Sadprayas

उसके हिस्से तो बदहाली ही है – एक कविता

उसके हिस्से तो बदहाली ही है

हर साल की तरह
उसने, सर्दियों की प्रतीक्षा की थी
बरसात के कहर से बचने को,
सर्दियां तो आईं लेकिन
उसकी झौंपड़ी की दीवारें
शीत लहरों को रोक
न पाईं
और
उसके दो बच्चों को
अपना शिकार बना गई।

फिर इंतज़ार किया
ग्रीष्म ऋतु का
यह बेरहम शीत जाये
गर्मी में खुला बैठेगा,
गर्मियां भी आईं
परन्तु उसकी झौंपड़ी को
भट्टी बना दिया,
और
एक दिन झौंपड़ी की
फूस की छत को
किसी ने माचिस दिखा दी;
सब कुछ खाक हो गया।

कई दिनो से अब वह
बरसात की बाट जोह रहा था,
कि उसके कोयला बने दिल पर
पानी पड़े, सीने में ठंडक पड़े,
लेकिन बरसात ने भी बेबफ़ाई निभाई
बाढ़ आ गई
और
उसकी झौंपड़ी बह गई;
फिर सरकारी मुआबजा मिला,
पर पड़ौसी धनी राम को,
बदहाली उसके हिस्से में आई।

ल.च. ढिस्सा
शमशी- 4.8.1991

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