पंजाब के दो किसानो अवतार सिंह (36) और गुरमीत सिंह (30) ने आत्महत्या की थी। उससे कुछ दिन पहले भी पंजाब के एक और किसान टेक सिंह ने 54 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। जिसकी फोटो बकायदा बड़े-2 अखबारों में छपी थी। यदि आत्महत्या न करता तो क्या सम्भव था कि उसका फोटो कभी आ पाता समाचार पत्रों में, शायद नहीं। सिर्फ इस कारण ही लाखों किसानो के फोटो और विवरण को देश के मीडिया ने जगह दी है। यद्यपि कहना कठिन है कि यह मीडिया की एक विडम्बना है या कि बेबसी, जहां प्रधानमंत्री को चकाचक कपड़ों में हाथ में लम्बा झाड़ू पकड़े, सफाई अभियान की अगुवाई करते दिखाना और वहीं हजारों दलित मजदूरों का सफाई करते हुए ‘गटर’ में मर जाना….? टेक चंद की आत्महत्या के कारण फिर वही सपने, ऋण और धोखा….।

इस देश में आज एक पूरी तरह विकसित वर्ग पैदा हो चुका है जिसका काम ‘सेवा क्षेत्र’ के नाम पर सिर्फ सपने दिखाना मात्र है। सपने बेच कर वह अपने को मालामाल बनाता है और सपने खरीदने वाले आत्महत्या के लिए मजदूर कर दिये जाते हैं। सपनों के सौदागार असंख्य कंपनियां, दुकाने सजाये, असंख्य सपने बेचती हैं। किसानों को ‘व्यवसायिक फसलें’ उगाने के लिए उकसाया जाता है। महंगे बीज, खाद, कीटनाशक आदि। सपनों को साकार करने के लिए आवश्यक उन सब संघटकों को खरीदने के लिए साधन के रूप में सुलभ ऋण, चाहे वह बैंक हों या फिर निजी एजेंसियां। एक तरफ ऋणों पर ऊंची ब्याज दर, कठिन व एक तरफा शर्तें, दूसरी ओर किसान के अनियमित, अपर्याप्त एवं अनिश्चित आय के साधन, प्राकृतिक दशाओं पर आधारित व निर्भर कृषि उत्पाद। कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी प्राकृतिक व बाजार की बनावटी उथल-पुथल। सरकारी बैंकों समेत साहूकारों के ऋण को वसूलने के मनमाने व एक तरफा तरीके। इन सब का शिकार बन जाता है, बेचारा किसान, जो दूसरों के सपनों को पूरा तो करवाता है, लेकिन अपने सपनों के सामने अंतिम आत्म समर्पण….।

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इस बात का उदाहरण अपने अनुभव से देने का प्रयास कर रहा हूं, क्योंकि इस देश के किसान कहे जाने वालों में मेरा भी एक नम्बर है किसान पास बुक न. 273116 ज़िला लाहौल-स्पिती, हिमाचल प्रदेश, राजस्व विभाग। वैसे हूं नाम का किसान, खेती की भूमि किसी भी तरह इतनी नहीं कि उससे मेरा या मेरे परिवार का पेट भी पल सके। जीवन की अन्य आवश्यकताएँ तो दूर की बात। मेरा क्षेत्र ‘शीत मरुस्थल’ (कोल्ड डेजर्ट) क्षेत्र में आता है। साल में सिर्फ एक फसल (पारम्परिक), लेकिन आज तो लालच वश दो फसलें ली जा रही हैं, जिसमें फसलें तैयार करने के अप्राकृतिक तरीकों की मदद भी शामिल है। हां! मुद्दे पर आयें मुझे भी बताया गया था कि व्यवसायिक फसलें उगाने पर मुनाफा कई गुणा बढ़ जाएगा और जिंदगी हरी-2 हो जायेगी, समस्त कष्ट-क्लेश मिट जायेंगे। फिर शुरू हुई दौड़ जिसका कहीं अन्त नहीं, आलू, मटर, हॉप्स, फूलों की खेती और अब सब्जियां जिसमें गोभी (फूल) ताजा तरीन हैं। हॉप्स कई बार लगाया गया, जितनी बार लगाया गया उतनी ही बार उखाड़ा गया। फिर पता चला कि एक बीघे (800 वर्ग मीटर) के खेत से दो लाख की फसल (फूल) पैदा की जा सकती हैं, लगाई गई।  लेकिन प्राकृतिक एवं मानव निर्मित दशाओं में मैं हमेशा घाटे में रहा। फसलों का नुकसान हुआ, कम फसल हुई, बम्पर फसल हुई हर हालत में मैं ही घाटे में रहा। ऐसा क्यों होता है, इसके कारण सब जानते हैं। किसान और ग्रामीण अधिक संख्या में रहते हुए, अधिक वोट होते हुए भी राजनीति के केंद्र में कभी नहीं आ पाये। वे सदा ही हाशिये के बने रहे। यह भी उतना ही सच है कि वे किसान जिनके नाम पर सैंकड़ों एकड़ जमीने हैं, लेकिन हल चलाना जिनके लिए वर्जित है, वे सदा ही मजे में रहे हैं।

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किसानों से एक सवाल किया चाहता हूं कि उनके पास आत्महत्या के अतिरिक्त कोई हल, कोई विकल्प नहीं है क्या ? उस व्यवस्था के साथ उनका मोह क्यों है? यदि व्यवस्था उन्हें कोई राहत नहीं दे सकती, उनकी समस्याओं का कोई हल नहीं दे सकती, उसके साथ द्वितीय श्रेणी का व्यवहार करती है तो उनको अपने बारे में स्वयं सोचना होगा, अपनी दशा को खुद सुधारना पड़ेगा।