गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के विधान सभाओं के लिए चुनाव कभी भी हो सकते हैं। प्रतीक्षा सिर्फ चुनाव आयोग द्वारा चुनाव तारीखों की घोषणा की है। इन दो राज्यों की राजनीति में काफी अन्तर है। जहां गुजरात में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पारंपरिक रूप में बंटी हुई पार्टियां रही हैं। देश के किसी अन्य प्रदेश में ऐसा देखने को नहीं मिलता कि एक पार्टी से पार्टी कार्यकर्ता समूहिक तौर पर दूसरी पार्टी में गए हों। न सिर्फ कार्यकर्ता अपितु पार्टी के शीर्ष नेतृत्व भी पाला बदल लेता है। जैसे कि शंकर सिंह बघेला ने किया। भाजपा से उठकर कांग्रेस में और कांग्रेस से उठकर अभी शायद फिर भाजपा में जाने की तैयारी। क्योंकि हाल के राज्य सभा के चुनाव ने बघेला तथा साथियों ने भाजपा के प्रत्याशी को वोट दिया था। उसके साथ ही साथ गुजरात में भाजपा और कांग्रेस दोनों कोमल (माइल्ड) हिंदूवादी पार्टियां रही हैं। कांग्रेस भी कभी अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुल कर नहीं आई। यह ठीक है 1970-80 के बीच माधव सिंह सोलंकी के दिशा निर्देश में कांग्रेस ने एक धर्म निरपेक्ष और गरीब पक्षीय समाज-राजनैतिक गठबंधन बनाया था। जिसमें क्षत्रीय (गुजरात में ओबीसी), हरिजन, आदिवासी तथा मुसलमान शामिल था। लेकिन पटेलों द्वारा सोलंकी आरक्षण की नीति के विरोध के कारण इस पर बहुत आगे नहीं जा सका।

इसके विपरीत हिमाचल प्रदेश में इस तरह की राजनीति नहीं की गई। इसलिए हिमाचल की राजनीति इतनी जटिल और निर्दयी नहीं हुई है। वैसे तो सब कुछ हो चुका है, चुनावों की तैयारियां भी शासन-प्रशासन और राजनैतिक पार्टियों व व्यक्तियों ने कर ली है। अब तो प्रतीक्षा है सिर्फ औपचारिक घोषणा की। जैसे ही चुनाव आयोग की तरफ से घोषणा हो जाएगी, समस्त संबद्ध पक्ष मैदान में कूद पड़ेंगे। चुनाव में हिस्सेदारी करने वाले खिलाड़ी, अंपायर, रेफरी और जज सब मैदान में होंगे। उसके साथ ही विशिष्ठ भूमिका में होगा चुनाव आयोग जो सुनिश्चित करता है, स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं साफ सुथरे चुनावों को।

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हिमाचल जैसे छोटे एवं शांत राज्य में अब देश के अन्य क्षेत्रों के देखा-देखी चुनाव का माहौल बदल रहा है। अब यहां भी उसी तर्ज़ पर राजनीति की जाने की शुरूआत हो चुकी है। चुनावों के दौरान तमाम तरह की तिकड़मों का सहारा लिया जाना शुरू हो चुका है।

हिमाचल प्रदेश की 68 विधान सभा सीटों में से तीन सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित रहती हैं। आगे इन्हीं तीन सीटों को लोकसभा की मंडी सीट के साथ जोड़कर रखा गया है। इन तीन सीटों किन्नौर, लाहौल-स्पीति और भरमौर को जलवायु अनुकूल न रहने के चलते देश/प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों के साथ नहीं करवाए जाते थे। लेकिन काफी लंबे संघर्ष और प्रयासों के बाद अब इन क्षेत्रों के लिए भी मतदान देश-प्रदेश के साथ-2 या पहले होने लगे हैं।

जैसा कि कहा जा चुका है कि प्रदेश ने देश की राजनीति से बहुत कुछ सीखा है तो उस सीख में एक है राजनीति में परिवारवाद। हालांकि अभी तक इस प्रदेश में यह बीमारी अधिक बड़ी नहीं है। फिर भी प्रसंग योग्य तो है ही। दोनों पार्टियों के प्रमुख नेता चाहे वह वीरभद्र सिंह हो या फिर धूमल हो के बेटे तैयार हैं अपने पिताओं की पगड़ी पहनने के लिए। यह ठीक है कि अभी स्थिति उनके लिए इतनी आसान नहीं है और रास्ते भी साफ नहीं हैं।

सद्प्रयास इस बार 68 विधानसभा सीटों में से एक लाहौल-स्पीति सीट पर विशेष तौर पर कुछ सूचनाएं पाठकों से सांझा करने का प्रयास करेगा। उम्मीद है पाठक सुरुचिपूर्ण पाएंगे