अभी कुछ दिन पहले इस देश के व्यावसायिकों के सबसे बड़े संगठन इंडियन मेडीकल एसोसिएशन के हजारों डाक्टरों ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया और महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट पर सत्याग्रह किया। बताया गया कि डाक्टरों के विरोध प्रदर्शन का कारण मरीजों व उनके तीमारदारों द्वारा उन पर किए जा रहे हमलों के विरुद्ध था, जिनसे वे सुरक्षा चाहते थे। परंतु असल कारण थे ‘जेनेरिक दवाइयां’ लिखने और ‘प्राइवेट प्रेक्टिस’ पर रोक का सरकारी निर्णय। सरकार द्वारा उठाये गये कदमों को डाक्टर पचा नहीं पा रहे हैं। सरकार द्वारा इस तरह के निर्णय लिये जाने के पीछे कारण हैं देश के स्वास्थ्य सेवाओं की पिछड़ी हुई दशा।

सरकार का मानना है इस प्रकार देश के गरीबों को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी। अब देश देश के ‘नोबल प्रोफेशनल’ इस पर उतेजित और गुस्से में हैं। क्योंकि इस तरह तो वे अपने कारपोरेट मालिकों के मुनाफ़ों को कम करते हैं साथ ही साथ उनकी अपनी आय पर भी रोक लग जाती है। फिर वह चाहे ‘जेनेरिक दवाइयां’ लिखना हो या कि ‘प्राइवेट प्रेक्टिस’ बंद करने का मामला हो।

डाक्टरों की अति समृद्ध स्थिति का पता मुझे कल तब चला जब मैं सेना से रिटायर्ड अफसर अपने एक मित्र से मिलने उसके घर गया। उस क्षेत्र में बहुत से सेवानिवृत एवं सेवारत लोगों के मकान हैं। लेकिन उस पूरे इलाके में एक मकान ऐसा है जो बरबस ध्यान आकर्षित करता है। बिलकुल ही अलग सा और हर तरह आलीशान है। बताया गया कि वह एक डाक्टर साहब का मकान है। जिसे क्षेत्र के लोग ‘लैंड मार्क’ के रूप में प्रयोग करते हैं।

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इधर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक चिकित्सक द्वारा लिखित एक लेख ‘डोन्ट ब्लेम द डॉक्टर’ पढ़ा। अच्छा लगा अपनी विरादरी की खूब तारीफ भी की है और उनका बचाव भी किया है। उनके लेख से ऐसे लगता है जैसे कि तमाम मरीज, दुर्घटना के शिकार अस्पताल सिर्फ सहने के लिए पहुंचते हैं और डॉक्टर लोग (सरकार अस्पताल) इन मरीजों के तिमारदारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। उनका यह भी कहना है कि मरीज के परिजन डॉक्टर पर बेकार चढ़ दौड़ते हैं। जिस देश में डॉ. को भगवान का रूप माना जाता है, जिस देश में सब कुछ सह लेना आम आदमी अपनी नियति मान बैठा है। अस्पताल के दरवाजे पर मर जाता है, लेकिन मजाल कि उफ़्फ़ तक कर जाये। वह भला क्या कर लेगा किसी का?

डॉक्टर साहब पर किसी तरह की कोई कार्यवाही हुई नहीं कि डॉ. साहब आले को ‘एके 47’ के रूप में प्रयोग करने से पीछे नहीं हटते। तमाम अस्पताल बंद, मरीज बिना इलाज के मौत के मुंह में चले जाते हैं। डॉक्टर साहब अस्पताल के गेट पर मुस्कराते हुए टीवी और अखबारों के लिए फोटो देते हुए दिख जाते हैं। लेकिन अब तो डॉ. साहब लोग भी दो-2 सुरक्षा गार्डों की दरकार रखते हैं। क्योंकि आखिर वह भी तो डॉक्टर साहब हैं, अफसर हैं, सुरक्षा के हकदार…..? सुरक्षा की मांग भी क्यों न हो अस्पतालों में तमाम आतंकवादी जो भरे रहते हैं? आने वाले समय में लाल बती की भी मांग हो सकती है…….? ताकि पता चल सके कि कोई साहब आए हैं…..?

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एक डॉक्टर यह भी-

चिकित्सा को श्रेष्ठ व्यवसाय कहा जाता है। इस देश में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो चिकित्सक या डॉक्टर को भगवान का रूप मानते हैं। यह सच भी है। भले ही इस व्यवसाय के अंदर जितनी दुकानदारी, बेईमानी, घोटाले और अपराध सामने आ रहे हों। आज भी इस दुनिया में बहुत से ऐसे डॉक्टर और चिकित्सक मिल जाते हैं, जिन्हें पूजने का दिल करता है।

उन्हीं चिकित्सकों में एक हैं मुंबई के डॉक्टर ज़ाकिर उदवाडिया। जो न केवल अपने चिकित्सक के व्यवसाय से पूरी ईमानदारी से जुड़े हैं। उससे भी आगे जाकर, उन्होने विश्व टीबी दिवस के अवसर पर देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को एक खुला पत्र लिखकर प्रार्थना की है कि वह ‘बुलेट ट्रेन’ को भूल जाएं, लेकिन टीबी के लिए फंड दें।’

डॉ. उदवाडिया की यह भावना न सिर्फ उनके चिकित्सक व्यवसाय, मानवता भरा दिल का प्रमाण है अपितु उनके अंदर की सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी दर्शाता है। उनके पत्र पर कुछ लिखा था उसे यहां दे रहा हूं।

” देश का जीडीपी और सेंसेक्स बढ़ता जा रहा है। बिमारियों से लोगों की मौतें बढ़ रही हैं, किसानों की आत्महत्याएं, कुपोषण, बेरोजगारी बढ़ रही है। इस बीच कल एक समाचार था, पुणे के एक चिकित्सक डा. ज़रीर उदवाडिया ने प्रधान मंत्री को एक पत्र लिख कर कहा है- ‘पीएम मोदी अपनी बुलेट ट्रेन को भूल जाइये। हमें नई दवाइयाँ दीजिये हमें इलाज की जरूरत है, शीघ्र निदान के लिए लेब और टेस्ट दीजिये, हमें अधिक फंड दीजिये न कि टी बी बजट में कमी’।

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क्योंकि इस देश मेँ टी बी से हर मिंनट मेँ एक मौत होती है जो साल मेँ 5,25,600 हो जाती है और जो अवश्य ही आतंकवाद के कारण हो रही मौतों से अधिक हैं।‘ आगे डा. उदवाडिया ने लिखा है- ‘हमें समाज परिवर्तन दीजिये, क्योंकि टी बी अपूर्ण सभ्यता की पूर्ण अभिव्यक्ति है”।

एक उदाहरण यह भी 

उदाहरण दिये जाने योग्य एक डॉक्टर मेरे क्षेत्र में भी हैं। डॉ. रोशन लाल गुप्ता, जिन्होंने अपना पूरा सेवाकाल सरकारी अस्पताल में बतौर ‘मेडिकल स्पेशियलिस्ट’ काटा। अपने व्यवसाय और मरीजों के प्रति पूरी ईमानदारी से कार्य करते रहे। जहां आज सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भीड़ अधिक होने, वेतन-भत्ते कम होने, सुविधाओं और सुरक्षाओं की कमी का रोना रोते रहते हैं और अपने मरीजों के साथ जानवरों सा व्यवहार करते हैं। उन्हीं हालातों में मैंने डॉ. गुप्ता को खुशी-2 से अपना काम करते हुए देखा है। उनके चेहरे पर कभी भी शिकन तक नहीं देखी। वह अपना लंच का समय कम कर देते थे। शाम को तब तक घर नहीं जाते थे जब तक अपने अंतिम मरीज को न देख लें, वह भी संतुष्टि के साथ।

डॉ. गुप्ता अपना पूरा सेवा काल सरकारी अस्पतालों में देने के बाद सेवा निवृत हुए और अब भी हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के सरकारी अस्पताल के साथ कुल्लू वैली अस्पताल को सेवा दे रहे हैं। आज भी उनके चेहरे पर वही ताजगी और अपने मरीज और व्यवसाय के प्रति प्रतिबद्धता नज़र आती है।

 

लाल चंद ढिस्सा

पूर्व आईसीएस (IAS) व सामाजिक कार्यकर्ता