धीरे-2 लाहौल-स्पिती, विशेषकर लाहौल से खबरें बाहर आ रही हैं कि वहां हाल के प्रकृति के इस खेल की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। केलांग के अतिरिक्त पूरे लाहौल में संचार और यातायात 22 सितम्बर से लेकर रूप पड़ी हुई है। वैसे केलांग भी 24 सितम्बर तक बंद था। कहीं से कोई समाचार नहीं निकल पा रहा था। मुझे तो अपने घर, श्रीमति जी के बारे में भी 30 सितम्बर को जाकर कुछ पता चल पाया? जोकि उन्हों ने अपने घर से 26 किमी दूर त्रिलोकनाथ जाकर संपर्क किया। क्योंकि वहां पर एयरटेल का सिग्नल था। उनके काफी नजदीकी रिश्ते की बहन का देहान्त 26 सितम्बर को हुआ था, जिसकी सूचना उन्हें एक दिन पहले ही मिल पाई थी।

इधर जो भी समाचार हैं वे सब बचाव कार्य करने वालों के हवाले से मिल रहे थे। उनके अनुसार पूरी घाटी में 4-5 फुट तक बर्फ पड़ी है। इस बर्फ ने लाहौल की आर्थिकी को तबाह करके रख दिया है। करोड़ों का नुकसान होने के अनुमान हैं। सेब के बगीचे सेब की फसल के साथ ही नष्ट हो गए हैं। सेब के पौधे या तो टूट गए या फिर जड़ से उखड़ गए हैं। आलू जो अभी कुछ निकला था अधिकतर अभी निकलना है, गोभी की फसल भी नष्ट हो गई है। इस तरह लाहौल की कृषि और बागवानी जो वहां की आय के बड़ा स्त्रोत हैं को अत्याधिक नुकसान उठाना पड़ा है।

ऐसा नहीं है कि लाहौल के साथ यह पहली बार हुआ हो। इससे पहले अनगिनत बार लाहौल ने इस तरह की प्राकृतिक चुनौतियों को स्वीकार किया है। पहले जब लाहौल में व्यवसायिक फसलों का चलन नहीं था और लोग अपने गुजर बसर के लिए कृषि कार्य पर निर्भर रहते थे। क्यों कि क्षेत्र काफी ऊंचाई का है इसलिए इस प्रकार से बर्फवारी का अंदेशा सदा बना रहता था और भी आमतौर पर फसली मौसम के छोटा होने के कारण क्षेत्र में एक ही फसल उगाने का चलन था। लेकिन निचले क्षेत्रों में कम समय में तैयार होने वाली दो फसलें भी उगाई जाती थी। जिनमें एक थी जौ की एक किस्म जिसे ‘नंगे जौ’ और स्थानीय भाषाओं में ‘थङज़त’ कहते थे। जिसे अप्रैल महीने में बीजा जाता था और जून में काटा जाता था और उसके बाद दूसरी फसल जिसे स्थानीय भाषाओं में ‘भ्रेस’ या ‘ब्रफो’ व ‘भोस्तुर’ और बाहर वाले काठू (Buckwheat) कहते हैं, बीजा जाता था। लेकिन यह दूसरी फसल कभी भी निश्चित नहीं रही। सदा ही जोखिम बना रहता था क्यों कि सितम्बर माह में बर्फ पड़ती थी और ठंड भी बढ़ जाती थी और फसल नष्ट हो जाती थी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘सोद’ या ‘सोत’ कहते हैं।

लेकिन यह भी सही है कि कभी-2 प्रकृति कुछ अधिक बड़ी चुनौती दे देती थी। लाहौल के मामले में इतनी अधिक बर्फवारी सितम्बर, 1955 में हुई थी। मुझे धुंधला सा याद पड़ता है। तब मैं लगभग 3 साल का रहा हूंगा। हम लोगों के मकान गांव के अंत में पश्चिमी दिशा पर होते थे। जो एक नाले के मुहाने पर थे, बरसात के दिनों में बाढ़ और बर्फ के दिनों में हिमस्खलन (एवलांच) का खतरा बना रहता था। इसलिए जब बर्फवारी शुरू हुई तो मेरे समुदाय के 6-7 परिवारों के सदस्यों ने गांव के मठ के साथ लगते ‘लरजे’ (वैद्य) के ‘छिण्णे’ (मकान के बाहर का कमरा) जो एक तरफ से खुला होता था, में शरण ले रखी थी और यह शरण शायद पूरे सात दिन तक चली थी। बताया जाता है कि उस वर्ष भी सात हाथ यानि 10-12 फुट बर्फ पड़ी थी। जिससे उस समय भी भारी नुकसान हुआ था। बिल्लो के पेड़ और काठू और आलू की फसल का। क्योंकि तब तक लाहौल में व्यावसायिक फसलों का चलन आरम्भ नहीं हुआ था।
एक अन्य बात इस साल मैंने पहली बार लाहौल में सुना कि मेरे गांव में भी सांप दिखना शुरू थे। बहुत से लोगों ने सांपों को देखने के दावे किये। यद्यपि मुझे यह अवसर नहीं मिल सका। बताया जाता है कि 1955 की महा बर्फवारी ने लाहौल से सरीसृप प्रजाति का खात्मा कर दिया था। जो पिछले एक-दो सालों से फिर दिखना शुरू हुए थे।

समाचार माध्यमों से ही ज्ञात हुआ कि इस कठिन समय पर केंद्र और राज्य सरकार ने राहत और बचाव कार्य मुस्तेदी के साथ किये। लाहौल में फंसे हुए पर्यटकों और ट्रेकरों को बाहर निकालने के लिए वायुसेना के हेलीकाप्टरों की लाइन लगा दी और सैंकड़ों लोगों को बारालाचा, सेरचू, कुंज़म आदि स्थानो से बाहर निकाला गया। वे चाहे लद्दाख के रास्ते या स्पिती के रास्ते में फंसे थे, सबको बाहर निकाला गया है और रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी चल रहा है।

इससे पहले न तो इतने संचार माध्यमों की सुविधा उपलब्ध थी और न ही प्राकृतिक आपदा के नाम इतना बचाव व राहत के कार्य हुआ करते थे। तब लोगों को अपने स्थानीय ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य के भरोसे व सहारे बिना किसी बाहरी मदद के प्रकृति के इस तरह की चुनौतियों का मुक़ाबला करना होता था और उसे जीतना होता था। जैसे 1948 के सर्दियों के मौसम में पूरे लाहौल में हिमस्खलन (एवलांच) ने बहुत तबाही मचाई थी। उस समय की तकलीफ़ों तथा संघर्ष को लोगों ने लोकगीतों में संजो कर रखा हुआ है, जो यदा कदा जीवित हो सामने आता है। तब न तो जीवन इतना उलझा हुआ था और न ही लोग इतने विकसित। आज तो एक ही घटना के कई रूप/स्वरूप सामने रख दिये जाते हैं, लोगों के अपने-2 हितों के अनुकूल।

सहायता, राहत व बचाव बड़े पैमाने पर चलाये जाने के बावजूद पहले दिन से ही स्थानीय लोगों की शिकायतें आ रही थी कि प्रशासन स्थानीय लोगों और उनकी समस्याओं पर विशेष ध्यान नहीं दे रहा है। अब तो इस उपेक्षा की सीमा भी पार हो चुकी है। इस प्रकोप के इतने दिनों बाद भी लाहौल के स्थानीय लोग कुल्लू मनाली में या लाहौल में फंसे हुए हैं, लेकिन मजाल कि शासन-प्रशासन उनकी तरफ कोई ध्यान दे। आज (29.9.2018) अभी-2 पता चला कि कुल्लू की ओर से लाहौल को 6 बसें ले जाने का कार्यक्रम बनाया गया था, जो कि रोहतांग टनल से होकर जानी थी। सवारियों से भरी हुई 6 बसें थी, उन बसों को 10 बजे के करीब मनाली से निकाला गया और पूरा दिन नेहरू कुण्ड ले जाकर रखा गया और शाम को वर्षा होने के बहाने फिर वापस मनाली लाकर छोड़ दिया गया। यह क्यों हुआ इसका पता नहीं चल सका है। लेकिन पूरा लाहौल आज (04.10.2018) भी बिजली की रोशनी के लिए तरस रहा है।

इस हादसे और इस हादसे के बाद किए गए राहत और बचाव कार्यों और सरकारों की मुस्तेदी को देखकर कुछ साल पहले यानि 2009 की याद ताज़ा हो आती है। तब भी इसी प्रकार की बर्फवारी में लाहौल से रोहतांग पार करते हुए झारखंड के कुछ युवा मजदूर हिमस्खलन (एवलांच) के शिकार हो गए थे। वे सब नौजवान जिनकी अधिकतम आयु 28 वर्ष की थी, और लाहौल और लेह के बीच सीमा सड़क संगठन के साथ काम करते थे। नवम्बर के महीने में वे वापस अपने घर जा रहे थे और बर्फ पड़ गई। रोहतांग दर्रे के इस पार यानि कुल्लू ज़िले की सीमा में राहनी नाला में एवलांच आया और वे युवा सब बर्फ में दफन हो गए। लेकिन अफसोस उन्हें अपनी मिट्टी तक नसीब नहीं होनी थी, नहीं हो पाई। मेरी, महान टाइम्स के संवाददाता यादव, समाचार पत्र के संपादक तथा राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी के अथक प्रयासों से कुल्लू के प्रशासन ने उजाड़ पड़े कब्रिस्तान में उनकी लाशों को लावारिस दफना दिया था। न खोज, न जांच, न खबर, यह भी पता नहीं कि चल सका कि वे सब कितने थे, कितनी लाशें दफनाई गई थी?

इस मामले में हम लोगों की तरफ से पुरज़ोर कोशिशें की गई कि उन युवाओं को न्याय उनके अविभावकों को क्षतिपूर्ति मिल सके। लेकिन गरीबों के प्रति असंवेदनशील सरकारों और आम जन के सामने हमारी एक न चल सकी। हां! कुल्लू के प्रशासन ने आनन फानन में उनकी लाशों को दफना दिया, क्योंकि वे सब मुसलमान थे। इस सिलसिले में ‘महान टाइम्स’ दैनिक, जो बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश से निकलता था में 25.11.’09, 27.11.’09 तथा 1.12.’09 को विस्तृत समाचार और 28.11.’09 तथा 3.12.’09 को संपादकीय और फीचर छपे थे। लेकिन सबका परिणाम व्यवस्था के बोझ तले दब गया और वे युवा जो देश के लिए सड़क बनाने जैसा बड़ा कार्य कर रहे थे, सम्मान तो क्या अपनी मिट्टी भी न पा सके और एक गुमनाम जीवन (अधूरा) जी कर गुमनाम मौत को प्राप्त हुए। उस सबका कारण था उनका आम आदमी, गरीब और शायद अल्पसंख्यक होना भी। उनका दोष था पेट पालने के लिए हजारों मील दूर आकर पहाड़ों से टकराना, देश की सीमाओं तक सड़क पहुंचाना ताकि दिल्ली में बैठा शासक और उसकी फौज सही तरीके से आ जा सके।

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। मैं आज तक भी यदा कदा इस विषय को उठाता रहता हूं, परन्तु हर बार कोई परिणाम नहीं निकल पाता। परिणाम क्या कोई इस पर ध्यान तक नहीं देता। 18.6.2014 को औट, ज़िला मण्डी में हुए हादसे और उस पर हुई मुस्तेद कार्यवाही के संदर्भ में एक पत्र हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश को लिखा था। क्योंकि इस देश के न्यायालय ‘लोकहित याचिकाओं’ के बहाने सुर्खियों में रहना बहुत पसंद करते हैं। लेकिन अफसोस वहां से भी पंजीकृत पत्र की पावती तक नहीं मिल सकी।

पाठकों के ज्ञान के लिए बता दूं कि 2014 में हैदराबाद के किसी बड़े इंजीनियरिंग कालेज के 24 छात्र, जो कि कुल्लू घूमने आये थे, औट, ज़िला मण्डी में ब्यास नदी में डूब कर मर गए थे। उनकी लाशों को ढूंढने का काम कई महीनों तक चला था। दूर-2 से गोताखोर बुलाये गए थे, हिमाचल प्रदेश तथा आन्ध्र प्रदेश सरकार के कई मंत्री भी दुर्घटना स्थल पर पहुंचे थे। यहां तक कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश, न्यायमूर्ति श्री मंसूर अहमद मीर साहब ने भी मामले में ‘स्वत: संज्ञान’ लेते हुए सरकार से जबाव तलब किया था, जबकि झारखंड के युवा मजदूरों के विषय में लिखे जाने के बावजूद कार्यवाही तो कहां पत्र का उत्तर तक देना उचित नहीं समझा, उस न्यायप्रिय न्यायधीश ने। इस लिए हमारी है कि राहत व बचाव का आधार एक और न्यायसंगत तथा उचित होना चाहिये।

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