मैं यह तो ठीक से बता नहीं पाऊंगा कि दुनिया के अन्य देशों के लोगों और सरकारों ने कोरोना या कोविड-19 का मुक़ाबला या लड़ाई की शुरुआत कैसे की थी। लेकिन अपने यहां का तो गवाह हूं, कैसे इस मुक़ाबले की शुरुआत की गई थी। इसका प्रारम्भ युद्ध की तरह देश के प्रधान मंत्री द्वारा एक घोषणा के रूप में की गई थी। चीन में कोरोना के शुरू होने बाद लगभग चार महीना तो हम अन्य अधिक महत्वपूर्ण व आवश्यक कार्यों में व्यस्त थे। जिनमें एनआरसी, सीएए फिर दिल्ली दंगे आदि। कोरोना से युद्ध शुरू करने की घोषणा करने की फुर्सत तो 19 मार्च को मिल पाई थी। 19 मार्च के दिन प्रधान मंत्री देश के नाम संदेश में 22 मार्च को ‘जनता कर्फ़्यू’ घोषित कर देते हैं, एकदम हैरान लोग, फिर भी सिर माथे लेते हैं। 22 मार्च 2020 को प्रधान मंत्री के आदेश को मान कर पूरा देश दिन के समय ‘जनता कर्फ़्यू’ और शाम को तालियां/थालियां बजाता है। बहुत सारे अधिक उत्साही और भक्त तो गलियों और सड़कों पर उतर गए थे।
24 मार्च के दिन 135 करोड़ लोगों के प्रधान मंत्री ने स्वयं देशवासियों को संबोधित करते हुए, गीता के अध्याय 4 के श्लोक 7 का अनुकरण में कोरोना के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की थी। श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं- ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्’। अर्थात- ‘हे भारत! जिस-जिस देश-काल में धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतरित होता हूं’ (श्रीमद्भगवग्दीता यथारूप – श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद)। दुनिया के सबसे बड़े प्रजातन्त्र के चुने हुए प्रधानमंत्री अवतरित होते हुए से आते हैं और कोरोना के खिलाफ 21 दिन की लड़ाई घोषित कर देते हैं।
तालाबंदी के पहले दिन यानि 25 मार्च को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के लोगों से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये संवाद के दौरान कोरोना वाइरस के खिलाफ लड़ाई का आह्वान करते हुए कहते हैं- ‘महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीता गया था पर कोरोना के खिलाफ लड़ाई 21 दिन चलेगी’। इतना ही नहीं प्रधान मंत्री ने आगे देश वासियों से दो ‘स’ की बात की। ‘स’ संयम ‘स’ से संकल्प, ब्रह्मास्त्र। न टेस्ट, न दवाई, न बैक्सीन, न गरीब मजदूरों के लिए कोई उचित व सही व्यवस्था और न ही कोरोना योद्धाओं को पूरी सुरक्षा व सुविधाएं। सिर्फ नाटक और नौटंकियां, थाली बजाना, बिजली गुल करना, मोमवतियां जलाना, फूल बरसाना और बैंड बजवाना इत्यादि-इत्यादि।
सरकार बहादुर की तरफ से उपरोक्त सब किया गया। अब बारी थी ‘जनता कर्फ़्यू’ वाली जनता के करने की। उसने तो बिना सींग-पूंछ के जानवर की तरह बिना शर्त सरकार हुकुम के आदेशों के पालन का प्रण कर रखा था। वह तो उसके हर अच्छे-बुरे कर्म को भुला कर उसके पीछे खड़ी थी। जैसे कि आम होता है कुछ तो अपनी अधिक से अधिक वफादारी दिखाने के लिए एक दूसरे पर चढ़े जा रहे थे या कहें बिछे-2 जा रहे थे। कुछ मेरे जैसे भी थे, जिन्हों ने देश, समाज और मानवता के अस्तित्व के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए बिना शर्त सहयोग का वादा किया था। राजा ने आदेश दिया तो अपने पर ‘कर्फ़्यू’ लगा लिया, उसने हुक्म दिया तो खिड़की दवाजे बंद करके भूखा प्यासा अंदर लॉकडाउन हो लिया, उसने कहा तो थाली-चिमटा बजा दिया, वह जब बोला तो असमय दिवाली मना ली, दीप जला दिये, फूल बरसा दिये, सलामी दे दी, बैंड भी बजा डाले।
पूरा देश उसे श्रद्धा व आस्था से मुक्तिदाता के रूप में देख रहा था। उसे सिर्फ उद्घोष कर्ता के रूप में न देख कर उसे ‘गायत्री मंत्र’ की साक्षात देवी ‘सविता’ के रूप में ले रहा था। देश गायत्री पूजा में ‘गायत्री मंत्र’ की मुद्रा में प्रार्थना कर रहा था- ‘ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुवर्रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात’। अर्थात ‘हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, जिसने संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय है, जो ज्ञान का भण्डार है, जो पापों तथा अज्ञान को दूर करने वाला है, वह हमें प्रकाश दिखाये और हमें सत्य पथ पर ले जाये’।
क्योंकि देश की महान जनता को पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर पूर्णरूप से अनुकूलित किया गया हुआ है, इसलिए वे अपने इस जीवन के कष्टों को पूर्वजन्म के कर्मों के फल के रूप में अपरिहार्य मानते हुए इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं के अंदाज में देखते हैं और कष्टों को झेलते रहते हैं। परन्तु उसी कड़ी में उनके मस्तिष्क में यह भी भर दिया गया है, उन कष्टों को भगवान का कोई  अवतार आ कर दूर कर सकता है। जैसा कि उपरोक्त श्लोकों में एक तरफ भगवान मनुष्य को कष्ट दूर करने वाले के रूप में अवतरित होने के लिए आश्वस्त करता है, दूसरी ओर मानव अपने अच्छे-बुरे समस्त कर्मों की ज़िम्मेदारी उसे सौंप देता है। अपने अस्तित्व को परम ब्रह्म में विलीन कर, मन में तू ही खिवैया तू ही तारनहार भाव लिये टकटकी लगाए रहता है। बिलकुल उसी तर्ज पर देश की जनता ने अपनी नैया देश के मजबूत, शक्तिशाली, कर्मयोगी, 56 इंच सीने वाले दिव्यादर्शनदृष्टा (विजनरी) प्रधान मंत्री के विश्वास पर छोड़ दी थी। उनको विश्वास था कि वह उन्हें और उनकी नैया को भव सागर पार लगायेगा। उसी पुनर्जन्म और अवतारवाद पर अटूट विश्वास के चलते आंखें मूंद कर उसके पीछे चल पड़ा था देश, बेचारा।
‘कोविड-19’, ‘कोरोना’, वैश्विक महामारी आदि-2 और तैयारियां, बैक्सीन, दवाइयां, उपचार आदि के दावे, वादे जो भी किए जाते रहे हैं, विशेष कर 19 मार्च के बाद। 22 मार्च को ‘जनता कर्फ़्यू’ मनाने और शाम को डॉक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों के सम्मान में तालियां, थालियां बजाने को कहा और देश ने वही किया, जो प्रधानमंत्री ने कहा। तमाम देश ने तालियां, थालियां, घंटे-घंटियां बजाई। कुछ ने खिड़कियों से, बालकनियों से तो कुछ गलियों और सड़कों पर पहुंच गए। फिर 24 मार्च को अचानक प्रधान मंत्री बिना किसी विचार-विमर्श और सलाह-मशवरे के  25 मार्च से 14 अप्रेल तक 21 दिन का लॉकडाउन या तालाबंदी घोषित कर देते हैं। यह भी घोषित करते हैं कि जैसे महाभारत की लड़ाई को पांडवों ने 18 दिनो में जीता था, वैसे ही कोरोना की इस लड़ाई को भी हम 21 दिनो के अंदर जीत लेंगे। यह तालाबंदी का पहला चरण था। इस बार बिना दिवाली के दीये जलवाये, मोमवतियां जलवाई, पटाखे फुड़वाये, घर की बिजलियां गुल करवाई, लोगों ने सब किया।
प्रधानमंत्री फिर प्रकट हुए टीवी पर और तालाबंदी को दूसरे चरण के लिए बढ़ा कर 15 अप्रेल से 3 मई तक कर दिया। इस बार की घोषणा से पहले उन्होंने इतना भर तो किया कि प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कान्फ्रेंसिंग मीटिंग की। इन दोनों चरणों में लगभग पूरा देश थम गया और करोड़ों मजदूर बेरोजगार हो गए। दिन को कमा कर शाम को खाने वाले तथा अन्य गरीब लोग भूखों मरने के कगार पर पहुंच गए। हर तरह के वादों और दावों के बावजूद हालात बद से बदतर होते चले गए। गरीब मजदूरों तथा अन्य हाशिये के लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा। उनसे अपने बच्चों की भूख जब सहन न हो सकी तो वे अपने-2 घरों को जाने के लिए सड़कों पर निकल आए।
अब 3 मई भी आने वाली थी। सरकार की तरफ से दिये गए ‘स्वच्छता’ और ‘सामाजिक दूरी’ जैसे निर्देशों का पालन भी ठीक से नहीं हो पा रहा था। साथ ही साथ सरकार ने इतने दिनो में कोविड-19 से लड़ने की दिशा में तो दूर की बात तैयारी की दिशा में भी लगभग कुछ नहीं किया। इस दौरान देश के ‘स्वास्थ्य सेवाओं’ की पोल भी खुलती गई। 135 करोड़ लोगों का देश और बड़े-2 दावे करने वाले नेताओं, दुनिया की महाशक्ति, विश्व की तीसरी आर्थिक शक्ति, 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने का दावा करने वाली सरकार के पास न तो पीपीई किट, न मास्क, न टेस्ट की सुविधा उपलब्ध थी। बस था तो सिर्फ बड़बोलापन और झूठ पर झूठ।
तब तक 3 मई भी आ गई, सरकार ने इस बीच भी कुछ नहीं किया। प्रधान मंत्री एक बार फिर प्रकट हुए टीवी के स्क्रीन पर इस बार 4 मई से 17 मई तक के लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इस बार भी राज्यों के मुख्य मंत्रियों से विचार-विमर्श करने की औपचारिकता पूरी की गई। उसके साथ ही इस बार कोविड-19 के विरुद्ध लड़ने वाले कोरोना-योद्धाओं के सम्मान के लिए अस्पतालों के सामने सेना का बैंड बजवाना, वायु सेना के हेलीकाप्टरों से कोरोना के अस्पतालों पर फूल बरसाने तथा जल सेना द्वारा समुद्री जहाजों में रोशनियां करने जैसी बेतुकी हरकतें कारवाई गई। वह सब भी हो गया, लेकिन जहां एक तरफ तो कोरोना के रोगियों का बढ़ना भी जारी था। दूसरी तरफ मजदूरों का घरों की तरफ बड़े पैमाने पर घर वापसी या गांव की ओर पलायन शुरू हो गया था।
इस बीच गरीबों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों तथा हाशिये में छोड़ दिये गए उपेक्षितों की तकलीफ़ों की हद हो गई थी। एक तरफ तो देश की सेना तक का मज़ाक बना चुके थे, दूसरी ओर उन स्वास्थ्य सेवा कर्मियों और अन्य सहयोगी सेवा कर्मी जो उस लड़ाई में सीधे भाग ले रहे थे के जीवन के साथ भी खेल रहे थे। उनको सुरक्षा और सुविधाएं प्रदान करने के बजाय फूल बरसा रहे थे। लोगों को रामायण और महाभारत सीरियल दिखाये जा रहे थे। कोरोना को तबलिगी जमात (मुस्लिम) और अन्यों में बांट कर परोसा जा चुका था। मज़दूरों तथा गरीबों की कोरोना और भूख दो मोर्चों पर लड़ाई थी, जिसे सरकार की मजदूर-गरीब विरोधी नीतियां और भी कठिनाइयां पैदा कर रही थी। इस सब के चलते उनकी बड़े पैमाने पर घर की तरफ वापसी भी जारी थी।
इस बीच 17 मई भी निकट आ रही थी। समस्या विकराल होती जा रही थी, समाधान नज़र में नहीं था या कि सरकार योजनावश समाधान नहीं कर रही थी। इस लिए अपने सिर से बला को टालने के उदेशीय से इस बार फिर टीवी पर प्रकट हुए प्रधानमंत्री जी, लेकिन बेवक्त और बेनूर। इस बार देश की अर्थव्यवस्था को हुए बेहिसाब नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक पैकेज लेकर। एक राजा की तरह बड़ी उदारता दिखाते हुए 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा कर दी। लेकिन यह भी कहना नहीं भूले कि उसमें भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा पहले ही बैंकों को लिक्विडिटी के लिए दिये गए 8 लाख करोड़ के अतिरिक्त गरीबों के लिए 1.70 करोड़ पहले घोषित सहायता, किसानों को दी जाने वाली किसान सम्मान योजना की सहायता, सामाजिक सुरक्षा पेन्शन और अन्य सहायता सम्मिलित हैं। सब मिला कर कुछ 4-5 लाख का पैकेज और शोर सारे जहां का।
देश का गैर-जिम्मेदार मीडिया टूट पड़ा है महिमा गान करने के कार्य पर। सही मायनों में यह पैकेज एक ऋण योजना से अधिक कुछ भी नहीं है। जबकि इसी बीच बड़े-2 डकैतों के लाखों करोड़ के बैंक ऋणों को बट्टे खाते डालने की घोषणा की जा चुकी थी। आधे घंटे के इमोशनल ब्लेकमेलिंग के बाद तालाबंदी के चौथे चरण के बारे में 18 मई को बताया जाएगा, सूचना दे कर चले गए।
तालाबंदी के इन 60 दिनों में देश की मजबूत सरकार के मजबूत नेता ने इतने वादे और दावे किये, जिन्हें याद रख पाना भी अत्यंत कठिन है। इन दावों और वादों में लड़ाई को बिना ढाल-तलवार के 18 दिनो में जीत लेने से लेकर बैक्सीन तैयार कर लेने, दवाइयों के उपलब्ध होने, हर तरह से टेस्टिंग, उपचार और पुनर्स्थापना सब कुछ शामिल था, किए गए। लेकिन पूरे देश द्वारा बिना शर्त साथ देने के बावजूद आज देश में कोरोना के हालात डरावने बन गए हैं और शासक भाग रहे हैं। इन दावों और वादों और देश और कोरोना की स्थिति देख कर अपने यहां की एक लोक कथा का स्मरण हो आया, आप को भी सुनाता हूं।
कहानी का शीर्षक है ‘बिशुर मठे’ अर्थ है विशु (वैशाखी) के बच्चे, जो एक कहावत के रूप में भी प्रचलित है। कहानी है लाहौल जैसे दूर, कठिन, ठंडे, एक फसली और अलग-थलग पड़ने वाले क्षेत्र की। तब (एक हद तक आज भी) कहा जाता था यहां 6 महीने की रात होती है। क्योंकि सर्दियों के छ: महीने के लिए यह क्षेत्र शेष दुनिया से कट जाता था। इस लिए सर्दियों के शुरू होने और बर्फ पड़ने से पहले उन काले छ: महीनो के लिए हर चीज, खाने-पीने, गरम कपड़ों, ईंधन की लकड़ी से लेकर पशुओं के लिए घास और चारे तक का भी स्टॉक करना पड़ता था/है। व्यक्ति चाहे जितना भी संभाल और संग्रहण कर ले, दूसरे सीजन के आते-2 किल्लत पड़ ही जाती थी। गरीबों की तकलीफ़ों की तो सदा की तरह एक अलग ही कहानी होती है।
कहानी है एक घर परिवार की, जिसमें गरीब मां और चार उसके बच्चे थे। सर्दियों का लंबा और कठिन समय तो किसी तरह कट गया था। लेकिन बिशु त्योहार यानि वैशाखी के आते-2 घर में खाने-पीने को कुछ न बचा था। बच्चे भूखे थे, मां के पास कोई चारा नहीं था। बाहर चारों तरफ बर्फ और अन्दर घर खाली। मां ने एक तरकीब निकाली, बच्चों को आश्वासन देने शुरू कर दिये (जैसे सरकार कोरोना के दौरान देती रही)। “बिशु (उचारण सही नहीं बैठा है) आल:, नउ घिवाइ लऊं, नउ मखीरियाइ लऊं” यानि कि विशु का त्योहार आयेगा तो वह उनको घी और शहद सहित भांति-2 के व्यंजन परोसेगी। भूखे बच्चे प्रति दिन मां से पूछते थे कि बिशु आया या नहीं, मां टाल देती थी। लेकिन बच्चों को कब तक बहला सकती थी? आखिर एक दिन उसे सच्चाई बतानी पड़ी।  मां ने अपने बहला कर रखे, बिशु की प्रतीक्षा करते बच्चों से कहना पड़ा- “बिशु गेआ रुड़ी, घिऊ गेऊं शुकी” (विशु रुड़ गया और घी सूख गया)। जैसा कि होना था बच्चे सदमा सह न सके और मर गए।
लेकिन आप के साथ ऐसा नहीं होगा, होना भी नहीं चाहिए। आप कोरोना का मुक़ाबला करेंगे और मानव जाति जीत का जश्न मनायेगी। भागने वाले भागते रहें, क्योंकि इन्हों ने अपने अतिरिक्त किसी को न चाहा, न देखा और न ही समझा है। एक बार फिर याद करें ‘जागृति’ फिल्म का वह अमर गीत- ‘हम लाये हैं तूफानो से किश्ती निकाल कर, इस देश को रखना मेरे बच्चो सम्भाल कर…… ’। ऐसी सीख नेहरू जैसे नेता ही दे सकते थे।  जाते-जाते :-
हम तो बंद भी हुए,
तंग भी हुए,
भूखे प्यासे भी रहे,
थाली भी बजाई,
मोमबती भी जलायी,
लेकिन सरकार ने
क्या किया, क्या करेगी?
अब भी पता नहीं?

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