इस ‘कोरोना’ जनित लॉकडाउन की स्थिति ने मुझे 55-60 साल पीछे पहुंचा दिया। तब मैं अपने गांव जाहलमा, लाहौल में रहता था। तब न तो सड़कें थीं न ही मोटर वाहन आदि।

तब अमृतसर ही लाहौल के लिए आवश्यक वस्तुओं का एकमात्र थोक मंडी था। दुकानों का सामान अमृतसर से छोटे ट्रकों में कुल्लू/मनाली तक और वहां से खच्चरों पर लाहौल पहुंचता था।

लोगों की आमदन बहुत कम थी उसी के अनुसार जरूरतें भी कम थी। गांव में जहां मेरा घर है उसके साथ ही एक बड़ा नाला है और वहां से उस नाले के पार कुल्लू की तरफ से आने वाला रास्ता साफ दिखता है।

मई-जून के महीने में जाकर घोड़े खच्चरों का आना जाना शुरू हो पाता था। जिसका इंतजार बीते वर्ष के सितम्बर महीने से ही शुरू हो जाता था।

खच्चरों के गले में घंटियां और घण्टे बांधे होते थे। जिनकी आवाज दूर से सुनाई पड़ती थी। आजकल भी कुछ ऐसा ही हाल है। फर्क यह कि आज मैं गांव बाशिंग, कुल्लू में रहता हूं और मेरे सामने ब्यास नदी के उस पार राज्य उच्च मार्ग है और करीब से राष्ट्रीय उच्च मार्ग 21 गुजरता है।

उन सड़कों पर इस तालाबंदी से पहले जहां से लगातार वाहनों का आवागमन रहता था, आज कभी कभार ‘सायरन’ की आवाज सुनाई पड़ती है या कोई आपातकालीन वाहन आता जाता दिख जाता है।

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