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भीमा कोरेगांव सवाल भी और जबाव भी है

भीमा कोरेगांव से उठे तूफान का तात्कालिक कारण है पुणे से 30 किलोमीटर दूर बुधु बुद्रक गांव में 29 दिसंबर को घटी एक घटना। बताया गया है कि यहीं से दलितों और मराठों के बीच संघर्ष शुरू हुआ था। कारण था इस गांव में बनी गोबिन्द गोपाल गायकबाड़, जो जाति से महार था, की समाधि पर लगे बोर्ड का हटाया जाना। जहां पर 1689 में सम्भा जी महाराज को मुगलों द्वारा प्रताड़ित करके मार डाला गया था, उस स्थान पर उनकी समाधि बनाई गई थी। उसी के पास गोबिन्द गोपाल की समाधि थी जिसने सम्भा जी की समाधि बनाई थी। उसी गोविन्द गोपाल गायकबाड़ के नाम के बोर्ड को 28 दिसंबर को मराठों द्वारा हटा दिया गया था, उसी पर दूसरे दिन झगड़ा शुरू हुआ जो इतना बढ़ा कि उसने पूरे महाराष्ट्र को चपेट में ले लिया। जिसकी आवाज़ संसद तक में सुनाई पड़ी।

इस घटना की शुरुआत की पृष्ठभूमि में 1 जनवरी, 1818 में भीमा-कोरेगांव में पेशवा बाजी राव द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ी गई लड़ाई है। जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी जीती थी और पेशवा बाजी राव द्वितीय की हार हुई थी। यद्यपि दोनों में से किसी ने भी पक्के तौर पर हार-जीत का दावा नहीं किया था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज में अधिक सिपाही महार जाति के थे, जो कि अछूत माने जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की 500 सैनिकों की छोटी सी सेना ने पेशवा की 30000 संख्या की बड़ी सेना को हरा दिया था। इस जीत को उन अछूतों ने अपनी वीरता, शौर्य और साहस के साथ जोड़ कर देखा। उसी क्षण को स्मरण करने के लिए महाराष्ट्र के दलित हर साल 1 जनवरी को उस विजय स्तम्भ के निकट इकट्ठे होते हैं। जिसमें हाल के वर्षों में आने वालों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।

देश के स्वतंत्र होने के बाद महाराष्ट्र में ब्राह्मणों को सत्ता से अलग कर दिया गया जो मराठा और दलित राजनीति के मिलकर काम करने कारण हुआ था। पांच दशक तक सत्ता पर मराठों का बिना रुकावट लगातार कब्जा रहा और प्रभुत्व भी बना रहा। इसके साथ इस दौरान दलित राजनीति भी काफी प्रभावी रही। लेकिन आज के दिन न सिर्फ महाराष्ट्र अपितु सम्पूर्ण देश की राजनीति में एक कड़ा परिवर्तन आया हुआ है। दक्षिण पंथी राष्ट्रवादी एवं साम्प्रदायिक राजनैतिक शक्ति सत्तासीन हो रही है और शेष वामपंथी एवं धर्म-निरपेक्ष ताक़तें हाशिये पर धकेली जा रही हैं। जिसका प्रभाव देश के अल्पसंख्यकों और दलितों पर सीधे पड़ रहा है। इन शक्तियों की सत्ता प्राप्त करने के तीन-चार वर्षों के बीच में मुसलमानों और दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं और उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों पर लगातार आघात किए जा रहे हैं। यही नहीं इनके नेता (मंत्री) अब तो खुले में कह रहे हैं कि वे तो संविधान को बदलने के लिए लिए ही (सत्ता में) आए हैं। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री फड़नवीस को बनाकर जो कि ब्राह्मण है, एक बार फिर ब्राह्मणों या कि पेशवा को महत्व प्रदान किया है। उसके साथ ही दलित राजनीति को कमजोर करके हिन्दू राजनीति में बदलने की कोशिश भी लगातार हुई है। जिसका उदाहरण है एक धर्म, एक भाषा और एक राष्ट्र का नारा।

आधुनिक समय में महाराष्ट्र ने हर क्षेत्र में देश की दिशा-दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्नीसवीं सदी में महाराष्ट्र ने देश को कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व दिये हैं। जिनमें महत्वपूर्ण हैं गोपाल कृष्ण गोखले, विनोवा भावे, नाथु राम गोड़से आदि। जिनमें गोखले, विनोवा तथा गोड़से ब्राह्मण थे। इसके अतिरिक्त भीमराव अंबेडकर जो हिन्दू धर्म के कड़े आलोचक थे और वीडी सावरकर जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पहली बार प्रस्तुत की थी, भी महाराष्ट्र के थे। महाराष्ट्र देश का ऐसा राज्य है जिसे चलाने के लिए वहां की बहुविद एवं जल्दी-2 बदलती राजनैतिक शक्तियों का संतुलन बनाने की योग्यता का होना आवश्यक है। इस बात का उदाहरण है बीते सालों में महाराष्ट्र के अगड़े वर्गों द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग का दोष लगाना। 2017 में इस अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर आंदोलन हुआ। यह भी मराठों के गुस्से का एक बड़ा कारण रहा है क्योंकि मराठों की जनसंख्या 32% इसलिए राज्य की सत्तासीन समेत किसी भी राजनैतिक पार्टी में मराठों को नाराज़ करने साहस नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद के पांच दशकों में मराठों का सत्ता पर कब्जा रहा। लेकिन भाजपा ने पिछले तीन-चार दशकों से ब्राह्मण और अन्य उच्च जातियों के अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग को अधिक महत्व दिया। जिसके उदाहरण है कल्याण सिंह, उमा भारती, गोपीनाथ मुंडे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्थान। इससे एक तरफ तो मराठों का राजनैतिक मूल्य कम हुआ और दूसरी तरफ कृषि आय के कम होने से उनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई। जिसके चलते मराठों के अंदर असंतोष बढ़ा। 2017 मराठों के आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन भी इसी का परिणाम था। मराठे राज्य सेवा में अपने को पिछड़ा हुआ महसूस करते हैं। उनका मानना है कि गुजरात में पाटीदारों, हरियाणा में जाटों तथा राजस्थान में गुज्जरों की तरह महाराष्ट्र में मराठों के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण की मांग न्याय संगत है।

मराठों को आरक्षण दिये जाने से पहले भाजपा सरकार को यह बताया जाना भी आवश्यक था कि दलित भी राजनैतिक तौर पर महत्वपूर्ण हैं। नब्बे के दशक तक दलित महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ी ताकत थे। लेकिन धीरे-2 दलित पेंथर जैसे आग उगलते आन्दोलन ठंडे पड़ते गए। दलितों के लिए भी यह आवश्यक था कि वे अपनी राजनैतिक शक्ति को फिर से एकत्रित व संगठित करें जिसके लिए यह एक अच्छा अवसर था।

केंद्र एवं कई राज्यों में सरकारें होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी देश में बड़ी संख्या में लोगों द्वारा स्वीकृत पार्टी नहीं है। जिसका एक बड़ा कारण है उसका बहुसंख्या (मेजोरिटेरियन) बल का अनियंत्रित प्रयोग या कहें दुरुपयोग। जिसके चलते कभी ‘लव जेहाद, गौ रक्षा, घर वापसी, धर्मांतरण, समान संहिता और अन्य कई बहानों से देश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों तथा दलितों पर अत्याचार का नहीं टूटने वाला सिलसिला।

कोरेगांव की घटना संघ और भाजपा के राष्ट्र गौरव की धारणा और दलितों के सामुदायिक अस्मिता एवं आत्म सम्मान का टकराव भी है। वर्तमान की व्यवस्था के अंदर जो राष्ट्रवाद और उसकी परिभाषा जिसके अंतर्गत पूरे देश को समजातीय (होमोजीनियस) दिखाने और बनाने के अभिमान के विरुद्ध दलितों के अन्य शक्तियों के साथ खड़े होने की आवश्यकता को भी दर्शाती हैं।

इस विषय में एक अन्य बात भी सामने आई है कई बुद्धिजीवियों ने यह भी प्रमाणित करने का प्रयास करते हुए तात्कालिक स्त्रोतों विशेषकर अंग्रेज़ी स्त्रोतों के हवाले से यह कहा है कि अंग्रेजों ने इस जीत में महारों के योगदान का जिक्र नहीं किया है। यहां हमें याद रखना चाहिए यह जीत यानि कि उच्च जाति के मराठों की बड़ी सेना पर निम्न जाति के महारों की छोटी सी सेना की जीत दलितों यानि महारों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण थी न कि तब की महाशक्ति का नेतृत्व करने वाले इंग्लैंड के लिए।

1818 के कोरेगांव की घटना के सवाल भी हैं और उनके जबाब भी हैं। यही वे सवाल और जबाब हैं जिनकी अनुभूति और विश्वास के साथ छेड़छाड़ ही आज के कोरेगांव का मूल कारण है। 1818 की घटना को याद कर महार अपने स्वतंत्र व शौर्यपूर्ण अस्तित्व की अनुभूति अपने साथ रख रहे थे, उस पर जब आघात हुआ तो पूरा महाराष्ट्र जल उठा।

कोरेगांव की घटना को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए बल्कि यह जानने की आवश्यकता है कि कोरेगांव में दलित ईस्ट इंडिया कंपनी के पलटन के साथ मिलकर पेशवा के विरुद्ध क्यों लड़े। उससे भी महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि दलित विमर्श के आधुनिक पुरोधा ज्योतिबा फुले ने 1857 के विद्रोह के विफल होने पर पुणे में उन महार सैनिकों का सार्वजनिक अभिनंदन किया था, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत में निर्णायक भूमिका अदा की थी, क्यों? और भी उन्होंने वायसराय को पत्र लिख कर अंग्रेजों के जीतने पर खुशी प्रकट की थी कि अंग्रेज़ जीत गए और दलितों को फिर से ब्राह्मणों का गुलाम नहीं बनना पड़ा। फुले की तरह ही डॉ. अंबेडकर ने अंग्रेज़ी शासकों के प्रति प्रशंसा का भाव छिपाया नहीं। यह भी समझना पड़ेगा कि आखिर क्यों फुले, अंबेडकर ही नहीं देश के अधिकतर दलित यह मानते थे कि ब्राह्मणों की गुलामी से अंगेजी राज ठीक था। यह भावना आज भी न्यूनाधिक देखने सुनने को मिल जाती है।

1818 की अंगेज़ों की जीत का मतलब था दलित एक बार फिर ब्राह्मणों की गुलामी से बच गए। यदि कंपनी हार जाती तो सरकारी सेवाओं और शिक्षा के अवसर जो उनके लिए खुले थे वापस बंद हो जाते। और उनके वही पुराने दुर्गतिपूर्ण दिन वापस आ जाते जब उन्हें वे समस्त गंदे व नीच कार्य बिना किसी मजदूरी के, शास्त्रों द्वारा निर्धारित कर्तव्यों के रूप में बिना किसी प्रकार के प्रतिकार के करने ही पड़ते।

एक समानता व शिक्षा विरोधी समाज जिसने अपने तीन चौथाई हिस्से को जन्माधारित जाति तथा लिंग विभेद के चलते सदियों तक शिक्षा से वंचित रखा। सरकारी या सैनिक सेवाओं में भी इसी आधार को लेकर विभेद किया जाता रहा। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के बाद ही संभव हुआ था जब शिक्षा का अधिकार उनको मिला। सरकारी सेवा खासकर सेना में भी दलितों की भर्ती की गई थी, जिसने अपनी सार्थकता भी भीमा कोरेगांव में सिद्धकर दी थी, जब कुछ सौ सैनिकों ने अपने से कई गुणा बड़ी मराठा सेना को हरा दिया था।

दलित सैनिकों के साहस और बहादुरी के पीछे उनके अंदर ब्राह्मणों के विरुद्ध भरा हुआ गुस्सा भी एक था। क्योंकि उस समय महाराष्ट्र में दलितों (महारों) को रास्ते में चलते हुए अपने साये तक का भी ध्यान रखना पड़ता था कि वह उच्च जाति के लोगों पर न पड़े। रास्ते में अपने पांव के निशान मिटा कर चलना पड़ता था। जिसके लिए उन्हें अपने पीछे झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था। अपने गले में हंडिया लटका कर रखनी होती थी ताकि दलित का थूक जमीन पर गिर कर जमीन को अपवित्र न कर दे।

कोरेगांव इसी तरह के अनगिनत अमानवीय व्यवहारों का जबाब था, जो दलितों के साथ अनंत काल से होते आये थे। कोरेगांव यह जबाब भी था कि वे उन तथाकथित वीर क़ौमों जिन्हें बाद में मार्शल रेस भी कहा गया को आसानी से हरा सकते थे। इसके अलावा भी यहां इस बात की चर्चा करनी चाहिए कि दुनियां का सिर्फ एक यही देश रहा है जो कभी भी बाहरी आक्रमणकारी शक्तियों से जीता नहीं। आज भले अपनी वीरता की गाथाएं गा-2 थकते नहीं।

आज के भीमा कोरेगांव की चर्चा इस नज़रिये से की जानी चाहिए कि आज 200 साल बाद दलितों द्वारा वीरता की उस घटना की स्मृति ताज़ा करने और उन वीरों को श्रद्धांजलि देने के अवसर पर एकत्रित हुए लाखों लोगों की भीड़ पर हमला स्पष्ट करता है कि जन्माधारित जातीय विभेद आज फिर अपना सिर उठाना चाहता है। जिस पर निर्णायक बार किया जाना चाहिए। भीमा कोरेगांव सवाल भी और जबाव भी है।

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