Lahaul Spiti: ‘चिनाली’ नहीं ‘चिनलभाशे’ है, यह

Lahaul Spiti: ‘चिनाली’ नहीं ‘चिनलभाशे’ है, यह : यह एक भाषा है, क्योंकि भाषा को जीवित मानव बोलते हैं। इस लिए वह भी जीवित होती है। जब कोई वस्तु जीवित होती है तो उसकी अपनी भी कोई इच्छा-अनिच्छा होती है। लेकिन नहीं अधिक विद्वता अपना प्रभाव दिखाना चाहती है । यही इस बेचारी भाषा के साथ हुआ, बाहरी (भाषा के लिए भी) विद्वान आये, लेना न देना, न कोई पूछ न कोई ताछ, यहां तक कि इसको बोलने वालों तक को नहीं पूछा गया।

इनके लिए सिर्फ इतना पता करना काफी था कि इस भाषा को यहां का एक समुदाय, जिसका नाम ‘चिनाल’ (Chinal) है, बोलता है, इस लिए यह ‘चिनाली’ हो गई। यह तो ऐसे हुआ, जैसे किसी बच्चे का नामकरण किया गया, लेकिन न तो बच्चे के माता-पिता, न कोई अविभावक और न ही कोई रिश्तेदार, बस एक ही पंडितजी और नामकरण हो गया।

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के ज़िला लाहौल-स्पिती (Lahaul Spiti) के लाहौल उपमंडल के चन्द्रा (Chandra) एवं चंद्रभागा (Chandra Bhaga) घाटियों के कई गांवों में सदियों से निवास करने वाले एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा/बोली ‘चिनलभाशे’ (ChinlBhashe) को आज खासा प्रचार मिल रहा है। जिसके कारण हैं, इसका संस्कृत के काफी निकट होना, संस्कृत (Sanskrit) के व्याकरण के साथ इसके व्याकरण की कुछ समानताएं और अति विषम एवं विकट परिस्थितियों में अपने को न सिर्फ जीवित रखने अपितु इतने शुद्ध रूप में प्रचलन में रह पाने की जीवटता।

अब क्योंकि सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक क्षेत्र मेरे प्राथमिकता के क्षेत्र हैं, इस लिए भाषा से भी लेना-देना रहता है। भाषा का सम्बंध सीधा समाज के अस्तित्व और पहचान से होता है। इस लिए भाषा के सामाजिक महत्व को ध्यान में रखते हुए इस भाषा की विशेषताओं एवं आवश्यकताओं की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं:-

1.    यह ‘चिनलभाशे’ है, ‘चिनाली’ नहीं। यह गलत नाम इसे 1980 में दिया गया है।

2.    यह क्षेत्र या प्रजाति आधारित न हो कर जाति आधारित है, जो उत्तर वेदिक काल की भाषा विशेषता है।

3.    लाहौल की सांस्कृतिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है।

4.    इसका अध्ययन लाहौल के इतिहास, संस्कृति और विलक्षण व्यवस्था को जानने का स्रोत बन सकता है।

5.    इसे इसकी वांछित प्रस्थिति और महत्व दिलाने के लिए इसका वर्गीकरण आवश्यक है।

6.    इस भाषा के लिए लाहौल-स्पिती (Lahaul Spiti) ही नहीं अन्य भाषाओं के लिए स्थापित अवधारणाओं व प्रस्थापनाओं से हट कर सोचने की जरूरत है।

7.    यह काफी समृद्ध और विकसित भाषा है। अत: इसके संग्रहण, संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है।

8.    विलुप्ति की दशा में इस के वे कारण नहीं होंगे जो अन्य भाषा/बोलियों के होंगे। इसके बोलने वालों को प्राप्त सामाजिक प्रस्थिति ही इसका मुख्य कारण बनेगा।

9.    इसके ज़िंदा रहने का कारण इसके अन्दर विद्यमान कमजोरी यानि ‘प्रजातीय चेतना’ और ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ एक और एकमात्र कारण बन सकता है।

10.    लाहौल (Lahaul Spiti) की संपर्क भाषाई लोग, इस भाषा के विकास का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि इस भाषा में बहुत सामर्थ्य है, जो अन्य भाषाओं के हित के विपरीत जाता है। जिसके लिए इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक भाषा का दर्जा तथा नाम दे कर इसका अस्तित्व समाप्त कर दे सकते हैं।

विशेष: पाठकों से अनुरोध है कि (1) वे भाषा और बोली के तकनीकी फेर में न पड़ें। क्योंकि समस्त भाषाएं कभी बोलियां रही हैं। (2) यह इस भाषा के सामाजिक न कि भाषायी महत्व को बताने का प्रयास मात्र है।

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