ज़िन्दगी कोई ‘पोस्टर’ तो नहीं
जो कहीं भी,
किसी भी ईंट-पत्थर की दीवार,
किसी सूखे पेड़ पर
चिपका दी जाये,
यह तो सतत प्रक्रिया है
आती-जाती सांसों,
चढ़ते-उतरते भावों,
संवेदनाओं, अनुभवों
प्रेम और घृणा की।

ज़िन्दगी कोई ‘स्टिकर’ तो नहीं
जो किसी भी
फटे को ढकने
रंग-बदरंग चीथड़े पर
लगा दिया जाये ;
यह तो
अनन्त परिवर्तन धारा है
किसी का
किसी से अंतर करने का
प्रकृति के
निरन्तरता और बदलाव का।

ज़िन्दगी कोई ‘टिकिट’ तो नहीं
जो किसी भी
खाली-भरे
अच्छे बुरे लिफाफे
असली-नकली रसीद पर
चस्पा दी जाये
यह तो
मिलन की प्यासी
अविराम, अविरल बहती
जलधारा है।

You May Also Like  सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंदी नहीं