कोरोना जनित तालाबंदी की स्थिति को जीवन का अंग बना कर आगे बढ़ रहा है, मानव। इस सिलसिले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर से घर-2 तक की राजनीति शुरू हो चुकी है। एक दूसरे पर कोरोना के दोषारोपण और स्वयं पर से ज़िम्मेदारी हटा कर दूसरे के सिर पर डालने के जोरदार प्रयास भी शुरू हैं। एक तरफ जहां स्वास्थ्य कर्मी कोरोना के भेंट चढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ धूर्त व्यापारी मुनाफाखोरी, कालाबाज़ारी और चोरबाज़ारी, व्यवस्थापकगण बेईमानों के साथ मिल कर मौत की सौदेबाजी तथा भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। उदाहरण हैं मध्य प्रदेश के ‘वेंटिलेटर व आटा’ घोटाले।

एक वर्ग, जिसे नफरत फैलाने से फुर्सत ही नहीं है, पूरी तरह व्यस्त हैं, कोरोना वायरस को भी धर्म, जाति, रंग के आधार पर बांटने के प्रयास में। जिसके उदाहरण है इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन को घेरने के तथा अपने यहां एक समाज विशेष को अलग थलग करने के प्रयास। इसी कड़ी में मेरठ के एक अस्पताल जिसे लोग जीवन देने वाला मानते हैं, द्वारा विज्ञापन दे कर एक पूरे समाज के मरीजों का सशर्त दाखिले की बात करना।

मानव के अन्दर अनुकूलन की प्रवृति और क्षमता असीमित होती है। कुछ दिन की हाय तौबा और उसके बाद धीरे-2 हालातों से समझौता और वह सब उसके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। मुझे अच्छे से याद है 1970 के बाद जब देश के कुछ भागों में समाज-राजनैतिक आंदोलनों ने हिंसक रूप धारण कर लिया था। जिनको तब से आज तक एक के बाद एक नया नाम दिया जाता रहा। हिंसक, अलगाववादी, उग्रवादी, अतिवादी, आतंकवादी से ले कर पत्थरबाज़ तक कहा गया। शुरू-2 में जब सुनते और देखते थे, मन में एक अनौखा सा भय और अजीब सी फीलिंग होती थी। लेकिन धीरे-2 सब शांत हो गया जैसे भाटे के बाद की स्थिति होती है।

उस समय के अशान्त क्षेत्र थे पंजाब और देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, विशेष तौर पर असम। जहां पंजाब में खालिस्तानी तथा असम में बोडोलेंड की मांग की जा रही थी। दोनों स्थानो पर काफी समय से धार्मिक तथा प्रजातीय अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों के लिए आन्दोलन चल रहे थे, जो समय बीतने के साथ-2 उग्र एवं हिंसक होते चले गए। उन आन्दोलनों के पीछे राजनैतिक नफे-नुकसान का भी अच्छे से ध्यान रखा गया था। जैसे हर भस्मासुर के पीछे शिव अवश्य होता है, वैसे ही इन आन्दोलनों के पिछी दिल्ली का सिंहासन था।

अपने यहां के हालत ऐसे हो गए थे कि हमें हिमाचल प्रदेश से दिल्ली जाने में डर लगता था। क्योंकि दिल्ली के रास्ते में कुछ क्षेत्र पंजाब का भी आता था। इस बीच मेरा चयन भारतीय सिविल सेवा के लिए हो गया। 1983 में अशांत असम में चुनाव ड्यूटी पर भेज दिया गया। गुवाहाटी से करीब 100 किमी की दूरी पर ठाकुरबाड़ी क्षेत्र में हमारी तैनाती की गई। ठाकुरबाड़ी हमें भारतीय सेना के परिसर में रखा गया था। तब इस केम्प में गाइड्स रेजिमेंट की पोस्टिंग थी और इसके कमांडर थे कर्नल नरेन्द्र शर्मा जो मेरे पड़ोस मण्डी के रहने वाले थे। इस लिए मेरे दिन अच्छे कट गए। इस बीस दिन के दौरान दिल्ली से हमारे साथ गए कुछ लोग बेचारे डरे सहमे से रहते थे, क्योंकि हमारे रिहाइश के साथ-2 रेलवे लाइन गुजरती थी और साथियों ने रेल और आंदोलनकारियों के कई किस्से सुन रखे थे। इस दौरान पता नहीं क्या हुआ मुझे जो 1970 में बनी फिल्म ‘सफर’ में किशोर कुमार द्वारा गाये गाने की पंक्तियां- ‘ज़िन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया, मौत से भी मुहब्बत निभाएंगे हम…..’ गुनगुनाता रहता था। मेरे डरे सहमे साथी इसे न गाने को कहते थे। इस दौरान अपने कर्तव्य से जुड़ा हर वह काम जो मुझे दिया गया, मैंने पूरी निष्ठा और लग्न से निभाया।

फिर 1987 में 33 साल 5 महीने और 15 दिन की आयु में भारत सरकार की सेवा से त्यागपत्र देकर बाहर आ गया और देश में चल रहे मुख्य आंदोलनों के साथ जुड़ गया। धीरे-2 पर्यावरण, विकास, सामाजिक न्याय एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) के विरुद्ध चले आंदोलनो से निकट से जुड़ता गया और रिश्ते गहराते गए।

हां! सरकारी तथा निजी टीवी चेनलों के चिल्ला-2 कर बोलने वाले एंकरों और विद्वान पत्रकारों की दया व अथक प्रयासों से कुछ नये शब्दों से परिचय हुआ, जिनमें एक का प्रयोग तो आज भी बहुत होता है। वह प्रचलित शब्द है आतंकवाद और आतंकवादी। अब तो लोग इन शब्दों के आदि हो चुके हैं और ये शब्द उनमें कोई भावना नहीं जागते और न ही उतेजित करते हैं। कश्मीर, उत्तर-पूर्व ही क्या पूरे देश में व्याप्त विषेले वातावरण के भी आदि हो चले हैं।

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