अभी 22 से 24 सितम्बर, 2018 के बीच हुई भारी वर्षा व बर्फवारी और उससे विशेषकर कुल्लू और लाहौल-स्पिती ज़िला में हुए नुकसान को देखकर एक कविता ‘न आपदा, न दम्भ’ में मैंने लिखा था कि यह तो प्रकृति और मानव के बीच अन्नत काल से चला आ रहा एक खेल मात्र है। जिसमें खेल नियमों के अनुसार प्रकृति पहले बार करती है और फिर मानव उस चुनौती को स्वीकार कर उसका प्रतिकार करता है। जिस का परिणाम ‘उद्विकास’ के रूप में सामने आता है। आज मानव जिस रूप में है वह सब इसी खेल का परिणाम तो है। यदि प्रकृति चुनौती ही न देती, जीवित वस्तुएं प्रतिक्रिया न करते तो शायद ही दुनियां का यह रूप होता, विशेषकर मानव ने आज तक जितना भी प्राप्त किया है, वह सब इस खेल में मिली चुनौती को स्वीकार कर उसके जबाव खोजने के प्रयास का ही परिणाम तो है। इस खेल में प्रकृति सदा हारी है और मानव जीता ही जीता है। इसके उदाहरण करोड़ों करोड़ हो सकते हैं, यहां तक कि मानव ने स्वयं अपने को, अपने शारीरिक-मानसिक अवस्था को यहां तक पहुंचाया है और लगातार आगे बढ़ रहा है बेहतर से बेहतर की तरफ। प्रकृति हारती गई उसके करोड़ों-2 रहस्यों को मानव ने जान लिया, उसकी करोड़ों समस्याओं का समाधान निकाल लिया, करोड़ों पहलियों को हल कर लिया। उसकी हर शक्ति का सफलता से सामना किया है और हर बार को नकारा किया है। अब तो लगता है कि प्रकृति और मानव के बीच यह सब एक ‘फ्रेंडली मैच’ चल रहा है। इधर से प्रकृति बरबादी का तांडव मचाती हुई बढ़ती है उधर उसके तत्काल पीछे मानव पुनर्निर्माण के कार्य और वे भी परिष्कृत ढंग के लेकर पहुंचा जाता है। वह प्रकृति के इस रूप से नहीं डरता, न घबराता है, बल्कि मजे लेता है।

मैं बात कर रहा था हाल के बाढ़ और बर्फवारी के बारे में। कुल्लू के बाशिंग गांव में, जहां पर मैं रहता हूं। ‘ब्यास’ नदी से 100 मीटर की दूरी पर, ठीक ऊपर, जहां से ब्यास की हर हरकत साफ नज़र आती है। ‘ब्यास’ और ‘ब्यास’ पर हो रहे हर छोटे बड़े क्रियाकलाप और बदलाव साफ नज़र आते हैं। 22 सितम्बर की सुबह से ही बारिश शुरू हो गई थी। यद्यपि सरकार यानि प्रशासन की तरफ से सावधान रहने का ऐलान भी हो चुका था। फिर भी मैं रोज की तरह तैयार होकर कुल्लू की तरफ निकल गया। बल्कि उस दिन तो कुछ विशेष काम भी करने को थे। उन में एक काम था, कुल्लू शहर से 5-6 किलोमीटर दूरी पर स्थित पिरडी गांव में, वहां के स्थानीय लोग कई दिनों से आंदोलनरत थे। क्योंकि कुल्लू नगरपालिका और ज़िला प्रशासन उनके गांव के पास नदी के तट पर शहर का कचरा लाकर जमा कर देते हैं, जिसके प्रबंधन के कोई उचित उपाय भी नहीं किए जाते हैं। जिसके चलते कई सालों से यहां कूड़े का पहाड़ बन चुका था। स्थानीय लोगों के विरोध पर एनजीटी ने भी नगरपालिका को कचरे के सही और उचित प्रबंधन के आदेश दे रखे हैं। लेकिन इसके बाबजूद सब उसी तरह चल रहा था। अब तो वहां धरना दे रहे गांव वालों को हटाने की गर्ज से प्रशासन ने धारा 144 लगा दी थी। इसलिए हम लोगों ने भी तय किया कि हमें भी आंदोलन के समर्थन में जाना चाहिये। क्योंकि यह किसी भी दृष्टि से न तो उचित था और न ही सही कि शहर का कचरा गांव में ले जाकर डम्प किया जाए और विरोध को धारा 144 लगा कर कुचलने का प्रयास किया जाये। लेकिन उस दिन वर्षा की अधिकता के कारण मुझे वापस आना पड़ा।

वापसी पर देखा तो ब्यास ने अपनी तरफ से खेल की शुरुआत कर दी थी। अपना रौद्ररूप धारण कर लिया था और पेड़, लकड़ी, मिट्टी, पत्थर, अनेक तरह के निर्माण के हिस्से या कहें उसके रास्ते जो आया सब अपने साथ बहा कर ले जा रही थी। बड़े-2 पेड़ पत्तों की तरह तैरते हुए जा रहे थे। नदी के दोनों तरफ की जमीन कट-2 कर बह रही थी। इधर ‘फोरलेन’ सड़क की बड़ी-2, ऊंची-2 दीवारें रेत की दीवारों की तरह ढह रही थी। बहुत डरावना दृश्य था। लेकिन लोग दोनों तरफ छाते लेकर तमाशा देख रहे थे। जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच का क्रिकेट खेला जा रहा हो। उधर मेरे सामने ‘सेऊबाग’ (मेरे सामने का एक गांव) जाने का एक पुल था, जो बेचारा कांप-2 कर स्थिर रहने का प्रयास कर रहा था, लेकिन ब्यास बार-2 अपने रास्ते भी बदल रही थी। जैसे कि वह न्यायपूर्ण तरीके से अपने दोनों किनारों को बराबर काटना चाहती हो या कि न्याय अंधा होता है, के तर्ज पर गवाहों पर निर्भर न्याय बांट रही हो? नहीं आज की न्याय व्यवस्था (मानव की) के विपरीत निष्पक्षता से कार्य कर रही थी।

प्रकृति द्वारा दी गई इस प्रकार की चुनौतियों से दो चार होने पर ‘निर्माणवादियों’ की याद आ जाती है। जब वे डार्विन के सिद्धांत को भी गलत ठहराते हैं। एक कोशिये प्राणी से आज के मनुष्य बनने तक के सफर का रहस्य भी यही खेल, यही मैच है। प्रकृति की चुनौतियां और प्राणी की स्वीकृति और उसका उत्तर। आज जब हम इस श्रंखला में सबसे ऊपर मानव को पाते हैं उस का रहस्य भी यही है। वह है इस पूरे प्रकरण का कमांडर, वही चलाता है इस सब को। वही ढूंढता है हर प्रश्न के उत्तर और हर रहस्य के पर्दे को हटाता है। करोड़ों रहस्यों को सुलझा चुका है और प्रक्रिया लगातार जारी है।

मैं हाल के इन हालातों को बड़े गौर से देख रहा था। मेरे सामने ब्यास नदी के दूसरे किनारे, एक छोटा सा मैदान खाली पड़ा था, जहां पर गांव के पशु चरते थे, बच्चे खेलते थे या फिर कभी कभार कुछ पर्यटकों की कारें खड़ी नज़र आती थी। उन सबसे अलग इस छोटे से मैदान में हर साल दो बार एक गुजर परिवार (मुस्लिम) अपने यायावरी की यात्रा के मध्य एक या दो रातों के लिए रुकता था। यह परिवार अपने पशुओं जिनमें भैंसे अधिक थी के साथ अप्रैल-मई में मैदानी क्षेत्र से ऊंचाई वाले क्षेत्र की ओर जाते हुए और सितम्बर-अक्तूबर में वापसी पर यहां रुका करता था। लेकिन इस वर्ष उस छोटे से मैदान को वन विभाग वालों ने पार्क में बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी और उस क्षेत्र को चारों तरफ से दीवारों और कंटीली तारों से घेर लिया था। दूर-2 से ट्रकों में मिट्टी लाकर इसे समतल किया गया था। लेकिन इस बाढ़ ने उस सब मेहनत को बर्बाद कर दिया और उस जगह की स्थिति पहले वाली कर दी। अब फिर मैं उस गुजर परिवार को देख सकूंगा।

23 सितम्बर की रात को बाढ़ की स्थिति बहुत भयंकर थी। पूरी रात ब्यास में हद से ज्यादा पानी बढ़ा हुआ रहा। जिसको हम बाढ़ के साथ बह रहे बड़े-2 पत्थरों के आपस में टकराने की आवाजों से महसूस कर सकते थे। दूसरे दिन पानी कम अवश्य हुआ लेकिन बाढ़ की स्थिति बनी हुई थी। तीसरी सुबह चार बजे मुंह अंधेरे जब मैं देखता हूं तो उस मैदान में दिवाली की तरह रोशनियां चमक रही थी, चीखने चिल्लाने जैसा शोर हो रहा था। यानि लोग प्रकृति के विध्वंस के अवशेषों से अपनी दुनियां बसाने के प्रयास में जुट चुके थे। यह मेरा वह तेरा है का शोर। रात को बाढ़ द्वारा लाये गए पेड़ों और अन्य वस्तुओं पर कब्जा जमाया जा रहा था। जो उस दिन शाम तक सब समाप्त कर दिया गया। मैदान खाली हो गया। तमाम लकड़ी, लोहा आदि लोगों के घरों में पहुंच चुका था। यानि प्रकृति की चुनौती स्वीकार और उस पर तात्कालिक कार्यवाही भी की जा चुकी थी।

उधर बाढ़ की चेतावनी तो प्रशासन पहले ही दे चुका था। अब उससे हुए नुकसान का आंकलन और हालातों को सामान्य बनाने का प्रयास। राज्य के मुख्यमंत्री, क्षेत्र के मंत्री, शासन-प्रशासन सब लग चुके थे अपने-2 काम पर। कोई भी पीछे रहना नहीं चाहता था। यूं कहें तो बेहतर होगा कि बहती गंगा में हाथ-पांव धोने की तैयारियां। कुल्लू ज़िला और लाहौल-स्पिती के मामले में आज (28.9.18) तक भी कुछ अधिक मालूम नहीं हो सका है। यहां तक कि फोन का संपर्क भी टूटा हुआ है। जहां तक कुल्लू का मामला है जगह-2 पर सड़कें टूटी हुई हैं, पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं, निजी संपतियों का नुकसान भी बहुत हुआ है। कई ट्रक, बस और छोटे वाहन भी ‘ब्यास’ की बाढ़ के चपेट में आए हैं। लेकिन सरकारी तौर पर नुकसान के आंकलन के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। अभी तो प्रशासन के लोग भाग-दौड़ में ही हैं और पता लगा रहे हैं, कहां कितनी क्षति हुई है और स्थिति सामान्य बननी चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *