पशु व्यापार की अधिसूचना के सामान्य आर्थिक प्रभाव सुशासन और विकास के नाम पर धोखे से सत्ता में आए लोग न तो देश को सुशासन दे पाये और न ही विकास (उचित) की तरफ जा पाये। यद्यपि यह तो अनुभवियों को ज्ञात ही था कि हाथी के दांत खाने के ओर और दिखाने के ओर होते हैं।
मोदी-शाह की जोड़ी कभी भी एक निष्पक्ष, निरपेक्ष और न्यायसंगत शासन नहीं दे पाये, जो कि लोकतन्त्र की पहली और सर्वोपरि शर्त है। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की मंशा और निष्ठा कुछ वर्गों और विचारधारा के लोगों के प्रति कभी भी साफ और उचित नहीं रही है।
जहां तक सत्ता में उसका साथ देने वाले नेताओं व पार्टियों की बात है उनका अपना एजेण्डा होता है, अपना हित होता है। वे तो कभी भी किसी भी के साथ हो सकते हैं, वैसे भी आज की राजनीति अवसरवादिता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आज का यह शासन, सुशासन नहीं दुशासन है।
यह शासन विकास, सुशासन और सबका साथ का दुश्मन साबित हुआ है। इस शासन में गौ रक्षा के नाम पर बनाए गए संगठनों के कार्यकलापों के कारण आज देश में मीट और दूध के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। बाज़ार मेँ दूध और मीट की आपूर्ति घट गई है। हाल के समाचारों के अनुसार पश्चिम बंगाल के ताजे दूध मार्किट में आज 50% की कमी आई है, जिसके कारण दूध की कीमतों में लगभग 100% की वृद्धि हो चुकी है। इसी प्रकार मीट मार्किट में भी पशुओं की आपूर्ति में कमी के कारण मीट की कीमतों में भी बहुत उछाल आया है।
आम लोग जिन लोगों पर भरोसा कर रहे हैं असल में वे न तो गौवंश के रक्षक है, न लोगों के और न ही देश के हितैषी। वे सब तो देश और समाज को तोड़ कर अपनी सत्ता स्थापित करना और बनाकर रखना चाहते हैं। इस प्रकार के हालातों ने देश के पर्यटन उद्योग को भी प्रतिकूल प्रभावित किया है। विशेषकर उन पर्यटन स्थलों पर इसका कुप्रभाव अधिक दिखा है जहां पर विदेशी पर्यटक अधिक संख्या में आते हैं।
उन स्थानों में गोवा प्रमुख है। यहां के मीट व्यापारियों, होटल मालिकों तथा पर्यटन से जुड़े अन्य व्यवसायियों ने इस बात पर चिंता जताई है कि गौ रक्षकों के भय और केंद्र सरकार की पशुओं के व्यापार पर अधिसूचना के कारण मीट मार्किट में ताज़ा आपूर्ति नहीं हो रही है, कारणवश होटलों मेँ बीफ परोस नहीं पा रहे हैं। यूरोप और अन्य विदेशी पर्यटक मांस के नाम पर सिर्फ ‘बीफ’ की मांग करते हैं। क्योंकि वे मट्टन को पसंद नहीं करते और भारतीय चिकन को ‘इंजेक्टिड’ कह कर मना कर देते हैं। इस प्रकार पर्यटन से जुड़े व्यवसायियों को डर साता रहा है कि कहीं वे पर्यटक किसी दूसरे समुद्रतटीय पर्यटन स्थल की ओर आकर्षित न हो जायें।
अच्छा हुआ कि कम से कम देश के पर्यावरण मंत्री ने यह कहा है कि पशु मंडियों से वध के लिए पशुओं की खरीद फरोख्त बंद करने के बारे में अधिसूचना को सरकार नाक का सवाल नहीं बना रही है, बल्कि इस विषय में आने वाले सुझावों और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जा रहा है।
सरकार के अंदर और बाहर बीफ बंदी के पेरोकारों की समझ में यह आना चाहिए कि इस व्यापार से किसानों या पशु पालकों को उनके अनुत्पादक पशुओं की कीमत भी मिल जाती है जिससे वे उत्पादक पशुओं को खरीद कर उनका पालन कर सकते हैं। साथ में उन अनुत्पादक पशुओं के घास चारे पर होने वाले खर्च से बच जाते हैं।