1 नवम्बर, 1966 को पंजाब राज्य के कुछ क्षेत्र कांगड़ा, कुल्लू और लाहौल-स्पिति को हिमाचल में मिलाया गया। इसके साथ ही पंजाब लाहौल (खोखसर-दारचा-थिरोट) तथा स्पिति के साथ हिमाचल लाहौल जिसमें थिरोट नाले के पार से पांगी उपमंडल, ज़िला चम्बा के काडूनाला तक के क्षेत्र को मिला का एक बड़ा ज़िला लाहौल-स्पिति बनाया गया जिसका क्षेत्रफल 13833 वर्ग किलोमीटर हो गया।

हिमाचल प्रदेश में मिलाने और एक बड़ा ज़िला बनने के बाद क्षेत्र का महत्व कुछ और बढ़ गया। इसके राजनैतिक व प्रजातांत्रिक इतिहास के विकास ने भी एक छलांग लगाई। जहां पंजाब के समय में दोनों लाहौलों (पंजाब एवं हिमाचल) तथा स्पिति के अपने कोई विधायक प्रतिनिधि नहीं होते थे। पंजाब के समय में पंजाब लाहौल-स्पिति का प्रशासन एक चुनी हुई जनजातीय सलाहकार परिषद की सहायता से चलाया जाता था। अब हिमाचल प्रदेश में आने के बाद उसे एक विधानसभा क्षेत्र बनाया गया और जनजातीय सलाहकार परिषद के सदस्यों को चुने जाने के स्थान पर नामांकित किया जाने लगा।

लाहौल-स्पिति के पहले विधायक 1967 में देवी सिंह ठाकुर बने। उस दौर में लाहौल-स्पिति की राजनीति भी दबंगई की राजनीति ही होती थी। जैसे कि देश के अन्य हिस्सों में होता रहा है। राजनैतिक जलूस या रैलियों में हिस्सा लेना आवश्यक होता था। हर गांव के स्तर पर दबंग व प्रभावशाली वर्ग के द्वारा पूरे गांव की ओर से निर्णय लिया जाता था कि जो भी एक विशेष राजनेता के जलूस में हिस्सा नहीं लेगा उसे दंडित किया जाएगा और उससे जुर्माना बसूला जाएगा। मेरे समुदाय के लोगों को तो एक और बेगार करनी होती थी उस जलूस या रैली के आगे-2 ढ़ोल-नगाड़े पीटते हुए चलना पड़त था। इस प्रकार की अनुचित घटनाओं का मैं स्वयं चश्मदीद गवाह हूं। यद्यपि मैं छोटा था लेकिन इस प्रकार के हालातों को देख बहुत तकलीफ होती थी।

किसी तरह वह सब खत्म हुआ, कुछ समय तक के लिए। लेकिन अब कुछ सालों से फिर उसी तरह के हालत वापस लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब यह सब सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम पर हो रहा है। पुरानी संस्कृति को पुनर्स्थापित करने तथा उसे सर्वोतम सिद्ध करके उसे गौरवान्वित करने के प्रयास बड़े ज़ोर शोर से किए जा रहे हैं। इसका उदाहरण है चंद्रा और भागा नदियों के संगम पर ‘संगम पर्व’ का बड़े स्तर का आयोजन जिसमें एक विशेष राजनैतिक विचारधारा के नेताओं को बाहर से बुलाया जाता है। बताया गया कि इस पर्व के दौरान साथ लगते गांवों और पंचायतों पर पूर्व की तरह जुर्मानों के ज़ोर पर उपस्थिति सुनिश्चित करने के आदेश होते हैं।

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सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम पर संस्थाएं बना का सरकारी व निजी स्त्रोतों से लाखों रुपयों के फंड को इधर उधर किया जा रहा है। संस्कृति के पुनर्जीवित करने के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। पुरातन संस्कृति के नाम पर लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जा रहा है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम पर कई तरह के नाटक किए जा रहे हैं। लाहौल के तांदी गांव में चंद्रा और भागा के संगम पर मनाए जाने वाले पर्व के कार्यक्रम को प्रचारित करते हुए बताया गया था कि उस स्थान पर इस पर्व में 108 नगाड़े बजाने वाले और 108 ही बांसुरी वादक हिस्सा लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस के अतिरिक्त भी इस कार्यक्रम के असल उद्देश्य को छिपाया जाता है। इस प्रकार के कार्यक्रमों पर जब सवाल खड़े किये जाते हैं तो सामने कहा जाता है कि क्षेत्र को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने के लिए किया जा रहा है।

इस कड़ी में ही लाहौल-स्पिति की संस्कृति का संकलन, संरक्षण तथा प्रसारण के नाम पर सबसे पहला कार्य ‘गेईटी थियेटर’ शिमला में लाहौल की संस्कृति के नाम पर एक समुदाय विशेष के लोगों द्वारा नगाड़े और बांसुरी बजवाये गए। यह सही है कि संगीत एक कला है और उसका सम्मान भी होता है, लेकिन इस क्षेत्र में इस प्रकार के वाद्ययंत्रों तथा गायन के साथ जुड़े हुए लोग दलित ही होते हैं। जिनकी पहचान वाद्ययंत्र बजाना होता है और जिनसे जन्माधारित जातीय विभेद किया जाता है। लाहौल-स्पिति के मामले में भी यह सत्य है कि गाने-बजाने वाले आमतौर पर दलित ही होते है। उपरोक्त कार्य से यह बात साफ हो जाती है कि आज एक बार फिर दलितों को उनके परंपरागत पेशे की तरफ धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रकार संस्कृति को गौरवान्वित करने के नाम पर दलित समुदाय को हैरान और अपमानित करने का प्रयास एक सुनियोजित कार्य है।

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इस बारे में यह भी याद दिलाना चाहूंगा कि पीछे मंडी में शिवरात्रि के दौरान 1831 बजंतरियों से नगाड़े पिटवाकर शासन-प्रशासन ने रिकार्ड बनने के दावे पर खुशियां जताने के साथ ही उन लोगों को उनके परंपरागत पेशे (बजाने) की तरफ लौटने के बात की थी। लाहौल-स्पिति के सांस्कृतिक पुनर्जागरण करने वालों का भी कुछ इसी प्रकार कहना है। इस बात को भविष्य की एक चुनौती मानकर मैं कई बार सोशल मीडिया के माध्यम से भी कह चुका हूं कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण सदा ही अल्पसंख्यकों एवं हाशिये के लोगों के लिए अहितकर होता है।

क्षेत्र की इस तरह की राजनीति को देखते हुए मैंने 1990 में इस क्षेत्र से पहली बार दलित समुदाय से एक प्रत्याशी के तौर पर बहुजन समाज पार्टी से नामांकन भरा था। ताकि लाहौल स्पिती के अनुसूचित जनजातीय दलित लोगों के अंदर राजनैतिक चेतना का विकास किया जा सके। क्योंकि 1990 में जब मैंने नामांकन भरा, से पहले पार्टियों के उम्मीदवार लोगों के पास वोट मांगने भी नहीं जाते थे। उस चुनाव का मैंने प्रत्याशी की हैसियत से बॉयकाट किया था, जिसके ग्यारह कारण दिये थे। यह भी सच है कि उस बॉयकाट का प्रचार नहीं किया जा सका, जिसके अनेकों कारण थे। इस प्रयास के कुछ प्रभाव अवश्य पड़े उनमें एक तो यह कि चुनाव के समय दलितों की पूछ शुरू हुई। 2003 में तो ओम प्रकाश को कांग्रेस ने कवरिंग केंडीडेट तक बनाया। उसके अतिरिक्त राम लाल मारकंडे की जीत का एक बड़ा कारण था दलित वोट, जो उसे मिला 7-10% दलित वोट को हार जीत का निर्णायक बनाया जा सका।

जहां तक स्पिति का संबंध है 1967 से लेकर 2012 तक सिर्फ 1990 तथा 1993 दो बार उन्हें यह मौका दिया गया और फुंचोग राय दो बार चुने गए। 1990 में हिमाचल प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी और वह 1992 में बर्खास्त कर दी गई और 1993 के चुनावों में फिर फुंचोग राय कांग्रेस के विधायक बने। 1993 में टिकट इसलिए दिया गया क्यों 1990 में क्षेत्र के कांग्रेसियों के बीच स्पिति को टिकट दिये जाने का समझौता हुआ था। जिसे मैंने ‘सोशल मीडिया’ में अपने एक लेख में ‘एग्रीमेंटोक्रेसी’ का नाम दिया था। बताया गया कि इस बार (2017) भी स्पिति से कांग्रेस और भाजपा से टिकट की दावेदारी की गई थी लेकिन दोनों पार्टियों ने स्पिति के दावे को खारिज कर दिया।

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लाहौल-स्पिति के प्रजातांत्रिक प्रक्रिया यानि चुनावों में 2012 के चुनावों के दौरान एक रौचक स्थिति सामने आई। जैसा कि बताया जा चुका है क्षेत्र में 62% के करीब बौद्ध लोग हैं और 38% के लगभग हिन्दू और हिन्दूओं में भी 30-31% सवर्ण और 9-10% अवर्ण। 2012 में 62% बौद्धों का एक प्रत्याशी, 30% हिन्दू सवर्णों के दो प्रत्याशी और 9-10% दलित हिंदुओं के तीन प्रत्याशी मैदान में आखिर तक रहे। परिणाम पहले ही ज्ञात था। दलित प्रत्याशियों के वोट सैंकड़े तक भी नहीं पहुंच सके। लेकिन इसने उनके एक तरफ होने और निर्णायक वोटर होने के भ्रम को तोड़ दिया। जिसका परिणाम यह है कि आज दोनों पार्टियों के ज़िला इकाईयों में भी उनका महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं है।

2017 के चुनाव कई अर्थों में महत्वपूर्ण हैं। पहली बात यह कि इस चुनाव में दलितों से कोई प्रत्याशी नहीं है। दूसरी बात भाकपा (म) के सदस्य ने आज़ाद नामांकन भरा। तीसरी बात इस बार डॉ. मारकंडे के विरुद्ध उसी के पार्टी के अधिकतर लोग लाभबद्ध हो गए थे। यहां तक कि लाहौल के बहुत से बुद्धिजीवी लोग भी। कई सालों से तैयारियां की गई थी, गैर सरकारी संस्थाएं बना कर और अन्य कई मंचों से प्रयास किए जा रहे थे कि उसे पार्टी टिकट न मिले। लेकिन टिकट तो वह छीन लाया अब आगे ।

लाल च ढिस्सा