यह लेख मैं इस लिए लिख रहा हूं ताकि रिकार्ड रहे, देश, लाहौल-स्पिती तथा कांग्रेस पार्टी के इतिहास में। 20 मार्च, 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायधीशों की खंडपीठ द्वारा अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने वाले निर्णय के विरुद्ध 2 अप्रैल, 2018 के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा सफल भारत बंद, जिसे देश की समस्त राजनैतिक पार्टियों और अधिकतर संस्थाओं द्वारा समर्थन दिया गया था। सम्पूर्ण देश में इस बंद को व्यापक और भारी समर्थन मिला था। जिसमें नौ लोगों की मृत्यू हो गई थी। इस बंद की सफलता पर मैंने अपने फेसबुक के स्टेटस में कहा था “आज मालूम हो गया है कि बाबा साहब अम्बेडकर देश को जगा गए हैं। एक बार फिर अम्बेडकर के सिपाहियों को जिंदावाद के नारे के साथ याद करें संविधान सभा में दिया गया 1949 का बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर का वक्तव्य, जिसमें उन्होंने कहा था-‘‘26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमें समानता होगी और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में हमें असमानता मिलेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट एवं एक मूल्य के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे। सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे के कारण एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्धांत को अस्वीकार करते जायेँगे। हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को अस्वीकार करेंगे? यदि हम एक लंबे समय तक इसे अस्वीकार करेंगे तो हम अपने राजनीतिक लोकतन्त्र को जोखिम में डाल कर ही ऐसा करते रहेंगे। हमें अवश्य ही जल्द से जल्द इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिए अन्यथा जो इस असमानता से पीड़ित हैं, वे राजनीतिक लोकतन्त्र के ढांचे को उड़ा देंगे जिसे संविधान सभा ने इतनी मेहनत से निर्मित किया है।’’

दलितों और आदिवासियों के इस सफल भारत की ताकत को देखते हुए केंद्र की सरकार को यह वादा करना पड़ा था कि संसद में अधिनियम में संशोधन करके न्यायालयों को भी इस की समीक्षा करने की शक्ति से बाहर कर दिया जाएगा। जो उसने 1.8.18 को केबिनेट की बैठक में निर्णय लेकर कर दिया। तदुपरांत 6.8.18 को इस सम्बंध में संशोधन लोकसभा में पारित हुआ और 9.8.18 को राज्य सभा में भी इसे पारित कर दिया।

इस बारे में खास बात यह कि देश की किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इस संशोधन का विरोध नहीं किया। संसद के दोनों सदनों में सभी पार्टियों की तरफ से बोलने वाले नेताओं ने इस संशोधन का स्वागत ही नहीं किया अपितु इस अधिनियम को लागू करने के लिए कारगर कदम उठाने पर भी बल दिया। यही नहीं इससे आगे जाकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को सशक्त ढंग से लागू करने के लिए विशेष न्यायालयों के गठन करने में तेजी लाने के लिए भी कहा।

लेकिन देश के एक छोटे से सबसे अधिक सीमांत वर्ग अनुसूचित जनजातीय दलित के साथ यहां भी ‘संविधान ने अन्याय’ ही किया है। क्योंकि उपरोक्त अधिनियम अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जातियों और अन्यों के बीच के मामलों में ही में ही लागू होता है। इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों या अनुसूचित जनजातियों के समाजों में यह लागू नहीं होता। इस विषय में ‘संविधान के सामाजिक अन्याय खंड-4 (याचिका)’ के आमुख में हिमाचल प्रदेश बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट देश राज ने लिखा है- ‘यूं तो यह सर्वविदित है कि हिन्दू धर्म की सर्व प्रमुख विशेषता ‘वर्ण’ व्यवस्था है। जन्म आधारित जाति विभाजन, मगर इस तथ्य को प्रथमत: ढिस्सा जी अथक श्रम व लंबे शोध के बाद मान्यता दिला पाये कि हिन्दू व बौद्ध धर्मावलम्बी जनजातीय समाजों में तो जाति की जकड़न व लूट और भी भयानक है। इन ‘जनजातीय दलितों’ का तो संविधान में अस्तित्व ही नहीं है। यद्यपि लम्बे संघर्ष के परिणाम स्वरूप हिमाचल प्रदेश व उत्तरांचल में जनजातीय दलितों को दोनों प्रस्थितियां (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति) प्राप्त हुई हैं। लेकिन संघर्ष का निर्धारित उदेश्य और लक्ष्य यह नहीं है।“ आगे भी उन्हों ने लिखा है “यह तथ्य भी हैरान करता है कि तकनीकी तौर पर जनजातीय क्षेत्रों में तो अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम भी लागू नहीं होता, क्योंकि उस कानून में ‘उत्पीड़क’ सामान्य वर्ग का और ‘उत्पीड़ित’ अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का होना आवश्यक है। जबकि अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में तो उस परिभाषा के अनुरूप सामान्य वर्ग का कोई सदस्य है ही नहीं, सभी अनुसूचित जनजाति के हैं।”

इसी लड़ाई को लड़ते हुए मुझे एक लंबा अरसा हो चुका है। लेकिन प्रगति के नाम पर कुछ कर पाया हूं तो देखता सिर्फ कुछ लेख, पुस्तक मात्र एक (जबकि चार खंडों की योजना थी) ही सामने है। हां! हिमाचल प्रदेश के अनुसूचित जनजातीय दलितों को दोहरी प्रस्थिति यानि दोनों प्रमाण पत्र (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति) दिये जाने का एक सरकारी आदेश।

इस विषय में एक अन्य विशेष बात ध्यान देने की यह है कि इस एक्ट को कमजोर करने के निर्णय के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और न्यायाधीशों की व्यापक आलोचना हुई। इसके अतिरिक्त अब तो इस बारे में संशोधन भी पारित कर दिया गया है। इस निर्णय के विरोध तथा अधिनियम में इस बारे संशोधन को न सिर्फ इन वर्गों से ही अपितु देश के अन्य वर्गों ने भी समर्थन दिया। सिवाय एक व्यक्ति के और वह हैं हिमाचल प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र लाहौल-स्पिती के पूर्व विधायक एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष महोदय। जिन्हों भारत बंध के बाद अखबार को दिये अपने ब्यान में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराते हुए इस निर्णय के सही अर्थ समझने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था- (1) विरोध के नाम पर हिंसा का रास्ता मंजूर नहीं, (2) सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है, (3) कुछ राजनैतिक पार्टियां राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए आरक्षित वर्ग के लोगों को उकसा कर दंगे करवा रहे हैं, (4) जनता को पहले न्यायालय के आदेश की मूल भावना को समझना चाहिए आदि।

इस विषय में भी यहां बता देने की आवश्यकता है कि (1) अनुसूचित क्षेत्रों में यह अधिनियम लागू ही नहीं होता। (2) पूर्व उपाध्यक्ष महोदय यद्यपि हिमाचल प्रदेश के बौद्ध समुदाय के अनुसूचित जनजाति में आते हैं लेकिन जाति से ठाकुर हैं तो उन पर अत्याचार तो होने से रहा। (3) जबकि उन्हें इस मामले में अधिक संवेदनशील व सहानुभूति पूर्ण होना चाहिए था क्योंकि वह स्वयं अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक समुदाय (बौद्ध) भूमिका के हैं।

वैसे तो ठाकुर साहब को तो इस मामले में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का साथ देना चाहिए था नहीं तो कम से कम चुप रहना चाहिये था, क्योंकि जिस क्षेत्र का वे प्रतिनिधित्व करते हैं उस क्षेत्र में तो यह अधिनियम लागू ही नहीं होता। इसके साथ ही यह एक्ट संसद द्वारा पारित किया गया है, इस लिए इस पर संसद में ही विचार हो सकता है। और भी जिस क्षेत्र से वे चुन कर जाते हैं और जिस संस्था का उपाध्यक्ष उन्हें बनाया गया था, दोनों से इस कानून को अधिक शक्तिशाली किये जाने का पक्ष लिए जाने की अपेक्षा की जाती है। हां! इस अधिनियम में बहुत बड़ी कमी यह है कि यह उन समाजों के सदस्यों के बीच के मामले में लागू नहीं होता।

यद्यपि अनुसूचित जनजातीय समाजों में भी जातिगत विभेद या उत्पीड़न देश के अन्य क्षेत्रों या मुख्य धारा के बराबर ही है। इस प्रकार के अत्याचारों कि हिमाचल प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में भी लम्बी सूची है। जहां आमतौर पर दलितों (अनुसूचित जनजातीय) द्वारा परम्परिक निर्धारित कार्यों को करने से मना करने या किसी भी अन्य छोटे से बहाने को लेकर उन्हें गांव से अलग कर दिया जाता रहा है। उनका सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक बहिष्कार किया जाता रहा है। जिसके उदाहरण ज़िला किन्नौर के गांव नमज्ञा, रामणी, युला, उरनी, किल्बा आदि तथा ज़िला लाहौल-स्पिती के जहालमा, शंशा, ठोलंग आदि हैं। इन गांवों में अलग-2 समय पर दलितों का सामाजिक बाहिष्कार किया गया और अंत में दण्ड भरने पर गांव में शामिल किया गया था।

1960 में मेरे गांव जहालमा और 1961 में शंशा में ऐसी घटना हुई। इसका एक आधुनिकतम एवं बड़ा उदाहरण है 2007 का बौद्ध और अनुसूचित जनजातीय स्पिती का ‘लामा काण्ड’। जिसमें स्पिती के बौद्ध समाज के दलित बौद्धों के लामा (पुजारी) बनने के विरुद्ध स्पिती घाटी के दलित बौद्धों का सामाजिक, आर्थिक एवं हर प्रकार से बहिष्कार कर दिया गया था। ‘जनजातीय दलित संघ’ के लगभग एक साल के संघर्ष और आदरणीय दलाई लामा जी के हस्तक्षेप के बाद जिसका समाधान निकाला जा सका था। इस विषय में पुस्तक ‘संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1’ में विस्तार से लिखा गया है।

खैर! यहां पर मैं इस विषय पर छपी खबरों और पूर्व विधायक-सह-पूर्व उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के ब्यान को दे रहा हूं ताकि लेख प्रमाण व स्मृति शेष रहे।

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