इधर अपनी मजबूत सरकार तीन महीने तक कोरोना की समस्या पर आंखें बंद करके ही नहीं बल्कि अन्य अत्यावश्यक (उसके लिए) कार्यों जैसे एनआरसी, सीएए और अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुसलमानों), दलितों, आदिवासियों और हाशिये के लोगों के साथ हिसाब किताब चुकता करने में व्यस्त रही। जबकि कोरोना महोदय चीन, अमेरिका और अन्य उन्नत देशों में फलता-फूलता रहा और हम अपने एक विशेष मेहमान के स्वागत की तैयारियों में मस्त और फिर उसके आगमन पर जश्न मनाने से फुर्सत मिली तो पता चला कि कोरोना तो अपने घर में प्रवेश कर गया था। आनन फानन में रविवार को ‘जनता कर्फ़्यू’ की घोषणा। तीन दिन बाद ही महाभारत के 18 दिन के युद्ध के नाम पर एकदम 21 दिन की तालाबंदी।

बिडम्बना यह कि आज के समय की परिस्थितियों के अनुरूप अधिकतर घरों में 65 साल से अधिक आयु के अक्षम, असुरक्षित और असहाय वृद्धों के रहने के हालत। कई बार तो वृद्ध युगल भी नहीं अपितु एक नितांत अकेला वृद्ध या वृद्धा। मेरी दशा भी ऐसी ही है, घर में 67 वर्ष का मैं स्वयं और 58 की पत्नी।

इधर एक महीना हो गया था पीडीएस का 5 किलो चावल मिले हुए। अब सरकार तो यही समझती है, इतने भर से सब कुछ ठीक ठाक हो जाता है। जैसे शासक-प्रशासक भी उसी स्तर का जीवन जीते हैं। इस बीच सब्जियां, फल, खाने पीने की अन्य वस्तुएं और दवाइयों सहित अन्य आवश्यक चीजें हमारे लिए बिलासिता की वस्तुएं बन गई थी। घर में अन्य अत्यावश्यक वस्तुएं चीनी, हल्दी, नमक, आदि तक खत्म हो चुकी थी।

सरकार तो कहती ही है, अब आप भी कहेंगे कि नमक तो सरकार द्वारा पीडीएस में हर महीने एक किलो दिया जाता है। लेकिन इस बात का क्या किया जाये कि मेरी धर्मपत्नी, मेरी अन्नपूर्णा, जो उस पीडीएस के दिये हुये को पका कर खिलाती है, का कहना है कि नमक में कंकड़ हैं और खाने योग्य नहीं है।

खैर! एक महीने से अधिक का समय हो गया है कुल्लू गए हुए, अब तो जेब में पैसे भी खत्म हो गए थे। हमारा बैंक भी कुल्लू में स्थित है। यहां घर में मैं और मेरी पत्नी दो ही जने रहते हैं, मेरी 67 और पत्नी की 58 की उम्र। ऊपर से मेरे साथ एक समस्या है, मुझे सांस की बीमारी है, 10 माह से हर रोज कम से कम दो बार ड्यूओलिन के केप्सूल की सांस लेता हूं। इसलिए कई दिनो के विचार विमर्श के बाद योजना बनाई गई जिसके अनुसार तय किया गया कि श्रीमति जी कुल्लू जायेँगी और आवश्यक समान, दवाइयां और कुछ पैसे ले कर आयेँगी।

कुल्लू का कस्बे का ढालपुर क्षेत्र, जहां से मेरी व उनकी दवाइयां ली जानी होती हैं, यहां से 6 किमी के करीब पड़ता है। यातायात का कोई साधन नहीं। श्रीमति जी सुबह 9 बजे तैयार हो कर चली गई। बाज़ार 10 से 1 बजे तक खुला रहता है। इसी बीच में बैंक से पैसा लेना, दवाइयां लेना तथा अन्य ख़रीदारी करना। यानि मात्र 3 घंटे के अंदर ये सब करके वापस घर पहुंचना। 58 वर्ष की आयु, पीठ पर बड़ा सा झौला, जिस में कुछ सब्जियों, दवाइयों, के अतिरिक्त एक अदद ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ले कर 12 किमी का पैदल सफर करके 2 बजे के करीब ‘झांसी की रानी’ की तरह वह जब घर पहुंची तो मुझे लगा, 1857 की लड़ाई आज जीती है।

निष्कर्षत: आज 40 दिन बाद केला देखा और खाया था। 33 दिन बाद अखबार ‘द इंडियन एक्स्प्रेस’ देख और पढ़ पाया था। इसी तरह इतने ही दिनो बाद शिमला मिर्च, गाजर, संतरा, गोभी आदि-2 देख पाये थे, स्वाद चखने के लिए तो रात तक की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। आज जाकर महसूस हुआ कि मैं अभी ज़िंदा इसी दुनिया में हूं। यह सब तकलीफ़ें सिर्फ इस लिए उठाई क्योंकि मैंने ‘कोरोना’ के विरुद्ध लड़ाई में बिना शर्त सहयोग का वादा किया था। यहां एक बात साफ़ करना चाहता हूं, मैंने ‘कोरोना’ पर बिना शर्त सहयोग का वादा किया था, ‘कोरोना के नाम’ पर मनमानियों पर नहीं। मैंने 4 अप्रेल के दिन अपने फेसबुक स्टेटस में लिखा था:

हम तो बंद भी हुए,
तंग भी हुए,
भूखे-प्यासे भी रहे,
थाली भी बजाई,
मोमबती भी जलायेंगे।
लेकिन सरकार ने क्या किया,
क्या करेगी?
देशवासी यह जानना चाहते हैं।

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