लाहौल के लोगों के नाम चेतावनी देते हुए मैंने अपने एक फेस बुक पोस्ट में लिखा था- दोस्तो, इतिहास गवाह है जब भी कभी कोई नया क्षेत्र खुलता या खोला जाता है, चाहे वह सभ्यता, विकास या वर्तमान के लोकतन्त्र और मानवाधिकार रक्षा के नाम पर हो, मेजबान क्षेत्र व लोगों का शोषण और दमन के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। फिर चाहे वह मध्यकाल में यूरोप द्वारा अफ्रीका, एशिया का हो या अमेरिका का वियतनाम, इराक, मैक्सिको या गुजरातियों-मारवाड़ियों का असम हो कि अंबानियों, अडानियों का दंतेवाड़ा, अबुझमाड़, दुमका हो। दूर-2 तक शोषण और दमन का एक अटूट सिलसिला चल निकलता है।
लाहौल में भी विकास के नाम पर बड़े पूंजीपतियों का पदार्पण हो चुका है। वे यहां फलेंगे, फूलेंगे और फैलेंगे। उनके फैलने का अर्थ होगा हम-आप का सिकुड़ना। जीवंत उदाहरण है पडौसी पर्यटक क्षेत्र कुल्लू ….? इस विषय में संविधान के अनुच्छेद 35ए पर चल रही गम्भीर बहस को भी ध्यान में रखना होगा। इसके अतिरिक्त ‘जनसत्ता’ ने 1996 में हिमाचल प्रदेश राजस्व अधिनियम की धारा 118 पर भी एक गम्भीर बहस चलाई थी। उस बहस में हिस्सा लेते हुए मैंने एक लेख ‘और कड़े हों इस कानून के प्रावधान’ लिखा था, जिसमें लिखा था- “धारा-118 की कानूनी पेचिदगियों में जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं। मैं तो बस कुछ कारणों से इस धारा को बनाए रखने के हक में ही नहीं, बल्कि कुछ और आगे बढ़कर ऐसे प्रावधानों के पक्ष में हूं, जो कि कृषि भूमि का गैर कृषि कार्यों के लिए प्रयोग पर कड़ा प्रतिबंध लगाते हों। जिससे कि सीधे-सादे, गरीब, अशिक्षित ग्रामीणों का शोषण न हो सके।“
‘सद्प्रयास’ के मई 2003 अंक के संपादकीय ‘विकास की अवधारणा बदली जाए’ में मैंने लिखा था, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था- “हाल ही में सम्पन्न हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में हिमाचल प्रदेश को देश के आदर्श राज्य के रूप में स्थापित करने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री ने वन कटान प्रतिबंध के चलते राज्य को प्रतिवर्ष हो रहे 300 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की। यानि कि वह प्रतिवर्ष 300 करोड़ रुपये मूल्य के वन कटवाना चाहते हैं और शाही ठाठ बरकरार रखना चाहते हैं। कितनी मौलिक सोच है? यह एक नमूना है आज के विकास की अवधारणा का। हम कंकरीट के जंगल और सिर्फ भौतिक सुख-सुविधा को ही विकास का एक मात्र पैमाना मान बैठे हैं। आपके ड्राइंग रूम सजे होने चाहिए। आपके पास एक अदद कार, एक अदद वाशिंग मशीन, एक अदद रंगीन टी.वी. वगैरह-वगैरह हो और आप विकसित…. ।“
“इस सबको हासिल करने के लिए कुछ भी करना पड़े, किया जाना चाहिए सब उचित समझा जाएगा। इसके लिए अपने अस्तित्व को भी दांव पर लगाया जा सकता है। मुझे नहीं मालूम हि.प्र. के मुख्यमंत्री को यह ज्ञात है या नहीं कि उनके जैसे राज्यों के अस्तित्व के लिए 66% क्षेत्रों में वनों का होना वैज्ञानिक आवश्यकता है जबकि वर्तमान में वन किसी भी प्रकार 30% से अधिक क्षेत्र में नहीं है। इस पर भी ऐसा दावा कि वह सिर्फ वन काट कर हर साल 300 करोड़ की आय प्राप्त कर सकते थे, अचंभित कर देता है।“
इस प्रकार की विकास की अवधारणा के चलते ही हर तरह का पर्यावरणीय, पारिस्थितिकीय, आर्थिक और सामाजिक असंतुलन पैदा हुआ है। इस सोच के चलते पैदा हुए असंतुलन ने एक विवाद उठाया था, शिमला में बंदरों का उत्पात और उस पर हिमाचल सरकार द्वारा केंद्र सरकार से असभ्य बंदरों को मारने की अनुमति प्राप्त करने की कोशिश। उस प्रयास का क्या हुआ यह एक अलग-सा विषय है लेकिन इस प्रकार के कार्य कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य पैदा करते हैं।
इस विषय में एक महत्वपूर्ण बात मुख्य धारा के बहुसंख्यक लोग अक्सर उछालते रहते हैं कि देश में ‘समान संहिता’ लागू हो। जिस पर पिछले चार सालों के दौरान तो कुछ अधिक ही हाय तौबा मचाई जा रही है। जिसका उदाहरण ‘तीन तलाक’ को बंद करता कानून का बनाया जाना है। अब संविधान के अनुच्छेद 35ए पर सर्वोच्च न्यायालय में होने के बहाने और उस पर दबाब बनाने की गर्ज़ से बहस चलाई जा रही है। क्योंकि अनुच्छेद 35ए जम्मू कश्मीर राज्य को बाहरी दखल से बचाने के उद्देश्य से तत्कालीन भारत सरकार और जम्मू कश्मीर के महाराजा के बीच हुए एक समझौते के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया गया है। जिसके तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति राज्य में भू सम्पति खरीद नहीं सकता। परंतु वर्तमान की शासन व्यवस्था इस अनुच्छेद को समाप्त करने पर तुली हुई है। जिसका असर न सिर्फ जम्मू कश्मीर पर बल्कि पूरे राष्ट्र पर पड़ेगा जिसमें हिमाचल प्रदेश भी शामिल है। इस कार्य से देश के संघीय लोकतान्त्रिक ढांचे पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
देश के कुछ क्षेत्रों एवं समाजों, समुदायों, समूहों तथा व्यक्तियों को देश के अन्य क्षेत्रों व वर्गों के साथ चलने में सुविधा हो, इसके लिए उन्हें संवैधानिक सुरक्षाओं और सुविधाओं का दिया जाना आवश्यक है। लेकिन यहां फिर बहुसंख्यकों द्वारा समानता का प्रश्न उठाया जाता है। इस संदर्भ में उपरोक्त धारा 118 पर बहस में दिये तर्क को उदधृत कर रहा हूं- “बराबरी की बात अक्सर कही जाती है, लेकिन बराबरी कैसी? किन के बीच? बराबरी और समानता का तर्क देते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि बराबरी की बात बराबर वालों के बीच होती है, गैर बराबरी वालों के बीच न तो संभव है, न उचित और न ही तार्किक। इतिहास साक्षी है कि आज तक ग्रामीण, पहाड़ी, आदिवासी, पिछड़ा और सीधा-सादा व्यक्ति जब भी शहरों, मैदानों, विकसित व अधिक सभ्य क्षेत्रों में गया तो उसने क्या हासिल किया है? सिर्फ गुलामी और गुमनामी। क्या बन पाया है वह? कुली, रिक्शा वाला, घरेलू नौकर और बाबू ही या इससे कुछ अधिक? इसके विपरीत शहरी, मैदानी, पढ़ा-लिखा, विकसित व अधिक सभ्य समाज का व्यक्ति गांव, पहाड़ों, आदिवासी क्षेत्रों व अविकसित क्षेत्रों में जाकर उनका मालिक, आका और राजा ही बना है।“
इसे आगे बढ़ाते हुए लिखा – “इस प्रतिबंध को हटाने से एक बात का और खतरा पैदा होगा कि गैर हिमाचलियों और गैर कृषकों को अपने काले धन को निवेश करने की छूट मिल जाएगी। इसका एक भयंकर परिणाम होगा, क्योंकि ज़मीनों की खरीद-फरोख्त काले धन से होगी। इसलिए ज़मीनें बहुत ऊंचे दामों पर बिकेंगी और कृषक व हिमाचली अधिक से अधिक ज़मीनों से बेदखल होते चले जाएंगें। इससे जमीन अधिक से अधिक गैर हिमाचलियों व गैर कृषकों के हाथों में, गैर कृषि प्रयोग के लिए चली जाएगी। धरती पुत्र का धरती से एक भावनात्मक लगाव रहता है। उस धरती के भले-बुरे की उस पर एक विशेष अनुभूति व प्रतिक्रिया होती है, जो कि बाहर से आये व्यक्ति की अनुभूतियों और प्रतिक्रियाओं से सर्वथा भिन्न होती है।“
एक अन्य बात सांझा करना चाहता हूं और वह है कि आज राजनीति की तरह समाज कार्य (सोशल एक्टिविज़्म) का भी एक नया रूप सामने आ रहा है। सरकारी नौकरियों से रिटायर्ड लोग, जिनमें कुछ तो 58 वर्ष की आयु के बाद कुछ 60 और कुछ तो 65 वर्ष भी, समाज कार्यकर्ता बने हैं या फिर ऐसे लोगों से जनसंघर्ष का नेतृत्व संभालने की प्रार्थनाएं की जाती हैं। यह ठीक है सेवानिवृत लोगों के पास जीवन के अनुभव होते हैं, लेकिन वे लोग सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में उपयोगी हो सकते हैं, ऐसा मुझे नहीं लगता। क्योंकि उनका पूरा जीवन संघर्ष में कम सुविधाओं में अधिक गुजरा होता है। इस विषय में दो घटनाएं याद आती हैं। पहली घटना 1995 में मुंबई में हुए जनांदोलनों के राष्ट्र समन्वय और टाटा समाज विज्ञान संस्थान के सम्मेलन की है। जहां मेनका गांधी को मुख्य अतिथि व मुख्य वक्ता आमंत्रित किया गया था। लेकिन सम्मेलन की पूर्व सांध्य को कोर कमेटी की बैठक में इसका विरोध होने के कारण मेनका गांधी को बदलकर डा. बनवारी लाल शर्मा को मुख्य अतिथि व वक्ता के रूप में बुलाया गया था। दूसरी घटना है 1996 की जब जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की भोपाल बैठक में मेधा पाटेकर ने प्रस्ताव रखा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को समन्वय का सदस्य बनाया जाये, लेकिन उस बात का भी विरोध हुआ और उनका प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया गया था। इसके साफ कारण थे उपरोक्त दोनों व्यक्तियों का यद्यपि समाज के प्रति बड़े योगदान थे फिर भी जन आंदोलनों की समझ बनी कि वे आम आदमी के साथ परिवर्तन की लड़ाई बतौर वर्ग नहीं लड़ सकते।
मैं लाहौल-स्पिती के सामर्थ्यवान, क्षमतावान व विवेकशील युवाओं से कहना चाहता हूं कि उनके परीक्षा के दिन आ गये हैं। उन्हें बाज की दृष्टि, चीते की फुर्ती और शेर की तरह क्षेत्र रक्षण का कार्य करना होगा। जहरीले साँपों, बिच्छुओं और मानव भक्षियों से सावधान रहना होगा, यदि अपना और अपने क्षेत्र का अस्तित्व बचाना चाहते हैं तो। अन्यथा ‘मुख्यधारा तो है ही……?
अंत में डा. अंबेडकर के भाषण का एक अंश यहां उद्धृत करना चाहता हूं, जो उन्होंने – 1949 में संविधान सभा के सामने दिया था- ‘’26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमें समानता होगी और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में हमें असमानता मिलेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट एवं एक मूल्य के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे। सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे के कारण एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्धांत को अस्वीकार करते जायेंगे। हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को अस्वीकार करेंगे? यदि हम एक लंबे समय तक इसे अस्वीकार करेंगे तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को जोखिम में डाल कर ही ऐसा करते रहेंगे। हमें अवश्य ही जल्द से जल्द इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिए अन्यथा जो इस असमानता से पीड़ित हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे जिसे संविधान सभा ने इतनी मेहनत से निर्मित किया है।’’
