कुछ दिन पहले पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के द्वारा बतौर उप राष्ट्रपति दिये गए अन्तिम सम्बोधन पर शासन के शीर्ष पदों से हुई प्रतिक्रिया अनुचित व अवांछित कही जा सकती है। पीछे पश्चिमी बंगाल में राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी और प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बीच के मतभेद ने राज्य में तनाब की स्थिति पैदा कर दी थी। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के मध्य भिड़ंतें हो रही थी। प्रदेश के राज्यपाल व मुख्यमंत्री के आपसी संबंध शुरू से ही अच्छे नहीं रहे थे। लेकिन हाल में वे बहुत ही कटु हो गए थे। एक तरफ मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्यपाल, राजभवन को भाजपा कार्यालय के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। दूसरी ओर राज्यपाल इन आरोपों से इंकार करते हैं और अपने संवैधानिक कर्तव्यों का हवाला देते हुए अपने कार्यों को उचित ठहराते हैं। हम जानते हैं कि संविधान में राज्यपाल के पद का प्रावधान, संवैधानिक प्रमुख के नाते संविधान की रक्षा बिना किसी राजनीतिक दबाव के निभाने के लिए किया गया था। लेकिन इसके स्थापना के साथ ही इस पद के साथ हर तरह का अन्याय व दुर्व्यवहार किया जाता रहा। शुरू से ही कई राज्यपाल विवादों में घिरते रहे। राज्यपाल पद पर नियुक्ति में केन्द्र में सत्तासीन पार्टी ने अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए या पार्टी सदस्य को लाभान्वित करने के उद्देशीय से कार्य किया। बदले में राज्यपालों ने भी पार्टियों के पक्ष में ऐसे निर्णय लिए जिन्हें असंवैधानिक नहीं तो संवैधानिक भी नहीं कहा जा सकता। आज यह समस्या देश के प्रजातन्त्र के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी हो चुकी है।

पीछे मायावती और केजरीवाल ईवीएम के प्रयोग के विरुद्ध उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में चुनाव रद्द करवाने के लिए कोर्ट में जाने की बात करते रहे, लेकिन उस पर अमल नहीं कर सके। उसके बाद तो इस मामले में बहुत कुछ घट चुका है। ‘आप’ पार्टी यहां तक कि चुनाव आयोग ने भी ईवीएम मशीनों पर चुनौतियां कार्यक्रम चलाया जिसमें देश की कुछ एक राजनीतिक पार्टियों को छोड़ सबने हिस्सा लिया। यह ठीक है कि इस देश में ईवीएम ही नहीं हर चीज में गड़बड़ होने के अंदेशे तो हैं। ईवीएम की गुणवता पर पहले भी संदेह जताया जा चुका है और मामला उच्चतम न्यायालय में भी गया। लेकिन सच्चाई व महत्व की बात यह है कि प्रजातन्त्र में मतदाता पर विश्वास रखना होगा उसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। हारने वाली पार्टियों की हायतौबा तो चली रहेगी, इसी को तो लोकतन्त्र कहते हैं। प्रजातन्त्र में कई मामले ऐसे होते हैं जिनका समाधान राजनैतिक होता है और उसे राजनैतिक ढंग से सुलझाना चाहिए। यह नहीं कि मुझे ही कुर्सी मिलनी चाहिए थी, मिली क्यों नहीं के तर्ज़ पर शोर मचाया जाये।

You May Also Like  Corona Effect: अपना कहने के लिए कुछ कम ही रहता है

पूछा जाना चाहिए इन दोनों राजनेता और नेत्री को ऐसा क्या किया था उन्होंने उन प्रदेशों के लोगों तथा क्षेत्र के लिए कि मतदाता टूटकर पड़ेंगे उनकी तरफ? मायावती की जेब की पार्टी बीएसपी को पूरे देश से समर्थन मिल रहा था, क्योंकि दलितों को लगा था कि हमारा दर्द समझने वाला अब पैदा हुआ। लेकिन मायावती ने मनुष्यों, हाथियों यहां तक कि अपना भी बुत बनाकर रख दिया जैसे चंडीगढ़ में नेकचन्द ने 16 सेक्टर में ‘रॉक गार्डन’ की स्थापना की, मायावती ने ‘बुत पार्क’ बनाए। उसके कार्यकाल में कोई एक ऐसा सुधार नहीं हुआ जो कि दलितों को ‘मुक्ति और शक्ति’ दिलाने की दिशा में हो। कोई भूमि सुधार, आर्थिक, शैक्षिक नीति नहीं बदली गई। दलितों के उत्थान के लिए कोई विशेष योजना नहीं बनी। बल्कि अपने चारों तरफ अपने ही समुदाय के लोगों को इकट्ठा किया गया। यह स्थिति सिर्फ यूपी की नहीं है, पूरे देश में ऐसा ही हुआ है। पूरे देश में जाटवों के अतिरिक्त किसी को पार्टी में महत्वपूर्ण जगह नहीं दी गई जबकि कांशी राम के समय इसके उलट था। दलितों के सशक्तिकरण की दिशा में मायावती ने भी वही किया जो उससे पूर्व और उसके बाद के अन्य राजनैतिक पार्टियों व नेताओं ने किया।

यहां तक कि मायावती अपने समुदाय यानि जाटव से बाहर तक नहीं निकल पाई, जबकि इस दलित जमात में कई अति दरिद्र और पिछड़े, उपेक्षित और हाशिये की छोटी-2 जातियां आज भी मौजूद हैं। मायावती जी उनको भी अपने साथ नहीं रख पाई। जबकि बात होती है समाज के बहुजन यानि 85% की। मायावती सामाजिक अभियांत्रिकी या सोशल इंजीनियरिंग के चक्कर में ब्राह्मणों के चंगुल में चली गई। अब जो मिश्राओं और जाटवों ने कहा वही मायावती जी ने किया। यहां तक कि अब तो उसके हिसाब से बीएसपी तो कुछ थी नहीं बस थी तो सिर्फ मायावती। जैसे चुनाव से पहले एक बार उसने घोषणा की थी ‘न किसी को समर्थन दूंगी, न लूंगी’ जिसका सीधा सा अर्थ है कि वही पार्टी हैं। एक और बात चुनाव से पहले इस प्रकार की घोषणाएं और वक्तव्य क्या जताते हैं इसको समझना कठिन नहीं है। सब कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश में मायावती ने अपनी हार मान ली है। तो यह ईवीएम का रोना क्यों?

You May Also Like  तब मेरे लाहौल के गांव से कुल्लू आठ दिन में पहुंचते थे- यात्रा वृतांत

दूसरी तरफ राजनीति का दूसरा अपूर्व चरित्र केजरीवाल, जिसे लग रहा था कि अकाली दल और भाजपा की सरकार के विरुद्ध लोगों में रोष है, और सत्ता में रहने का ‘इंकमवेनसी फेक्टर’ भी, साथ में पंजाब अपने युवाओं की नशे की लत तथा व्यवसाय की समस्या से जूझ रहा था। कांग्रेस भी कोई अच्छी हालत में नहीं थी। साहब को लगा कि दिल्ली के ‘भ्रष्टाचार’ और ‘लोकपाल’ की तरह पंजाब में नशे की समस्या को भुना लेंगे और पंजाब उनके कदमों में होगा…। वैसे भी विदेशों से धन की मदद तो खूब आ रही थी साथ में कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि से स्टार प्रचारक भी बुला रखे थे। जिन्होंने चुनावों के बाद वापस जाकर पंजाब में जीत की खुशी मनाने के लिए कनाडा में तमाम हाल बुक करवा लिए थे। उसके साथ ही उसके स्टार प्रचारक और नेता तो पार्टी की आज्ञा लेकर विदेश जाकर अपने समर्थकों को धन्यवाद भी कर आए थे। अब तो प्रतीक्षा थी तो सिर्फ चुनाव परिणामों की।

अब यदि उनको अपनी हार हज़म नहीं हो रही हो तो इन दो राजनैतिक चरित्रों को इसका राजनैतिक हल निकालने के प्रति संजीदगी से सोचना चाहिए। यदि कोर्ट जाकर राजनैतिक मामले हल करने हों तो हर कोई एक वकील खड़ा कर के कोर्ट में खड़ा हो सकता है। इन दोनों को यह भी समझना चाहिए कि यह मामला कोई उनकी पार्टी का अंदरूनी मामला नहीं है, जो कि उनकी पार्टी के संविधान के अंतर्गत हल किया जा सकेगा।

कुछ दिन पहले मैंने मायावती जी और केजरीवाल जी तथा ईवीएम पर लिखा था। उसे आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूं कि ईवीएम के पहले प्रयोग 1982 के बाद यह लगातार विवादों में रहा लेकिन इसकी कार्य कुशलता, पारदर्शिता और शर्त आदि पर वही पार्टी शोर मचाती है, जो चुनाव हार जाती है। जैसे फरवरी 2015 में दिल्ली चुनावों से पांच दिन पहले केजरीवाल जी ने ईवीएम के दुरुपयोग का अंदेशा जताया था, लेकिन ‘आप’ ने जब 70 में 67 सीटें जीती तो केजरीवाल जी चुप्पी साध गए। अब भी पंजाब में यदि उनकी पार्टी जीतती तो शायद केजरीवाल जी चुप रहते।

You May Also Like  जानिये “सद्प्रयास” असल में है क्या

यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि ईवीएम से बड़ा खतरा तो और है। ईवीएम तो एक मशीन है, खराब होगी तो ठीक कर दी जाएगी। मशीन अपने आप बेईमानी नहीं कर सकती, इसके पीछे इंसान ही रहता है। मशीन खराब होगी तो ठीक हो जायेगी, लेकिन इंसान का ईमान खराब हो जाये तो उसका इलाज कहीं भी उपलब्ध नहीं है। आज हमारे प्रजातन्त्र के लिए ईवीएम से अधिक बड़े खतरे हमारे राज्यों में तैनात प्रदेश के संवैधानिक मुख्य यानि राज्यपालों से हैं जैसे कि हाल में गोवा और मणिपुर में हुआ। राज्यपालों ने अकेली सबसे बड़ी पार्टी को पूछा तक नहीं और सीधे केंद्र सरकार की पार्टी को सरकारें बनाने का न्यौता दे दिया। यह ठीक है कि इन राज्यपालों ने अपने विवेक का प्रयोग करते हुए अपना फर्ज़ अदा किया है। लेकिन इस प्रकार के कार्य देश में प्रजातन्त्र के भविष्य के लिए सवालिया निशान खड़ा करते हैं। इस देश के प्रजातन्त्र के सिर पर इसके अतिरिक्त भी कई अन्य बड़े खतरे मंडरा रहे हैं। इसलिए तमाम राजनैतिक पार्टियों, भाजपा को भी इस मामले में संजीदगी से सोचना चाहिए। विशेष कर विपक्ष जो नाममात्र रह गया है, को अपने-2 खोलों से बाहर आकर इसको एक राजनैतिक लड़ाई के रूप में लड़ना चाहिए और लड़ाई को संसद और सड़क दोनों पर लड़ना चाहिए। अब तो इस देश के राजनेता अपने-2 मूछों में तेल लगाकर ताव देने की बजाए अखाड़े में आयेँ। लोगों के पास जाये उनको उनकी लड़ाई के बारे में जागृत करें, देश के लोकतन्त्र को बचायेँ।