कोरोना जनित लॉकडाउन की परिस्थितियां मुझे बार-2 मेरे अतीत में पहुंचा देती हैं। हर रोज की तरह आज भी सुबह करीब 6 बजे जब कमरे से बाहर आया और सामने बहती ब्यास नदी की तरफ नज़र गई तो देखता हूं, ब्यास और मेरे बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 21 भी गुजरता है, पर दो युवा पीठ पर बड़े-2 झौले उठाये हुए मनाली की तरफ से कुल्लू की ओर जा रहे थे। उस दृश्य ने मुझे लगभग 60 साल पीछे पहुंचा दिया।

तब मैं अपने जन्म स्थान जाहलमा, लाहौल के प्राथमिक स्कूल में शायद दूसरी-तीसरी कक्षा में पढ़ता था। स्कूल में वर्दी पहन कर जाना होता था, जैसे आज भी है। वर्दी में खाकी जीन की पेंट और खाकी जाली की कमीज़ हुआ करती थी। खाकी आज सिर्फ पुलिस व अर्ध सैनिक बलों तक सीमित रह गई है। अब गांव में एक-आध दुकानें थीं भी तो उनमें कपड़े नहीं बिकते थे। कपड़े के लिए इलाके की एकमात्र दुकान थी ढोको परिवार की, गांव किर्टिंग में। यद्यपि ढोको परिवार एक ब्राह्मण परिवार है। परिवार बड़ा था, उनमें से एक बनिये (दुकानदारी) का काम करता था। वह परिवार अपना उद्गम स्थान कश्मीर मानता है और वहां से आ कर लाहौल में बस जाने का दावा भी करता है।

खेर! स्कूल, खाकी वर्दी, गांव किरतिंग,——-। एक बार मैं भी अपने कुछ साथियों के साथ गया था किरतिंग, वर्दी का कपड़ा खरीदने के लिए। तब थे इसी तरह के झौले, हम लोगों के पीठ पर। दुकान पर एक अधेड़ आयु के बहुत मृदुल भाषी सज्जन बैठते थे। उनका एक प्यारा वाक्य था- ‘सुपेशल विलइते मंगइसी शु’ अर्थ ‘विशेष तौर से विलायत से मंगवाया गया है’। जिसे वह हर वस्तु के लिए हर व्यक्ति बोला करते थे। तब पीठ पर झौले, जिन्हें पिट्ठू भी कहते थे और पैदल के सफर चाहे जितने लम्बे रास्ते हों। कोई विकल्प नहीं, कोई राहत नहीं।

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इतना ही नहीं जब हमारे लोग यानि लाहौल के गरीब अपना व अपने बच्चों का पेट पालने की गर्ज से सर्दियों की शुरुआत में कुल्लू की तरफ उतरते थे या फिर गर्मियों के आरम्भ में लाहौल की ओर जाते थे। तब भी बिलकुल इसी तरह पीठ पर भारी झौले या बोझ उठाये हुए आठ-2 दिनो की लम्बी यात्राएं करते थे (जैसे आज गांवों से महानगरों की तरफ और वापस, लॉकडाउन के दौर में)। जब इस प्रकार की यादें आती हैं तो अपने साथ मिले जुले भाव समेटे होती हैं, तकलीफ़ों और गरीबी पर अफसोस तथा अनौपचारिक व संतुष्ट जीवन पर भरोसा।