लाहौल के लोगों के नाम एक चेतावनी और अपील। दोस्तो, इतिहास गवाह है जब भी कभी कोई नया क्षेत्र खुलता या खोला जाता है, चाहे वह सभ्यता, विकास या फिर वर्तमान के लोकतन्त्र और मानवाधिकार रक्षा के नाम पर हो, मेजबान क्षेत्र व लोगों का शोषण और दमन के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। फिर चाहे वह मध्यकाल में यूरोप द्वारा अफ्रीका, एशिया का हो या अमेरिका का वियतनाम, इराक, मैक्सिको या गुजरातियों-मारवाड़ियों का असम हो कि अंबानियों, अडानियों का दंतेवाड़ा, अबुझमाड़, दुमका हो। दूर-2 तक शोषण और दमन का एक अटूट सिलसिला चल निकलता है।

लाहौल में भी विकास के नाम पर बड़े पूंजीपतियों का पदार्पण हो चुका है। वे यहां फलेंगे, फूलेंगे और फैलेंगे। उनके फैलने का अर्थ होगा हम-आप का सिकुड़ना। जीवंत उदाहरण है पडौसी पर्यटक क्षेत्र कुल्लू ….? इस विषय में संविधान के अनुच्छेद 35ए पर चल रही गम्भीर बहस को भी ध्यान में रखना होगा। इसके अतिरिक्त ‘जनसत्ता’ ने 1996 में हिमाचल प्रदेश राजस्व अधिनियम की धारा 118 पर भी एक गम्भीर बहस चलाई थी। उस बहस में हिस्सा लेते हुए मैंने एक लेख लिखा था, जिसमें लिखा था- ‘….. बराबरी की बात बराबर की हैसियत वालों के बीच होती है, गैर बराबरी वालों के बीच नहीं ….. ।‘

मैं लाहौल-स्पिती के सामर्थ्यवान, क्षमतावान व विवेकशील युवाओं से कहना चाहता हूँ कि उनके परीक्षा के दिन आ गये हैं। उन्हें बाज की दृष्टि, चीते की फुर्ती और शेर की तरह क्षेत्र रक्षण का कार्य करना होगा। जहरीले साँपों, बिच्छुओं और मानव भक्षियों से सावधान रहना होगा, यदि अपना और अपने क्षेत्र का अस्तित्व बचाना चाहते हैं तो। अन्यथा ‘मुख्यधारा तो है ही……?

You May Also Like  Ladakh BJP: मोह का होना भी और उसका भंग होना भी दुखदायी होता है