Lockdown और Unlock ‘न छाह न मुछ:’ साबित हुए

Lockdown और Unlock ‘न छाह न मुछ:’ साबित हुए : ‘सुप्रभात भारत! 82वां दिन, मौसम में बदलाव नहीं। महीना जून का तापमान अक्तूबर का, जीतेगा इंसान।’ 14 जून को ‘सुप्रभात भारत’ क्रम में 82वीं पोस्ट डाल चुका हूं और हर पोस्ट में मौसम का जिक्र जरूर किया है। जिसका कारण है, मेरी यह धारणा है कि मौसम और इस तरह के फ्लू के बीच सम्बन्ध अवश्य है। कोरोना या कोविड-19 के शुरुआत में मैंने sadprayas.com में 1918-20 के स्पेनिश फ्लू पर एक लघु लेख लिखा था। जिस में लाहौल-स्पीति तथा कुल्लू में उस से हुए जानी नुकसान के बारे बताया था। जनश्रुतियों, ज्वर (फ्लू) संबन्धित वैज्ञानिक ज्ञान तथा श्वास के रोगों की प्रकृति के स्वज्ञान के आधार पर मेरा मानना है कि मौसम व तापमान का कुछ न कुछ असर तो इस पर पड़ना चाहिए। यद्यपि कोरोना (Corona Virus) व कोविड-19 (COVID19) के बारे में अभी तक बहुत कुछ जानना बाकी है।

एक सच्चाई यह भी कि आज जून महीने का दूसरा सप्ताह समाप्त हो गया है, इस देश में साल का सब से गरम महीना है जून। लेकिन यह भी सच है कि मैंने आज भी पैरों में गर्म जुराबें, कमीज के साथ एक आधे बाजू और एक पूरे बाजू के स्वेटरों के साथ जेकेट भी लगा रखी है। रात को भी बड़ी रज़ाई डाल कर सोता हूं। जिसका अर्थ है, अभी तक मौसम नहीं बदला है, अभी भी ग्रीष्मऋतु नहीं आई है, महीना जून का और तापमान अक्तूबर का। वैसे इस संभावना से वैज्ञानिक भी इंकार नहीं करते कि मौसम का इस प्रकार के फ्लू से सम्बन्ध होगा।

पता चला है कि कुछ दिन पहले तो अपने प्रधानमंत्री जी भी अपने मन की बात में बोले हैं- कोरोना के साथ लड़ाई लम्बी चलेगी। जब कि अभी 25 मार्च के दिन महाभारत की 18 दिन की तरह 21 दिन में फारिग होने का दावा किया था। खेर! इन सात सालों में उन्हों ने दावों, वादों, जुमलों और तुकबंदी में ही बहला कर रखा। उनके दावों व वादों में कुछ ये हैं, देश को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था, विश्व आर्थिक शक्ति, विश्व गुरु, विश्व महाशक्ति के साथ ही हर क्षेत्र में विश्व स्तरीय बनाते-2, कोरोना के दो सप्ताह में ही हांफने लग गया था, देश।  आज कोरोना केस के मामले में 5वें स्थान पर हैं और हालात यही रहे तो जल्दी ही शिखर पर होंगे। हिन्दी की कहावत याद आती है, चौबे जी चले थे छबे बनने, बन गए दुबे जी।

जबकि लड़ाई की तैयारी के लिए पूरा समय मिला, लेकिन तब शासन-प्रशासन, एनसीआर, सीएए, 370, 35ए, दिल्ली दंगे और मुसलमानों को अलग थलग करने में पूरी शक्ति लगा रहा था। जब अपने यहां कोरोना ने पदार्पण किया तब तक दुनिया के अन्य देश कई-2 तरीके आज़मा चुके थे। नये-2 तरीके अपना और पुराने छोड़ रहे थे। दुनिया भर के वैज्ञानिक प्रयोगों में व्यस्त हो चुके थे। अन्य देश अपने अनुभवों को सांझा कर रहे थे और हमें चेता रहे थे, ताकि हम उनके अनुभवों लाभ उठा सकें। परन्तु हम तो कहीं अन्य व्यस्त थे, हमने सीख लेने से इंकार कर दिया, क्योंकि हमें अपने पर गुरूर था, अपने को बहुत अधिक आंका था। उसी गुरूर और तानाशाही मानसिकता के चलते बिना सोचे विचारे लिये गए निर्णयों और बिना किसी सही कोरोना नीति के देश को गुमराह करते रहे।

जिस का परिणाम सामने है, 20 फरवरी 3, 20 मार्च 249, 20 अप्रेल 18539, 20 मई 106475, 31 मई के दिन 182143 और आज 3 लाख 9 हजार कोरोना के केस के साथ हम शान से विश्व में चौथे स्थान पर विराजमान हो गए हैं। और भी काबिलियत का हाल यह कि जिस दिन देश में 250 कोरोना के केस थे तो लॉकडाउन शुरू और जिस दिन 1 लाख 82 हज़ार केस हुए उस दिन अनलॉक (Unlock) शुरू? जो ‘न छाह न मुछ:’ साबित हुआ, एक तरफ तो अपनी अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया और दूसरी ओर कोरोना को भी नहीं रोक पाये। अभी असफल सरकारी तंत्र तथा हवा में विचरण करने वाले टेक्नोक्रेट और नौकरशाहों का कहना है, कोरोना का बिस्फोट होना तो अभी बाकी है।

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बिना किसी ठोस नीति के इस देश की सरकार ने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करके रख दिया बल्कि बेवक्त लॉकडाउन (Lockdown) और अनलॉक (Unlock) की घोषणाएं करके कोरोना को भी अनियंत्रित कर दिया। लॉकडाउन के दो चरणों के बाद जब लगा कि कोविड-19 पर नियंत्रण पाना असम्भव है तो राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सिर पर डाल कर देश के प्रधामन्त्री खुद दूर जाकर खड़े हो गए।

लॉकडाउन के पहले दिन 25 मार्च को मैंने अपने फेसबुक पर लिखा था- ‘कोरोना ‘संक्रमण’ पर नियंत्रण पाने लिए आज दुनिया के पास राजनैतिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और वित्तीय संसाधन हैं। सौभाग्य। जो 1918 की महामारी के दौरान नहीं थे।’ परन्तु निकम्मे शासकों, स्वार्थी नौकरशाही तथा गैर-जिम्मेदार मीडिया ने सब कुछ गुड गोबर करके रख दिया। इतना ही नहीं इस स्थिति को लोगों ने अवसर में बदल दिया, जैसा कि संकेत दिया गया था। कोरोना पर ‘जनता कर्फ़्यू’ के दिन 22 मार्च को मैंने लिखा था- ‘तैयार रहिये कोरोना, सेनिटाइज़र, मास्क …. घोटालों के बारे में सनसनी पढ़ने के लिए।’

दो दिन पहले सरकारी पार्टी के द्वारा अपनी सरकार की एक साल की उपलब्धियों की लंबी सूची को बाचा गया। अब भी वे आत्म मुग्धता की स्थिति में हैं। जबकि देश की सीमा पर नेपाल नई सीमा के साथ नया नक्शा हाथ में लेकर खड़ा हो गया है। हमने अपने व्यवहारों और प्राथमिकताओं के चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, विशेषकर अपने पड़ौसियों को भी नाराज़ कर दिया है। फिर वह चाहे पाकिस्तान हो, बंगला देश, श्रीलंका या कि म्यांमार हो। अब तो नेपाल भी विरोधी बन चुका है। अपना कहने के लिए भी कोई नहीं बचा है अब। सिर्फ एक ट्रम्प हैं जो जब चाहे चाबुक ले कर खड़े हो जाते हैं, जैसे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के मामले में हुआ था। वैसे आज कल उनके अपने भी दिन गर्दिश में लगते हैं।

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